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Saturday, December 25, 2010

नव वर्ष (2011)


















नव वर्ष की शुभकामनाएँ !
1
नए वर्ष में                        
 जिन्दगी से घटता                    
  फिर से वर्ष  ।
2
नव वर्ष में
  जागे हर मन में 
  उल्लास नया ।
3
नव वर्ष में
रिश्तों में भी पनपे
विश्वास नया ।
4
चाह नवल
  महके नया साल
  चंदन बन ॥
5
 चहके वर्ष
आशाओं के वन में
चिड़िया जैसे ।
6
नव तरंग
  जीवन का प्रसंग
 उज्ज्वल नव ।
7
बाँध ये मुट्ठी
 झुक जाएगी तब
 दुनिया सारी ।

8
खुश है मन
 खिले मन -वाटिका
  नए सुमन ।
9
नव वर्ष में
 पाखी भी मिल गाएँ
  जीवन -राग ।
10
सूरज आज
   लगता नया -नया
    नव सृजन ।
11
 नवल राह
  जिन्दगी को बनाएँ
   नव प्रवाह ।
12
करें ये प्रण
   जीतेंगे हारी बाजी
   मैं और तुम  ।
  
हरदीप कौर सन्धु ( बरनाला)

Thursday, December 23, 2010

अनुभूति में मेरे हाइकु

अनुभूति में मेरे हाइकु

अनुभूति भारत की साहित्यक, सांस्कृतिक और दार्शनिक विचारधाराओं की रचनात्मक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका है ।  यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित होती है। श्रीमति पूर्णिमा वर्मन जी इस की संपादक है अनुभूति के मासिक पाठक ३ लाख से भी ऊपर है ।
२० दिसम्बर २०१० को मेरे कुछ हाइकु इस पत्रिका में प्रकाशित हुए ।  यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है।  मगर इस के लिए मैं श्री रामेश्वर कम्बोज हिमांशु जी का ह्रदय से धन्यवाद करना चाहती हूँ जिन के बताए मार्ग पर चलकर मैं इस काबिल बनी हूँ ! 
हरदीप कौर सन्धु ( बरनाला) 

Sunday, December 19, 2010

दादी के बाद.....
























दादी के बाद
संदूक व चरखा
एक कोने में
कौन काते सूत
और संभाले संदूक
कौन बनाए खेस
व बनाए बंबल
झंझट निपटाओ
शहर से लाओ कम्बल !

हरदीप कौर सन्धु ( बरनाला)

Thursday, December 16, 2010

मुक्तक













[1]
ना चुप मेरी कायरता है
ना चुप मेरी महानता है
माना लब हिलना बन्द हुए
दिल तो बहुत कुछ बोलता है !
[2]
फूलों ने  काँटे  जाने होंगे
खुशियों  ने गम पहचाने  होंगे
फूलों से खुशी चुन कुछ न होगा
गम -काँटे भी अपनाने होंगे  !
[3]
दर्द भुलाकर जीना सीख
गुस्से को तू पीना सीख
बहुत हसीन मिली ज़िन्दगी
फटे दिलों को सीना सीख !
[4]
समय से पहले कुछ नहीं मिलता
भाग्य से ज़्यादा कुछ नहीं मिलता
कभी नहीं बिकता प्रेम हाट में
सिर्फ़ सज़दों से  रब नहीं मिलता !
हरदीप कौर सन्धु ( बरनाला)

Thursday, November 25, 2010

कुछ तो करना होगा ..........














शाम हुई   रात गई काली
कब का मिट गया था अँधेरा
रिश्वतखोरी के बादलों ने
 होने दिया था नहीं सवेरा.........
करता रहा तेरे शहर को
अपना बनाने की  मैं कोशिश
झूठ- फ़रेब की  गर्म हवा ने
होने नहीं दिया  वह मेरा.......
आशाओं का नन्हा पौधा
रोपा  था मन के आँगन में
भ्रष्टाचार के  दूषित जल ने
चारों तरफ़ जमाया डेरा …
नन्हीं  ख़्वाहिशों के पाखी तो
कब के आकरके  बैठे थे
हेरा-फेरी व कपट-जाल ने
कहीं ना होने  दिया बसेरा.........
हमारी सब भोले-भालों की
कुराहे डाली भरी  जवानी
आज के  इन  सब रहबरों  ने
धुँधला कर दिया चार-चुफेरा............
सभी   तैरते   लहरों के संग
कि  वे बदल  डालेंगे  जग को
अब  चीरकर इन लहरों को
हम तोड़ेंगे  इनका घेरा …


