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Friday, May 21, 2010

चिड़िया - कबूतर पकड़ना


बचपन में
नन्हों की
नन्हीं नन्हीं सी बातें
टोकरी ले
छोटी सी छड़ी से
थोड़ा टेड़ा करते
छड़ी को
एक लम्बी रस्सी बाँधते
टोकरी के नीचे
रोटी का चूरा
मुट्ठी भर दाने
थोड़ा सा पानी रखते
‌फिर किसी कोने में
चुपके से जा छुपते
शोर मत करना
साथियों को कहते
पक्षी उड़ते उड़ते
देख कर रोटी
दाने..... पानी
बिन टोकरी देखे
जैसे ही करीब आते
अपनी समझ में
हम फुर्ती दिखाते
धीरे से...
रस्सी खींचते
टोकरी गिरते
पक्षी उड़ते....
चिड़िया फुर्र....र..र
कबूतर फुर्र....र..र
पक्षी फु्र्र  कर जाते
हाथ मलते हम रह जाते
बिन साहस हारे
दोस्तों के सहारे
फिर टोकरी रखते
कभी- न- कभी
कोई- न- कोई
कबूतर - चिड़िया
पकड़ी जाती
पंखों को कर 
 हरा गुलाबी
छोड़ देते
खुले आकाश में
लगा कर अपने-अपने
नाम की परची
ये मेरी चिड़िया.....
वो तेरा कबूतर.....

हरदीप कौर संधु   

27 comments:

Manvider said...

khoobsurat likha hai ....badhaaee.

Manvider Bhimber

Shekhar Suman said...

blog jagat mein aapka swagat hai...
khushi kuyi jaankar ki aap desh se bahar rah kar bhi hindi ki sewa mein lagna chahti hain....
aur likhti to aap khu hain hi...........
bas yun hi likhti rahein...
mere blog par bhi aapka swagat hai....
http://i555.blogspot.com/

Babli said...

बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है!

योगेन्द्र मौदगिल said...

अच्छी रचना.... साधुवाद...

योगेन्द्र मौदगिल said...

अच्छी रचना.... साधुवाद..

Deepak Shukla said...

Hi..
Achha ji to aap chidia bhi pakadte the..

Achha hua aap chidia pakadne main nahi aayi..

Sundar shabd..

DEEPAK..

महफूज़ अली said...

हरदीप जी.... थैंक्स फॉर यौर वंडरफुल कमेन्ट..... आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा...

नॉव...विल रेगुलर ऑन योर ब्लॉग....


रिगार्ड्स....

Razi Shahab said...

bahut khoob likha aapne...

Tripat "Prerna" said...

ek bhola pan chalkta hai..aapki kaviton mein...

gud goin...
keep it up!

राजेन्द्र मीणा said...

