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Thursday, July 8, 2010

नन्हे हाथ



प्रभु हमारे क्यों पेट लगाया ?

हमें कैसे काम लगाया ?

कलम-किताब तो दूर की बातें 

नन्हे- नन्हे कोमल हाथों

हम रोज़ ईंट बनाएँ

अपना बचपन यूँ ही गवाएँ


हरदीप कौर संधु  

21 comments:

डॉ टी एस दराल said...

बाल श्रम , बहुत सेंसिटिव मुद्दा उठाया है अपने ।
एक कठोर सत्य ।
सर्वव्यापी।

निर्मला कपिला said...

सही बात है गरीब क्या करे बच्चों को पढाये या उनका पेट ्रें मगर बच्चों की शिकायत भी सही है। अच्छा मुद्दा उठाया कविता के माध्यम से। आभार।

अरुणेश मिश्र said...

हरदीप जी ! आपने बाल श्रम एवं उत्पीड़न को लक्ष्य कर संवेदनशील मुद्दे को स्वर दिया है ।
बधाई ।

दीनदयाल शर्मा said...

ये कैसी मजबूरी ,
भोजन भी है जरूरी..

main... ratnakar said...

bahut achchha likha hai, ise padh kar kaafee pehle padha ek sher yaad aa gaya

copy pe chand roz se
alfaz kee jagah
kuchh bhookhe bachche
banane lage hain rotiyaan



aur haan, paheliyan padha kar to aap ne bachpan kee yaade tazaa kar deen. bahut achchha laga aap ka blog dekh kar

ओम पुरोहित'कागद' said...

हरदीप जी,
अच्छी कविता-नेक ख्याल !
दब के लिखो !
रज्ज के लिखो ! !
पुज्ज के लिखो ! ! !
पर इंज चज्ज दा लिखो!
*मेरियां पहेलियां खू विच्च सिट्ट दित्तिया के? ओनां नूं वी संभाळो जी !

डा. अरुणा कपूर. said...

बाल-श्रमिकों की समस्या, बहुत बडी समस्या है!...आपने सही मुद्दा उठाया है!

anjana said...

बाल मजदूरी एक् अभिशाप है ।बहुत ही संवेदनशील मुद्दा उठाया है आप ने।आभार

मोहन वशिष्‍ठ 9991428447 said...

oh bahut sunder likha aapne behatrin

बेचैन आत्मा said...

अच्छे भाव हैं।

हरकीरत ' हीर' said...

बालकों से श्रम करवाना अपराध है ....हालांकि अब ये कानून बन गया है ...पर अभी वक़्त लगेगा ......इस जागरूकता के लिए ....

अच्छी रचना .....!!

डॉ. हरदीप सँधू said...

सभी दोस्तों का मैं दिल से धन्यवाद करती हूँ।
आप ने अपना कीमती वकत 'शब्दों का उजाला' को दिया।
बस यूँ ही आते रहिए....और हौसला बढ़ता रहें।

दिगम्बर नासवा said...

बहुत संजीदा पोस्ट ... समस्या को बाखूबी उठाता है ये रचना ....

PRAN SHARMA said...

THODE SHABDON MEIN HEE AAPNE POOREE
KAHANI BYAAN KAR DEE HAI.BADHAAEE.

रचना दीक्षित said...

बहुत ही संवेदनशील मुद्दा उठाया है

भूतनाथ said...

हरदीप जी,मुद्दा प्रासंगिक है....मगर बुरा मत मान जाना आप...मैं चाहता था कविता भी उतनी ही मार्मिक बन पड़ती तो और बेहतर होता....क्योंकि कुछ बातें कुछ ज्यादा गहराई चाहती हैं....है ना हरदीप....!!!

psingh said...

sahi mudda uthaya apne
bahaiyan

Manoj Bharti said...

एक सार्थक रचना ...

हम रोज़ ईंट बनाएँ
अपना बचपन यूँ ही गवाएँ

बचपन के इन नन्हें हाथों में जहां किताब होनी चाहिए थी वहाँ पेट के लिए मजदूरी करना...क्या इन नन्हें हाथों के लिए अभिशाप नहीं ।

संजय भास्कर said...

एक सार्थक रचना ...

संजय भास्कर said...

ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया.

par mere apne blog par aapka swagat hai...

http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Udan Tashtari said...

एक कटु सत्य को उजागर करती रचना. बहुत उम्दा!