हरदीप कौर सन्धु ( बरनाला)

Saturday, November 20, 2010

श्री गुरू नानक देव जी का प्रकाश पर्व


               धन गुरु नानक प्रगटिया
          मिटी धुंध जग चानण होआ  !!
 श्री गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल  1469 ई.   ( वैशाख   सुदी ३, संवत् 1526  विक्रमी ) में तलवंडी रायभोय नामक स्थान ( जो  पाकिस्तान में है) हुआ । आजकल यह स्थान ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है ।
गुरु जी का प्रकाश उत्सव कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है जिसके कई कारण हैं .......
1. महाराजा रणजीत के समय में यह पर्व वैशाख ( अप्रैल ) में ही मनाया जाता था ननकाना साहिब में ।

2. भाई साहिब भाई  संतोख सिंह ने भाई बाला जी की साखियों के आधार पर 1823 ई. में ' नानक प्रकाश' लिखा जिसमें बाबा नानक का  जन्म कार्तिक में ही बताया गया है।

3. इसके बाद 1853 ई. को पहली बार यह गुरुपर्व कार्तिक पूर्णिमा को मनाया गया ।

4. यह भी माना जाता है कि एक बार जब बाबा नानक वेंई नदी में स्नान करने गए और वहाँ से तीन दिन बाद बाहर आए । उस दिन कार्तिक की पूर्णिमा थी । बाहर आकर गुरु जी ने एक नया संदेश दिया....रब एक है.....न कोई हिन्दू  है .....न कोई मुसलमा है । लोग इस दिन को बाबा नानक का रूहानी जन्म मानते हैं ।

5. कार्तिक माह को हिन्दू  लोग श्री राम तीर्थ मेले पर अमृतसर जाते थे । ज्ञानी संत सिंह चाहते थे कि सिख भी इन दिनों दरबार साहिब आएँ माथा टेकने ।

6. वैशाख माह में तो और भी बहुत सारे उत्सव होते हैं , जैसे वैसाखी , होली, होला मुहल्ला , दुर्गा- अष्टमी , रामनवमी ।  

 7. कार्तिक माह में किसान लोगों  के पास  हाड़ी ( रबी) की फसल काट लेने के बाद समय ही समय होता है । 

यह सब कारण मिल करके बन गए कारण यह गुरुपर्व नवंबर ( कार्तिक ) माह में मनाने का ।
हरदीप कौर सन्धु ( बरनाला)


