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Saturday, February 6, 2016

ताउम्र हँसी

    ढलती हुई शाम को ऊँचे आसमान पर छाए सुरमई बादलों में से कभी -कभी सूर्य भी दिखाई पड़ जाता था। इस अलबेले से मौसम में हम चारों अपनी नौका तथा चप्पू लिये नदी के किनारे जा पहुँचे थे। शहर के बीचो -बीच बहती इस नदी के पानी में शरबती रंग घुले लगते थे। मस्त हुए परिंदे आज़ाद हवाओं में कुदरत की सराहना के गीत गाते लग रहे थे। सूर्य के प्याले से बहती लाली से चमकता पानी इस मनमोहनी कायनात को और भी रंगला बना रहा था। 
      लाइफ़ जैकेट पहनकर एक नौका में हम दोनों माँ -बेटा तथा दूसरी में वे दोनों बाप -बेटी बैठ गए। खुला -ताज़ा माहौल था। एक दूसरे की मन की अनकही बातों को समझने तथा रिश्तों की गरिमा को महसूस करने का समय। हमें खुद ही चप्पू चलाकर गहरे पानी में उतरना था। मेरे हिस्से नौका को केवल आगे धकेलना आया था और मेरा बेटा  नौका को सही दिशा में रख रहा था। फाल्गुन की धूप जैसे खिला हुआ वह बड़ी ही सहजता से नौका को कंट्रोल में रखने के बारे में भी मुझे बताता जा रहा था। मैंने  नज़र घुमाकर सामने देखा। दूसरी नौका हमसे काफ़ी दूर जा चली थी। मगर हमारे वाली नौका हमारी हँसी के भँवरजाल में उलझी एक ही जगह पर गोल -गोल घूमे जा रही थी। 
      कहते हैं कि कुदरत उनका साथ दे ही देती हैजो हर हालत में अपने मकसद को पाने के लिए दृढ़ रहते हैं। अब हमारी नौका हमारे कंट्रोल में थी; मगर हँसी अभी भी बेकाबू। "चलें पापा तथा निकड़ी से आगे निकलें," उसकी आँखों में शरारत तथा बोलों में ताज़ी हँसी थी। पानी की लहरों को चप्पुओं की आवाज़ ताल दे रही थी।अगले कुछ ही पलों में हमारी नौका दूसरी नौका के साथ -साथ जा रही थी।खुशियों- भरे शरबती पलों ने आँखों में खुशनुमा रंग बिखेर दिए थे। 
      नदी के किनारे लगे वृक्षों के अक्स पानी की तरंगों  के संग नाचते लगते थे।परिंदों की गूँजती संगीतमयी आवाज़ों ने हमारे भीतर फैले चिंता के अँधेरे को रौशनी से भर दिया था। मोह -भरी हँसी की अँगुली पकड़कर उन कुछ ही पलों में हमने ताउम्र हँसी अपने आँचल में समेट ली थी । जिसको याद करते हुए आज भीमेरी साँसे जीने जैसे अहसास से धड़कने लगती हैं। 

छुपता सूर्य 
पानी पर फिसलें 
सोन -किरणें। 
डॉ. हरदीप कौर संधु 

Wednesday, December 24, 2014

सोच अपनी -अपनी (लघुकथा)

कमल  अपने पति के साथ पीलिए से पीड़ित अपनी तीन दिन की बच्ची को लेकर सरकारी अस्पताल आई थी। डाक्टर ने जब खून बदली का मशवरा दिया तो उनकी चिंता और बढ़ गई। ज़ेरे इलाज दो और बच्चों के साथ उनकी बच्ची को भी इनक्यूबेटर में रखा गया।  कमज़ोरी के कारण कमल बहुत अस्वस्थ नज़र आ रही थी। निक्की की बीमारी उसकी पीड़ा को और बढ़ा रही थी। । वह दूर बैठी इनक्यूबेटर में लेटी निक्की को व्याकुलता से टकटकी बाँधे देखे जा रही थी।
           अचानक निक्की ने अपनी चादर उतार दी। जैसे ही कमल ने ठीक करने के लिए अपना हाथ बढ़ाया उसकी चीख निकल गई। चेहरे पर फैली पीड़ गुस्से में बदल गई। अगले ही पल उसने निक्की को बाहर निकालते हुए पूछा , " इन दोनों बच्चों के साथ कौन है ? बाहर निकाल लो अपने बच्चों को , इतने ताप में रखकर हमने अपने बच्चों को झुलसाना नहीं है।" शोर सुनकर अस्पताल का स्टाफ़ आ गया। जाँचने के बाद मालूम हुआ कि तकनीकी ख़राबी के कारण इनक्यूबेटर का तापमान ज़रूरत से कई गुना ज़्यादा बढ़ गया था।
           "शुक्र है प्रभु का, आपके लड़के के साथ हमारे लड़के की भी जान बच गई," दूसरे बच्चे के साथ आई दादी  बोली। " हमारी तो लड़की है," कमल ने धन्यवादी शब्दों को स्वीकार करते हुए दादी की शंका दूर की।
 

