Followers- From 17 May 2010.....'til today

Saturday, August 28, 2010

ओ कलम के धनी !


कलम से ज्यादा

ताकत नहीं रखती तलवार

लेकिन कलम की भी

होती है तेज़ धार

लिखती है कलम तेरी

रोज़ बड़ी-बड़ी बातें

भूल जाती है वो

हँसी देने वाली

छोटी-छोटी सी बातें

करती है कलम तेरी

किसी लड़की संग

हुए प्रेम की चर्चा

या उस से बिछुड़ने के बाद

दर्द-आँसुओं को देती

तेरी कलम ऊँचा दर्जा

तेरी कलम ने बना दिया

'लड़की' को कोई

'उपभोग' की वस्तु

उसी से शुरू कर

उसी पर पूरा करता

अपना हर गीत तू

अपवित्रता शब्दों में नहीं

तेरी सोच में है....

अच्छा बनता है तू

लेकिन बुराई दिल में है

ओ कलम के धनी.....

अपने शब्दों से बुन

कोई ऐसा जाल

पढ़कर हो जाए

हर कोई निहाल !!!


हरदीप संधु

18 comments:

सहज साहित्य said...

हरदीप जी , जीवन और उसकी अभिव्यक्ति का सन्तुलन तभी सम्भव है जब मनसा , वाचा , कर्मणा (मन से , वाणी से , कर्म से)आदमी सच्चा हो ।'मन में छल/तो छलकेगा कैसे /सुधा का घट।'आपने अपनी इस कविता में इसी सच को बड़े सन्तुलन से प्रस्तुत किया है । मैंने तो आज सुबह -सुबह यही लिखा है-'वीणा के तार /कसोगे सही तभी/ गूंजेगा राग।"

ali said...

अच्छी कविता !

Babli said...

आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया !
बहुत सुन्दर और लाजवाब रचना लिखा है आपने जो प्रशंग्सनीय है! मुझे तस्वीर बहुत अच्छी लगी! रचना के साथ मेल खाती हुई उम्दा तस्वीर! क्या आपने ये तस्वीर गूगल से ढूंढ़कर निकाला?

मनोज कुमार said...

ओ कलम के धनी.....

अपने शब्दों से बुन

कोई ऐसा जाल

पढ़कर हो जाए

हर कोई निहाल !!!
बहुत सुंदर संदेश!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी पोस्ट रविवार २९ -०८ -२०१० को चर्चा मंच पर है ....वहाँ आपका स्वागत है ..

http://charchamanch.blogspot.com/
.

वाणी गीत said...

कलम के धनियों से कुछ सार्थक लिखने की अपील कविता में ...
सुन्दर !

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी कविता।

हिंदी, नागरी और राष्ट्रीयता अन्योन्याश्रित हैं।

पवन धीमान said...

लिखती है कलम तेरी..रोज़ बड़ी-बड़ी बातें
भूल जाती है वो..हँसी देने वाली..छोटी-छोटी सी बातें
..sarthak aur vicharottejak rachna...

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) said...

रचनाधर्मिता का पाठ पढ़ाती हुई सुन्दर कविता|

डॉ टी एस दराल said...

बात तो आपकी सही है ।
सभी शायरों को यही हाल रहा है ।

कविता रावत said...

तेरी सोच में है....

अच्छा बनता है तू

लेकिन बुराई दिल में है

ओ कलम के धनी.....

अपने शब्दों से बुन

कोई ऐसा जाल

पढ़कर हो जाए

हर कोई निहाल !!!
...sundar bhavpurn rachna aur likhta chitra bahut achha laga...

upendra said...

bahoot achchhi kavita

अर्चना तिवारी said...

बहुत सुंदर..यथार्थ का चित्रण करती कविता

भूतनाथ said...

hardeep behad acchha likha hai....aur dekhna stri par main kuchh aisa likhkar saamne laaungaa....ki sabko mujhe stri hi maan lenaa hoga...!!

दिगम्बर नासवा said...

आपने तो कलाम की ताक़त का अंदाज़ा बता ही दिया इस लाजवाब रचना को गढ़ कर ....

मो सम कौन ? said...

हरदीप जी, अच्छी अपील की है आपने। हम वही लिखते हैं जो हमारे मन में होता है। सोच अच्छी होगी तो अच्छा ही लिखा जायेगा।
प्रेरक विचार हैं आपके।

सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

bahut sundar kavita,
कृपया अपने बहुमूल्य सुझावों और टिप्पणियों से हमारा मार्गदर्शन करें:-
अकेला या अकेली

दीनदयाल शर्मा said...

यथार्थ का चित्रण करती .........लाजवाब रचना.....धन्यवाद......