Sunday, November 14, 2010

बाल दिवस



















बात उन दिनों की है जब खुशिया चाचा स्कूल में पढ़ता था। उस के  स्कूल में एक शिक्षा- इन्स्पेक्टर  आया । वह बच्चों की  पढ़ाई का स्तर जानने के लिए स्कूल की सबसे होशियार मानी जाने वाली कक्षा ( खुशिया चाचा की कक्षा) में बच्चों से सवाल पूछने लगा ।
उसने बोर्ड पर एक अंग्रेज़ी का शब्द Nature  लिख दिया । बच्चों को शब्द पढ़ने के लिए कहा । बच्चे बोले, '' लो सर यह भी कोई मुश्किल सवाल है.....आपने तो 'नटुरे ' लिखा है । आपको माने तो तब अगर आप खुशिये के सवाल का उत्तर बता दें ।''
खुशी राम ने सुना तो  खुशी के मारे फूलकर कुप्पा हो गया । वह  अकड़कर खड़ा हो गया और बोला,  ''सर क्या आप बता सकते हैं  कि बकरी घास तो लम्बी- लम्बी खाती है....फिर वह मींगने गोल-गोल क्यों करती है ?''
इतना सुनते ही सारी क्लास  खिल-खिलाकर हंसने लगी ।
इन्स्पेक्टर  साहिब  तो  nature का pronunciation 'नटुरे  ' सुन कर पहले से ही लाल-पीले हो रहे थे और अब खुशिये के सवाल और बच्चों की हंसी से और भी भड़क गये और सीधे हैड मास्टर के आफ़िस में  पहुंच कर बोले - ये बच्चों को आप लोग क्या सिखाते  हो ? एक तो  Nature का  उच्चारण नटुरे करते हैं और ऊपर से बतमीज़ी  से उल्टे-सीधे सवाल मुझसे पूछते हैं। मैं तुम्हारी स्कूल की ऐसी खराब रिपोर्ट  बनाऊंगा कि  तुम्हारे स्कूल की मान्यता ही खत्म करवा दुंगा !
 हाथ जोड़कर हैड मास्टर बोला, ''  इन्स्पेक्टर  साहब ऐसा जुल्म मत करना ,  वर्ना हमारे  स्कूल के छात्रों का तो फ़टुरे ही (future) खराब हो जायेगा !

 हरदीप संधु ( बरनाला) 

Monday, November 8, 2010

पंजाब रोडवेज़ .....


1.    बिना टिकट सवारी
       ऊपर हाथ पकड़ो 
       जाने की 'गर जल्दी
2.    रोडवेज़ दी लारी
      'पास वालों' की
       आती बाद में वारी
3.    पी. आर. टी. सी. - पिटदी रोंदी तुरदी चल.....

 4. चलती बस से सिर व बाजू बाहर निकालना मना है....

     तोरी जैसे लटकना मना नहीं है !!

 5 . बस में बैठे कवि से कंडक्टर ने पूछा.....

     टिकट कहाँ की दूँ ? कहाँ जाना है ?

    कवि बोला.....दूर आसमान में ठिकाना है.....

    कहीं की भी देदो टिकट ....

   मैने तो बादलों के उस पार जाना है  !!!


हरदीप कौर संधु ( बरनाला )

Thursday, November 4, 2010

शुभ दीवाली



 आपको दीवाली की मिलियन- ट्रलियन बधाई हो !
यह दीवाली आपकी जिन्दगी में.......
25 रुपये वाली हवाई जैसे सीटीयाँ बजाए.........
50 रुपये वाले अनार जैसे रोशनी करे.......
साथ-साथ 75 पैसे वाली फुलझड़ी जैसे शुर-शुर भी करे.........
आपके सारे दु:ख 50 पैसे वाले लाल पटाखे की तरह फुस हो जाएँ..........
और आप 30 रुपये वाली चक्करी चलाते उछल-उछल कर खुशियाँ मनाएँ ...
दीवाली की ढेरों शुभ- कामनाएँ !!!!

हरदीप कौर संधु  

Tuesday, October 26, 2010

चलो ढूँढे एक रुपया

 


















एक बार तीन दोस्तों ने किसी ढाबे पर खाना खाया । हर एक ने 10 रुपए दिए । इस तरह उन्होंने ढाबे वाले को 30 रुपए दिए । लेकिन उनका खाने का 'बिल' 25 रुपए बनता था। ढाबे वाले के पास पाँच (5)  का नोट नहीं था।इस लिए उस ने बराबर का हिसाब करने के लिए हर एक को 'एक-एक' (1) रुपया वापिस कर दिया और बाकी के दो (2)  रुपए उसने खुद रख लिए ।इस तरह उस दिन तीन दोस्तों को अपनी-अपनी जेब से केवल '9' रुपए 
खर्च करने पड़े ।
चलें अब थोड़ा हिसाब - किताब कर लें .....
एक आदमी ने दिए = 9 रुपए
तीन ने दिए = 9 + 9 + 9 =27 रुपए
ढाबे वाले ने रखे = 2 रुपए
कुल रकम = 27 + 2 = 29 रुपए
तो फिर बाकी बचता एक (1)  रुपया कहाँ गया ?