" अरे आप लड़की के लिए इतनी चिंता में डूबे सुबह से दौड़ -धूप कर रहे थे। मुझे लगा लड़का होगा। "-दादी का मुँह खुला का खुला रह गया।

डॉ हरदीप कौर सन्धु 


Sunday, October 5, 2014

रौशनी की किरण

डॉ हरदीप कौर सन्धु

सर्द दिन…… थर-थर काँपती धूप  ....... मगर गुलाबी धूप के टुकड़ों को उसकी मीठी दोस्ती -संग निभाते मेरा अन्तर्मन असीम ख़ुशी से भर जाता। उससे जुड़ी दिली साँझ मुझे ख़ूनी रिश्तों से भी अनमोल लगती।  वह अक्सर दूधिया हँसी हँसती मुझे चाव से मिलती। आज किसी अलौकिक प्रसन्ता के उल्लास से भरकार  उसने कहा, " जल्दी ही एक नन्हा फ़रिश्ता मेरी झोली में आने वाला है।" उसी पल स्वाभाविक रूप से मेरा निजी अनुभव बोला," तेरा खिला माथा  तथा चेहरे का नूर तेरी कोख में पलने वाली नन्ही परी के आने की हामी भरता है। "

           छन-छन करता समय अपनी चाल चलता रहा और नन्हे फ़रिश्ते का अपनी माँ की कोख का गुलाबी सफर अब अन्तिम पड़ाव पर है। गुनगुनी  फागुनी धूप ,आज फिर हमारी मुलाकात हुई।  कुछ महीने पहले अनुमानित बात पर उसने पक्की मोहर लगाते हुए कहा, " सच  हाँ  सच में ………… एक नन्ही परी हमारे घर आने वाली है !" नई टैक्नॉलोजी के ज़माने में सब कुछ पहले से ही मालूम हो जाता है।

              आज ऐसे लगा जैसे उसके मन के मौसम में फूलों जैसी रस -भीनी महक बिखर गई हो। बहार जैसे खिलते हुए किसी अलौकिक उमंग में भरते हुए  उसने बड़े चाव से अपनी सुंदर परी के स्वागत की पहले से की हुई तैयारी को मेरे सामने लाकर बिखेर दिया। कहीं स्वयं खरीदी छोटी -छोटी गुलाबी फ्रॉक तथा मौजे तो कहीं सात समंदर पार से ऊनी धागों में बुना हुआ भेजा दादी -नानी का मोह-भीगे बचकन्ने। अपने पति की लाई हुई प्यारी सी गुड़िया जब उसने मुझे दिखाई तो लगा जैसे सच में ही दूधिया हँसी से आँगन भर गया हो। शायद वो इस गुड़िया को देखकर अपनी लाडो का चेहरा प्रतिदिन अन्तर्मन में देखती  है।

            ……… आने वाली रौशनी की किरण जैसी परी को मन ही मन में आज भागभरी कहने को मेरा मन कर आया।



खुली खिड़की

रौशनी की किरण

देखूँ आँगन।       

       
-0-

Wednesday, May 28, 2014

सुर्ख गुलाब (हाइबन)

