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Thursday, September 30, 2010

पति है राजा...पत्नी रानी...

इस कविता का पहला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक सहज साहित्य   कीजिए 


















           पति तो परमेश्रर ही है
             पत्नी का है कहना
       परमेश्रर वाला एक भी गुण
        चाहे पति सीख सके ना
              पति-पत्नी ....
        जीवन के हैं दो पहिये
      जीवन को चलाने के लिए
         दोनों ही हमें चाहिए
          यह बात पति ने 
         अब तक ना मानी
      करता फिरता फिर भी 
        वो अपनी मनमानी
     ऊँचा बोलकर रौब जमाता
    तुझे घर सँभालना नहीं आता
     बड़ी-बड़ी बातें सीख  गया वो
    पत्नी-सम्मान करना नहीं आता
       अपनी नाकामी  का सेहरा
        पत्नी के सिर  ही  बाँधता 
         ठीक हो चाहे गलत
       बस अपनी ही हाँकता
          पत्नी नहीं करती 
      कोई  गिला- शिक़वा 
          यही गुण उसे
        विरासत में मिला
         कोई बात नहीं 
        सुबह का भूला
          शाम को ....
       घर लौट आए
        हम दोनों तो 
        घी- शक्कर हैं
         कोई जुदा ...
       हमें कर न पाए
      माँ-बाप ने जब से 
    उसके जीवन की डोरी 
    पति के हाथ सँभाली
         तब से वह तो 
         उसी को  ही
   अपना सब कुछ मानती
         पति है राजा 
     वो है उसकी रानी
     दोनों से ही घर बनता है
    यही घर-घर की कहानी !!

हरदीप संधु 

Friday, September 24, 2010

खुशिया चाचा का अपॉइन्ट्मैंट लैटर







छोटापुर गाँव के खुशी राम को कब गाँव वाले खुशिया चाचा कहने लगे, ठीक तरह से याद नहीं। खुशिया चाचा को हर बात बढ़ा-चढ़ाकर करने की आदत थी । जेब में आठआने होते तो वह अस्सी रुपये बताता । कुछ पढ़ा हुआ था, किसी शहर में जा नौकरी की । जब गाँव लौटकर आता तो बढ़ी-बढ़ी बातें गाँव वालों को सुनाता । वहाँ एक कमरे के मकान में रहता था ...मगर कहता उसे आलीशान मकान ।
एक और बात ...वह ' छ'/'श' को 'स'  बोलता....जैसे खुसी राम , सोटापुर ।
उसे एक बात दिन-रात सता रही थी.....कि वह बाबू लोगों की तरह सूट-बूट पहनता है...उन्ही की तरह उठता-बैठता है....फिर भी वह कैसे जान जाते हैं कि मैं खुसी राम सोटापुर वाला हूँ।
फिर वह अपना नाम के. आर. समालपुर बताने लगा । परन्तु गाँव वालों के लिए तो वह खुशिया चाचा ही था।शहर में दूसरों की देखा -देखी विदेश जाने का भूत उस पर भी सवार हो गया । उस ने किसी विदेशी कंपनी में नौकरी के लिए निवेदन पत्र भेज दिया । कुछ दिनों बाद खुशी राम को पत्र का जवाब कुछ ऐसे मिला ।
Dear Mr. Khushi Ram,
I am writing in regard to your application. Thank you for your interest and time taken to send it. You do not meet our requirements. Please do not send any further correspondence. No phone call shall be entertained.
Thanks
Nathan McMillan

विदेश से आया पत्र देखकर खुशी राम खुशी से उछलने लगा । दूसरे ही दिन गाँव पहुँचा और गाँव वालों को एकत्र  किया और बताने लगा कि मुझे विदेश में नौकरी मिल गई है। मैं आप सब को अपना अपॉइन्ट्मैंट लैटर यानि कि नियुक्ति  पत्र पढ़कर सुनाता हूँ, लेकिन पत्र अंग्रेजी में  है ....मैं साथ-साथ हिन्दी में  भी अनुवाद करूँगा .......