 हरदीप संधु

Saturday, October 23, 2010

माँ तू समझी नहीं

'


















जब तू नन्हा सा था

माँ की गोद में खेलता था 

तुतला-तुतला बोलता था

माँ समझ जाती थी

तेरी हर तोतली बात

अब तू हो गया बहुत बड़ा  

हर बात साफ़ -साफ़  बोलता

 बात-बात पर तू यह कहता

माँ तू  समझी  नहीं.....

मेरी बात......??

अपनी माँ को न: समझ बताकर

खुद को बहुत समझदार समझता!!

हरदीप कौर संधु

Wednesday, October 20, 2010

यह तेरा रब...वो मेरा रब ..!















रब को ढूँढने
पहले तो हम
मन्दिर-मस्जिद  जाते
थोड़ा सा अहिसास होते 
रब का ...
कि भई हाँ ...
रब तो है...
उसके मिलने से पहले ही
उसको राम व अल्ला में 
बाँटने बैठ जाते हैं...
तभी तो हम
मानव जाति कहलाते हैं 

हरदीप संधु

Wednesday, October 13, 2010

शहर से लौटा खुशिया चाचा




















छोटापुर भाव समालपुर वाले खुशिया चाचा को तो आप जानते ही हैं। अब वह शहर की नौकरी छोड़कर गाँव में रहने लगा। किसी ने पूछा तो चाचा ने अपने शायराना अन्दाज़ में जो रंग बाँधा ....उसी का सीधा प्रसारन आपको सुनवाते हैं ....याद है न खुसिया चाचा ' छ/श' को ' स' बोलता है....

मन भर गया सहर से

अब गाँव में ही रहूँगा

सोटापुर को तो कब का

बना दिया मैने समालपुर

अब गाँव में भी

सहरी इस्टाईल से रहूँगा...

हिन्दी तो नेस्नल 

यानि रास्ट्र भासा (राष्ट्रभाषा)

यह तो नहीं सोडूँगा

लेकिन ........

थोड़ी इंगलिस भी  बोलूँगा ....

काला चस्मा(चश्मा ) लगाएगा 

तेरा खुसिया चाचा

मसली(मछली) को फिस्स  कहेगा

चाय में सक्कर (शक्कर) नहीं

अब सूगर डालकर पीएगा

सिक्सा (शिक्षा) को कुयालिफकेसन

छुट्टी  को वकेसन कहेगा 

गाँव के हर काम में होगा

अब चाचा सामिल(शामिल) ...

न..न..पार्टीसिपेसन

किसी का न होने देगा 

सोसन (शोषण)..उफ़..एक्सपलॉएटेसन

बूढ़ा होने लगा तो क्या हुआ

दिखता तो अभी भी मैं फ़ैसनेबल

नहीं समझे क्या .....सैल-सबीला

शिवजी को कहूँगा- लॉरड सिवा

लेकर आ गया हूँ मैं पैनसन (पैन्शन)

निभाऊँगा सारे रिस्ते (रिश्ते)

हाँ..हाँ..रिलेसन

तभी तो कहलाऊँगा 

भारतीय क्रिएसन !!!

हरदीप संधु 

Friday, October 8, 2010

एक आम आदमी












 एक आम आदमी......
 

मन ही मन में
 

दूसरों को
 

अपना समझता है
 

मगर हर कोई
 

उसके अरमान
 

यूँ ही कुचल देता है
 

 एक आम आदमी.......
 

सड़क पर बेखौफ़ चलता है
 

क्योंकि उसके पास
 

खोने के लिए
 

कुछ भी तो नहीं होता है
 

 एक आम आदमी......
 

कभी कभी देखता
 

बड़े-बड़े सपने
 

क्योंकि केवल
 

सपने ही तो वह देख पाता है
 

 एक आम आदमी......
 