वाह बहुत ही अच्छा लिखा है आपने ....रचना बहुत ही सुन्दर बन पड़ी है ,,,बड़े भोलेपन से लिखा है ,,,बचपन की यादें फिर से अंगडाई लेने लगी है ......हमारा बचपन भी ऐसे ही बीता है ...कई बार चिड़िया पकड़ी भी जाती थी ...हम उसे स्याही से रंग कर फिर से उड़ा देते थे ,,,,,,पहली बार आया आपके ब्लॉग पर .......बहुत सराहनीय प्रयास ...आपको किसी प्रकार का सुझाव देना उचित नहीं ....आप खुद एक परिपक्व व्यक्तित्व है पर मन में जो है वो ही कह देता हूँ अभी अच्छा लिखते हो ....लिखते रहोगे तो और अच्छा लिख पाओगे ,,,मेरा आशय यही है ..की बस अनवरत प्रयास करते रहिये ...अगर आप यूँ ही प्रयास करते रहे तो आपको खुद को महसूस होने लगेगा की आपकी लेखनी पहले से कई ज्यादा निखर रही है ...पर निरंतर चिंतन और लगन की आवश्यकता है ...लगन आप में है ....( आपकी रचना में दिखता है ) तो सोचने की क्षमता में अनायास ही प्रसार होगा ,,,,,रही बात टिप्पणियों की ....वो आये या ना आये ....आपको लेखन से सुकून अवश्य मिलेगा ....कुछ दिनों में टिप्पणिया बढ़ने लगेंगी ...अगर किसी की भी टिपण्णी देखे तो ८०% फिजूल होती है ....कई बार टिपण्णी केवल निमंत्रण ( अपने ब्लॉग पर ) के लिए दी जाती ..अगर आपको कोई सुझाव दे तो उस पर अमल करे .....एक दिन आपको मंजिल ..करीब नज़र आएगी ...अब जरूरत है सयंम की ....वो रहा तो ..समझो मंजिल मिल गयी .....और फिर हमारी शुभकामनाये हमेशा आपके साथ है ,,,,,,बस यही कहना है ..अगर किसी भी प्रकार की कोई ...समस्या हो तो हिन्दी ब्लॉग पर आपका एक मित्र सदैव तैयार है ....निसंकोच कहे .....आपके सुखद भविष्य की उम्मीद के साथ

राकेश कौशिक said...

छुटपन कि यादें साकार करने के लिए कितना दिलचस्प लगा शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता - प्रेरणा जी के कथन से पूरी तरह सहमत हूँ और तस्वीर तो गजब

राजेन्द्र मीणा said...

लिखते समय शब्दों की प्रिंट का ध्यान रखे ....इस से रचना की सुन्दरता थोड़ी कम होती है ...जैसे 'लम्मी' को 'लम्बी' करे ...ऐसी गलतिया सब से होती है ....अगर पोस्ट करने से पहले एक दो बार गौर से पढ़ा जाए तो शायद ना हो/// और हाँ अगर संभव हो तो शब्द पुष्टिकरण हटा दे ...हमें टिपण्णी देने में आसानी होगी .....धन्यवाद

Prem Farrukhabadi said...

हरदीप सँधू जी,
मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आपका धन्यबाद. बहुत अच्छी कविता लगी.बचपन की याद दिलाती है.बधाई !!

Dr.Ajeet said...

aapki rachna me samvedna bhi khub hai aur shilp bhee... ab aapko niyamit padha jayega...
Dr.Ajeet
www.shesh-fir.blogspot.com
www.monkvibes.blogspot.com

Amitraghat said...

"बचपन की ही तरह सीधी-सादी और भोली-सी कविता..."

माधव said...

अच्छी रचना.... साधुवाद..

अरुणेश मिश्र said...

हमे अपना बचपन याद आ गया ।
वह चिड़िया
वह डलिया
वह रस्सी
वह फुर्ती
वह फुर्र.......

ATI SUNDAR .

Kuldeep Saini said...

bachpan ki yaado me pahucha diya aapne bahut hi khoobsoorat maza aa gaya

pawan dhiman said...

Bahut khoob Hardeep ji.

Asha said...

A nice poem .
asha

vijaymaudgill said...

बहुत ख़ूब। भोली-भाली ते मासूम ते प्यारी जिही कविता।
मेरे हत्थां ते चोगा है
पता नहीं क्यों
परिंदे हुण दाणा चुगण नहीं आउंदे।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत अच्छी कविता!

mridula pradhan said...

wah......

manjeet said...

kya mazedaar kareeda yaad dilaayi ... dhanyawaad

दीनदयाल शर्मा said...

बाल शरारतों की सहज अभिव्यक्ति...बहुत ही अच्छी कविता लिखी है..हार्दिक बधाई..

संजय भास्कर said...

हरदीप सँधू जी,
कविता बहुत अच्छी लगी. !!

Udan Tashtari said...

हाय वो बचपन की बातें....कोमल अभिव्यक्ति!