डॉ हरदीप कौर सन्धु 

स्कूल ऑफ़ स्पेशल एजुकेशन -"चिल्ड्रन विथ स्पेशल नीड्स " भीतर जाते ही मेरी सोच रुक- सी गई थी .... मैं तो जैसे निष्पन्द  मूर्त्ति बन गई थी और भीतर तक काँप गई थी। 
  आधी छुट्टी का समय था।  बच्चे स्कूल में बने अलग -अलग हिस्सों  में खेल रहे थे ;जो बड़ी -बड़ी ग्रिल लगा कर बनाए हुए थे। एक भाग में कुछ बच्चे व्हील चेयर पर बैठे इधर उधर देख रहे थे। दूसरे हिस्सों में कोई बच्चा ऊँचे से चीख रहा था , कोई दीवार की तरफ मुँह करके छलाँगें लगा रहा था, कोई बेहताशा दौड़ रहा था ,तो कोई ऐसे ही हाथ हिला -हिलाकर बिन शब्दों से अपने -आप से ही बातें कर रहा था।  एक बच्चे मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपनी ओर खींचने लगा जैसे वह मुझे कुछ बताना चाह रहा हो।
          मुझे विस्मित तथा भयभीत-सी देखकर स्कूल का एक कर्मचारी बताने लगा, " ये बच्चे बोल नहीं सकते। अपने भावों को चिलाकर या आपका हाथ थाम कर प्रकट करते हैं। कुछ बच्चे मुँह द्वारा खा भी नहीं सकते।  उनके  पेट में लगी ट्यूब में  सीधे ही भोजन डाला जाता है।  बहुत से बच्चों को टट्टी -पेशाब का भी पता नहीं चलता। इस स्कूल में इन दिमागी तथा शारीरिक तौर से विकलांग बच्चों को खुद को सँभालने की ही ट्रेनिंग दी जाती है"
          सुनकर मेरी आँखे नम हो गईं। मैं सोचने लगी कि जब किसी के घर में किसी बच्चे का जन्म होने वाला होता है ,तो हर दादी को पोते का इंतजार रहता है। उसने शायद ही कभी ये दुआ की हो कि हे प्रभु आने वाला बच्चा तंदरुस्त हो। मेरी सोच विकलांग बच्चों तथा इनके माता-पिता पर आ कर अटक गई
        चढ़ती लाली
        पत्ती पत्ती बिखरा
        सुर्ख गुलाब।

Saturday, May 17, 2014

मेरी दुआएँ-

डॉ हरदीप सन्धु के जन्म दिन पर  
1
मेरी दुआएँ-
दु;खों की आँच कभी
पास न आए
2
घाटियाँ लिखें
हरे घास -पन्नों पे
फूलों की कथा
3
बनों  सूरज
सपनों में मन  का
उजाला भरो ।
-0-


Wednesday, May 14, 2014

शगुन


          छिंदा जब भर जवान हुआ तो उसकी शादी का भागों वाला दिन आ गया। उसके विवाह के सभी शगुन उसकी माँ ने अपनी जेठानी दलीपो से ही करवाए। छिंदे की शादी के बाद दलीपो कुछ उदास सी रहने लगी। ऐसा लगता था कि जैसे कोई अनदेखा डर उसे अंदर से खाए जा रहा था। इसी तरह कई वर्ष बीत गए। उसे वह दिन याद आ गया जब नि:सन्तान दलीपो की झोली में उसके देवर ने अपने पहले बेटे को डालते हुए कहा, " भाभी आज से छिंदे को तू अपना पुत्र ही मान ले, यह अब तेरा ही है।" नम आँखों से छिंदे को आँचल लेते हुए दलीपो को लगा जैसे उसकी छातियों में भी दूध उतर आया हो। अब छिंदा भी अपनी ताई को बहुत प्यार करता और उसको बड़ी माँ से बुलाता।
           चार बरस के बाद जब छिंदे के घर में पहली बेटी ने जन्म लिया तो दलीपो की ख़ुशी संभाले नहीं संभलती थी।  वह ख़ुशी में इधर -उधर घर में घूम रही थी। दलीपो देसी घी के लड्डू पूरे गाँव में बाँटते हुए सभी को कह रही थी , " अरी बहनोंमुझे तो कब का इस दिन का इंतज़ार थालड़का हो या लड़की, मेरे लिए कोई अंतर नहीं है ये तो रब की देन होते हैं - दोनों एक समान। अरी सबसे बड़ी बात तो ये है कि हमारे घर में लीक तो चली नहीं तो छिंदे की माँ ने मन ही मन मुझे कोसना था कि इस अभागन दलीपो के हाथों छिंदे के विवाह के शगुन हुए थे तभी तो इसके कोई औलाद नहीं हुई।'' 
डॉ. हरदीप कौर सन्धु