जगा होता है
 

चिन्ता व दु:ख का मारा
 

जब सारा संसार
 

बेफिकर सो रहा होता है

हरदीप संधु 

 



Tuesday, October 5, 2010

स्प्रे कैन् में टी शर्ट

आ गया है विज्ञान  का एक नया आविष्कार .....
 जल्दी ही  आ जाएगा आपके शहर ..........
जी हाँ....अब यात्रा करते समय भारी-भरकम सूटकेस उठाने की जरूरत नहीं....बस एक कैन् ही काफ़ी है....जिस में होगा आपका पहनने वाला सामान। चौंक गए न...जी हाँ...अब आपकी टी-शर्ट है एक स्प्रे कैन् में....जब दिल चाहे कैन् खोलकर स्प्रे कर लीजिएगा ...और मन चाहे रंगों में टी-शर्ट पहन लीजिएगा  । इम्पीरियल कालेज लंदन के वैज्ञानिकों  ने  ऐसे तरल पदार्थ खोज निकालें हैं जिन का प्रयोग कपड़ा बनाने के लिए किया जा सकता है । इन तरल पदार्थों को अपने शरीर पर छिड़काव करने   के बाद यह सूखकर कपड़े की तरह बन जाते हैं ।     
अब देखें यह कैसे होता है ........ 
 डॉ. टौरर्स स्प्रे कैन् से छिड़कवा करते हुए.....थोड़ी गुदगुदी तो होगी ही.......
 तरल पदार्थ सूखने लगा है....देखिए क्रीज़ दिखने लगी है !
सफेद.....ऊँ...हूँ...कुछ अच्छा नहीं लगा....डॉ. साहिब टी-शर्ट को कुछ रंगीन बनाते हुए...........

 अरे वाह ! यह तो बन भी गई.....

 आप जब चाहें इसे उतार कर ....धोकर ....फिर से पहन सकते हैं....... 
 क्या कहा आप ने......आप नहीं मानते.....तो फिर वीडियो देख लीजिएगा....तसल्ली हो जाएगी..........
स्प्रे कैन् टी - शर्ट
आप भी पहनें

Thursday, September 30, 2010

पति है राजा...पत्नी रानी...

इस कविता का पहला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक सहज साहित्य   कीजिए 


















           पति तो परमेश्रर ही है
             पत्नी का है कहना
       परमेश्रर वाला एक भी गुण
        चाहे पति सीख सके ना
              पति-पत्नी ....
        जीवन के हैं दो पहिये
      जीवन को चलाने के लिए
         दोनों ही हमें चाहिए
          यह बात पति ने 
         अब तक ना मानी
      करता फिरता फिर भी 
        वो अपनी मनमानी
     ऊँचा बोलकर रौब जमाता
    तुझे घर सँभालना नहीं आता
     बड़ी-बड़ी बातें सीख  गया वो
    पत्नी-सम्मान करना नहीं आता
       अपनी नाकामी  का सेहरा
        पत्नी के सिर  ही  बाँधता 
         ठीक हो चाहे गलत
       बस अपनी ही हाँकता
          पत्नी नहीं करती 
      कोई  गिला- शिक़वा 
          यही गुण उसे
        विरासत में मिला
         कोई बात नहीं 
        सुबह का भूला
          शाम को ....
       घर लौट आए
        हम दोनों तो 
        घी- शक्कर हैं
         कोई जुदा ...
       हमें कर न पाए
      माँ-बाप ने जब से 
    उसके जीवन की डोरी 
    पति के हाथ सँभाली
         तब से वह तो 
         उसी को  ही
   अपना सब कुछ मानती
         पति है राजा 
     वो है उसकी रानी
     दोनों से ही घर बनता है
    यही घर-घर की कहानी !!