Dear Mr. Khushi Ram,
 बहुत प्यारे खुसिया भईया,

I am writing ..... मैं लिख रहा हूँ......in regard to your .....आप ही के बारे मा  ..........application. Thank you .....अपलीकेसन (पत्र)  भेजने का बहुत-बहुत धन्यवाद........for your interest......आप तो बहुत ही दिलचस्प हो and time taken to send it..... और इसको ( पत्र ) भेजने मा  इतना समय क्युँ  लगा दिया ।  You do not meet ....आप तो मिलते ही नहीं हो.....our requirements......हमको ज़रूरत है.... Please do not send any further correspondence.......अब लैटर-वैटर भेजने की कोई ज़रूरत नाही ।  No phone call... फुनवा का भी ज़रूरत नाही  ..... shall be entertained.....बहुत खातिर की जाएगी ।
Thanks....आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ।
Nathan McMillan.......तोहरा नथ्थु  !!!!!!
  
हरदीप संधु



Saturday, September 18, 2010

रब न मिला



















पूजा के उपरान्त

अगरबत्ती की राख ही

हाथ आई थी मेरे

बहुत ढूँढा....बहुत ही ढूँढा

रब न मिला मुझे

एक दिन मन में

 रब को  मिलने की ठानी

खाना न मैं खाऊँगी

मैं भूखी ही मर जाऊँगी

जब तक  रब को न  पाऊँगी 

तभी एक भिखारी ने

मेरे द्वार आ दस्तक दी

भूखा था वो शायद

माँग  रहा था वो खाना

मैने कहा अभी नहीं

मैं तो रब को खोज रही हूँ

थोड़ी देर बाद तुम आना

फिर एक कुतिया  ने

मेरे सामने आ चऊँ -चऊँ  की

भूखी होगी वो भी शायद

पर मैने उसे भी फटकारा

थोड़ी देर बाद...

एक बूढ़ी अम्मा आकर बोली

बेटी रास्ता भूल गई हूँ

और सुबह से भूखी भी हूँ

क्या थोड़ा खाने को दोगी

मैने कहा .....

जा.. रे.. जा... 

जा... रे... अम्मा

रास्ता नाप तू अपना

मैं तो कर रही हूँ

इन्तज़ार अपने रब का  

 तभी आसमान में

गूँजी एक आवाज़

किस रब का

है तुझे  इन्तज़ार 

मैं तो आया 

तीन बार तेरे द्वार

पर तूने मुझे 

ठुकराया बार-बार

अगर रब को है तुमने पाना

छोड़ दे तू इधर-उधर भटकना
 
मैं तो हर कण में हूँ

और रहता तेरे पास ही हूँ

ज़रा  अपने मन की

खोल तू आँखे

पाओगी मुझे

हर प्राणी में

हरदीप संधु

Wednesday, September 15, 2010

चाटी की लस्सी













चाटी की लस्सी
गाँव जाकर मांगी
अम्मा हँसती
जी हाँ....आज बात होने जा रही है....पंजाब की 'चाटी की लस्सी' की !!!
 चाटी की लस्सी जैसा कुछ और  बना ही नहीं आज तक जिस का उदाहरण देकर आपको बताया जा सके कि इस का स्वाद ऐसा होता है....जिस ने इसको पीया है...वह ही जानता है.......
चलें सबसे पहले इसे कैसे बनाया जाता है....बता दें...... 















 सुबह होते ही दूध को काड़नी

( मिट्टी का मटके जैसा बरतन) में डालकर हारे ( तंदूर जैसा) में

उपलों की धीमी-धीमी आंच पर दिनभर धीरे-धीरे  उबलने के लिए

रखा जाता है ।  ऐसा करने से दूध का रंग थोड़ा बादामी सा हो

जाता है ।   
    










 


हारा 
शाम को कढ़े हुए दूध को चाटी ( मिट्टी का बरतन- मटके जैसा ...जिस का मुँह थोड़ा बड़ा होता है) थोड़ा दही का जामुन ( जाग) लगाकर रख दिया जाता है ।



















सुबह होते ही चाटी में मधानी डाल दही को रिड़क लिया जाता है। 
 रिड़कने से दही से मक्खन और लस्सी बन जाती है। इस लस्सी का रंग बादामी होता है।

















  
चाटी व मधानी 
 चाटी की लस्सी पहले केवल गाँव में ही प्रचलत थी । इसे पशुओं को भी पिलाया जाता था ।
शहर के लोग इसे बेकार की चीज़ कहते थे । परन्तु जब उन्हें इस लस्सी के गुण मालूम हुए...तो पता तो वह इसे पीने को तरस गए । 
 









  
शहर में आई गाँव से चाटी की लस्सी
 इस लस्सी की खास बात यह है कि यह १००% फ़ैटफरी होने के साथ-साथ प्रोटीन व मिनरल से भरपूर है । 









 फिर तेज़ रफ़तार होते ज़माने में इलैकर्टिक मधानी आई ...... 