हरदीप संधु 

Friday, September 24, 2010

खुशिया चाचा का अपॉइन्ट्मैंट लैटर







छोटापुर गाँव के खुशी राम को कब गाँव वाले खुशिया चाचा कहने लगे, ठीक तरह से याद नहीं। खुशिया चाचा को हर बात बढ़ा-चढ़ाकर करने की आदत थी । जेब में आठआने होते तो वह अस्सी रुपये बताता । कुछ पढ़ा हुआ था, किसी शहर में जा नौकरी की । जब गाँव लौटकर आता तो बढ़ी-बढ़ी बातें गाँव वालों को सुनाता । वहाँ एक कमरे के मकान में रहता था ...मगर कहता उसे आलीशान मकान ।
एक और बात ...वह ' छ'/'श' को 'स'  बोलता....जैसे खुसी राम , सोटापुर ।
उसे एक बात दिन-रात सता रही थी.....कि वह बाबू लोगों की तरह सूट-बूट पहनता है...उन्ही की तरह उठता-बैठता है....फिर भी वह कैसे जान जाते हैं कि मैं खुसी राम सोटापुर वाला हूँ।
फिर वह अपना नाम के. आर. समालपुर बताने लगा । परन्तु गाँव वालों के लिए तो वह खुशिया चाचा ही था।शहर में दूसरों की देखा -देखी विदेश जाने का भूत उस पर भी सवार हो गया । उस ने किसी विदेशी कंपनी में नौकरी के लिए निवेदन पत्र भेज दिया । कुछ दिनों बाद खुशी राम को पत्र का जवाब कुछ ऐसे मिला ।
Dear Mr. Khushi Ram,
I am writing in regard to your application. Thank you for your interest and time taken to send it. You do not meet our requirements. Please do not send any further correspondence. No phone call shall be entertained.
Thanks
Nathan McMillan

विदेश से आया पत्र देखकर खुशी राम खुशी से उछलने लगा । दूसरे ही दिन गाँव पहुँचा और गाँव वालों को एकत्र  किया और बताने लगा कि मुझे विदेश में नौकरी मिल गई है। मैं आप सब को अपना अपॉइन्ट्मैंट लैटर यानि कि नियुक्ति  पत्र पढ़कर सुनाता हूँ, लेकिन पत्र अंग्रेजी में  है ....मैं साथ-साथ हिन्दी में  भी अनुवाद करूँगा .......

Dear Mr. Khushi Ram,
 बहुत प्यारे खुसिया भईया,

I am writing ..... मैं लिख रहा हूँ......in regard to your .....आप ही के बारे मा  ..........application. Thank you .....अपलीकेसन (पत्र)  भेजने का बहुत-बहुत धन्यवाद........for your interest......आप तो बहुत ही दिलचस्प हो and time taken to send it..... और इसको ( पत्र ) भेजने मा  इतना समय क्युँ  लगा दिया ।  You do not meet ....आप तो मिलते ही नहीं हो.....our requirements......हमको ज़रूरत है.... Please do not send any further correspondence.......अब लैटर-वैटर भेजने की कोई ज़रूरत नाही ।  No phone call... फुनवा का भी ज़रूरत नाही  ..... shall be entertained.....बहुत खातिर की जाएगी ।
Thanks....आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ।
Nathan McMillan.......तोहरा नथ्थु  !!!!!!
  
हरदीप संधु



Saturday, September 18, 2010

रब न मिला



















पूजा के उपरान्त

अगरबत्ती की राख ही

हाथ आई थी मेरे

बहुत ढूँढा....बहुत ही ढूँढा

रब न मिला मुझे

एक दिन मन में

 रब को  मिलने की ठानी

खाना न मैं खाऊँगी

मैं भूखी ही मर जाऊँगी

जब तक  रब को न  पाऊँगी 

तभी एक भिखारी ने

मेरे द्वार आ दस्तक दी

भूखा था वो शायद

माँग  रहा था वो खाना

मैने कहा अभी नहीं

मैं तो रब को खोज रही हूँ

थोड़ी देर बाद तुम आना

फिर एक कुतिया  ने

मेरे सामने आ चऊँ -चऊँ  की

भूखी होगी वो भी शायद

पर मैने उसे भी फटकारा

थोड़ी देर बाद...

एक बूढ़ी अम्मा आकर बोली

बेटी रास्ता भूल गई हूँ

और सुबह से भूखी भी हूँ

क्या थोड़ा खाने को दोगी

मैने कहा .....

जा.. रे.. जा... 

जा... रे... अम्मा

रास्ता नाप तू अपना

मैं तो कर रही हूँ

इन्तज़ार अपने रब का  

 तभी आसमान में

गूँजी एक आवाज़

किस रब का

है तुझे  इन्तज़ार 

मैं तो आया 

तीन बार तेरे द्वार

पर तूने मुझे 

ठुकराया बार-बार

अगर रब को है तुमने पाना

छोड़ दे तू इधर-उधर भटकना
 
मैं तो हर कण में हूँ

और रहता तेरे पास ही हूँ

ज़रा  अपने मन की

खोल तू आँखे

पाओगी मुझे

हर प्राणी में

हरदीप संधु

Wednesday, September 15, 2010

चाटी की लस्सी













चाटी की लस्सी
गाँव जाकर मांगी
अम्मा हँसती
जी हाँ....आज बात होने जा रही है....पंजाब की 'चाटी की लस्सी' की !!!
 चाटी की लस्सी जैसा कुछ और  बना ही नहीं आज तक जिस का उदाहरण देकर आपको बताया जा सके कि इस का स्वाद ऐसा होता है....जिस ने इसको पीया है...वह ही जानता है.......
चलें सबसे पहले इसे कैसे बनाया जाता है....बता दें...... 















 सुबह होते ही दूध को काड़नी

( मिट्टी का मटके जैसा बरतन) में डालकर हारे ( तंदूर जैसा) में

उपलों की धीमी-धीमी आंच पर दिनभर धीरे-धीरे  उबलने के लिए

रखा जाता है ।  ऐसा करने से दूध का रंग थोड़ा बादामी सा हो

जाता है ।   
    










 


हारा 
शाम को कढ़े हुए दूध को चाटी ( मिट्टी का बरतन- मटके जैसा ...जिस का मुँह थोड़ा बड़ा होता है) थोड़ा दही का जामुन ( जाग) लगाकर रख दिया जाता है ।



















सुबह होते ही चाटी में मधानी डाल दही को रिड़क लिया जाता है। 
 रिड़कने से दही से मक्खन और लस्सी बन जाती है। इस लस्सी का रंग बादामी होता है।

















  
चाटी व मधानी 
 चाटी की लस्सी पहले केवल गाँव में ही प्रचलत थी । इसे पशुओं को भी पिलाया जाता था ।
शहर के लोग इसे बेकार की चीज़ कहते थे । परन्तु जब उन्हें इस लस्सी के गुण मालूम हुए...तो पता तो वह इसे पीने को तरस गए । 
 









  
शहर में आई गाँव से चाटी की लस्सी
 इस लस्सी की खास बात यह है कि यह १००% फ़ैटफरी होने के साथ-साथ प्रोटीन व मिनरल से भरपूर है । 









 फिर तेज़ रफ़तार होते ज़माने में इलैकर्टिक मधानी आई ...... 

लेकिन आजकर चाटी की लस्सी गाँव में भी नहीं मिलती  क्योंकि माडर्न हुए लोगों ने चुल्ले-हारे  तोड़ डाले....दूध बेचने लगे और लस्सी को छोड़कर कोक पीने लगे ।
  आज के ज़माने को एक नया नाम दिया जाने लगा है....''एनटीक का ज़माना''      
 अब जब सब पुरानी चीज़ें पास नहीं रही लोग उन्हें पाने के लिए बेताब होने लगे हैं ।
चाटी की लस्सी भी बड़े-बड़े होटलों के मीनू ( व्यंजन सूची) में सबसे ऊपर  होती है । 











  पंजाबी ढाबे तो इस लस्सी के लिए सबसे आगे हैं यहाँ  चाटी की लस्सी को इस का  असली स्वाद देने के लिए दूध को बिल्कुल वैसे ही हारों में कढ़ने के लिए रखा जाता है जैसे आज से तीन-चार दशक पहले पंजाब के हर गाँव के प्रत्येक घर में रखा जाता था ।  
 अब तक तो आप जान गए होंगे कि लस्सी मांगने पर अम्मा क्यों हँसी ???

  हरदीप कौर संधु                                                 

Sunday, September 12, 2010

कुछ मीठा हो जाए....

















1.      आकाश में उडते बादलों को देखकर
         आकाश में उडते बादलों को देखकर
         यह ख्याल आया.....
        ओ लै छाता तो मैं घर में ही भूल आया
2.     राहे-राह सी तुरिया जांदा
        राहे-राह सी तुरिया जांदा
       ते मोड़ आया.....
       मोड़ आया-मुड़ गया
3.     इन ठंडी रातों में
       रिमझिम सी बरसातों में
       ओ मलमल के कुर्ते वाले
       की तैनू ठंड नहीं लगदी ?
4.    आकाश में उडती चिड़िया ने सोचा
      आकाश में उडती चिड़िया ने सोचा
      कि बिठ किथ्थे करां ?
5.   अकसर मैं बरसातों में
     यही सोचा करती हूँ
      कि मंजी किथ्थे डाहाँ ?
6.  तेरी सुन्दर चाल है ऐसी
    तेरी सुन्दर चाल है ऐसी
    जैसे उपलों पर कौआ चलता


हरदीप संधु

Wednesday, September 8, 2010

नानी का बाग*















तब मैं बहुत ही छोटी थी

नानी जब चल बसी

मुझे तो उसका चेहरा भी

याद नहीं है कोई

माँ ने रखी हैं सँभा

नानी की निशानियाँ

जिनमें से मैं नानी का

चेहरा ढूँढ लेती हूँ

माँ ने दी कीमती सौगात

नानी के हाथों बनाया बाग*

जब हुए विवाह के शगुन मेरे

'नानी बाग' रहा पास ही मेरे

सबसे पहले हुई ' नहाई-धोई'

नानी बाग ने मुझे  'आँचल' में भर लिया

ऐसे लगा जैसे नानी ने

मुझसे आ गलबहियाँ  पाई

आनंद कारज  के बाद सगे-सम्बन्धियों ने

जोड़ी को जब शगुन दिए

इस बाग ने दी आशीष

बेटा रहो जुग-जुग जीते

बाग में लपेटकर अपना दुलार

माँ ने दिया नानी का  प्यार

बेटी को जब विदा किया ससुराल

माँ-नानी की यह निशानी

रखती हूँ मैं लगाकर ह्रदय से

अपनी बेटी को दूँगी मैं

उसके विवाह के शगुन जब होंगे

नानी की दी हुई प्यार-आशीष

मेरी बेटी को भी मिल जाए

नानी के गुणों की पोटली

पीढ़ी-दर-पीढ़ी  सँभाली जाए !!!

*बाग...फुलकारी की तरह होता है लेकिन इस पर ज़्यादा कढ़ाई होती है। कढ़ाई के लिए खादी  का कपड़ा प्रयोग किया जाता है । एक खास बात और है....कढ़ाई रेश्मि के धागे से और हाथ से की होती है। यह तकरीबन २.५  मीटर लम्बा और  १ मीटर चौड़ा होता है। आजकल ऐसी कढ़ाई नहीं मिलती ।
यह कीमती बाग-फुलकारियाँ पंजाब में विवाह के समय प्रयोग होते हैं । लोगों ने इन्हे 'वालहैंगिन्ग' बनाकर दीवारों को भी सजा रखा है ।
यह तस्वीर मेरी नानी द्वारा बनाए 'बाग' की है ।

हरदीप कौर संधु

Saturday, September 4, 2010

गधा कौन ?


मानव जात कहे

मैं हूँ बुद्धिहीन

पता नहीं.....

यह पदवी उसने

मुझे क्यों दी ?

किसी  को बेवकूफ़

जब वो कहना चाहे

मेरे नाम से उसे पुकारे

कभी क्रोध न मुझे आया

सूखा - सड़ा घास

जैसा भी डाला

मैने खुशी से खाया

चेहरे पर मेरे

कभी असंतोष न छाया

सुख हो.....

चाहे दु:ख हो भला

कभी न बदलूँ

रहूँ एक सा

चाहे मुझमें हैं ढेरों गुण

पर बेवकूफ़ मुझे कहते तुम

किसी की अच्छाई.....

जो पहचान नहीं सकता

उससे बड़ा बेवकूफ़

हो ही नहीं सकता !!!


हरदीप कौर संधु