लेकिन आजकर चाटी की लस्सी गाँव में भी नहीं मिलती  क्योंकि माडर्न हुए लोगों ने चुल्ले-हारे  तोड़ डाले....दूध बेचने लगे और लस्सी को छोड़कर कोक पीने लगे ।
  आज के ज़माने को एक नया नाम दिया जाने लगा है....''एनटीक का ज़माना''      
 अब जब सब पुरानी चीज़ें पास नहीं रही लोग उन्हें पाने के लिए बेताब होने लगे हैं ।
चाटी की लस्सी भी बड़े-बड़े होटलों के मीनू ( व्यंजन सूची) में सबसे ऊपर  होती है । 











  पंजाबी ढाबे तो इस लस्सी के लिए सबसे आगे हैं यहाँ  चाटी की लस्सी को इस का  असली स्वाद देने के लिए दूध को बिल्कुल वैसे ही हारों में कढ़ने के लिए रखा जाता है जैसे आज से तीन-चार दशक पहले पंजाब के हर गाँव के प्रत्येक घर में रखा जाता था ।  
 अब तक तो आप जान गए होंगे कि लस्सी मांगने पर अम्मा क्यों हँसी ???

  हरदीप कौर संधु                                                 

Sunday, September 12, 2010

कुछ मीठा हो जाए....

















1.      आकाश में उडते बादलों को देखकर
         आकाश में उडते बादलों को देखकर
         यह ख्याल आया.....
        ओ लै छाता तो मैं घर में ही भूल आया
2.     राहे-राह सी तुरिया जांदा
        राहे-राह सी तुरिया जांदा
       ते मोड़ आया.....
       मोड़ आया-मुड़ गया
3.     इन ठंडी रातों में
       रिमझिम सी बरसातों में
       ओ मलमल के कुर्ते वाले
       की तैनू ठंड नहीं लगदी ?
4.    आकाश में उडती चिड़िया ने सोचा
      आकाश में उडती चिड़िया ने सोचा
      कि बिठ किथ्थे करां ?
5.   अकसर मैं बरसातों में
     यही सोचा करती हूँ
      कि मंजी किथ्थे डाहाँ ?
6.  तेरी सुन्दर चाल है ऐसी
    तेरी सुन्दर चाल है ऐसी
    जैसे उपलों पर कौआ चलता


हरदीप संधु

Wednesday, September 8, 2010

नानी का बाग*















तब मैं बहुत ही छोटी थी

नानी जब चल बसी

मुझे तो उसका चेहरा भी

याद नहीं है कोई

माँ ने रखी हैं सँभा

नानी की निशानियाँ

जिनमें से मैं नानी का

चेहरा ढूँढ लेती हूँ

माँ ने दी कीमती सौगात

नानी के हाथों बनाया बाग*

जब हुए विवाह के शगुन मेरे

'नानी बाग' रहा पास ही मेरे

सबसे पहले हुई ' नहाई-धोई'

नानी बाग ने मुझे  'आँचल' में भर लिया

ऐसे लगा जैसे नानी ने

मुझसे आ गलबहियाँ  पाई

आनंद कारज  के बाद सगे-सम्बन्धियों ने

जोड़ी को जब शगुन दिए

इस बाग ने दी आशीष

बेटा रहो जुग-जुग जीते

बाग में लपेटकर अपना दुलार

माँ ने दिया नानी का  प्यार

बेटी को जब विदा किया ससुराल

माँ-नानी की यह निशानी

रखती हूँ मैं लगाकर ह्रदय से

अपनी बेटी को दूँगी मैं

उसके विवाह के शगुन जब होंगे

नानी की दी हुई प्यार-आशीष

मेरी बेटी को भी मिल जाए

नानी के गुणों की पोटली

पीढ़ी-दर-पीढ़ी  सँभाली जाए !!!

*बाग...फुलकारी की तरह होता है लेकिन इस पर ज़्यादा कढ़ाई होती है। कढ़ाई के लिए खादी  का कपड़ा प्रयोग किया जाता है । एक खास बात और है....कढ़ाई रेश्मि के धागे से और हाथ से की होती है। यह तकरीबन २.५  मीटर लम्बा और  १ मीटर चौड़ा होता है। आजकल ऐसी कढ़ाई नहीं मिलती ।
यह कीमती बाग-फुलकारियाँ पंजाब में विवाह के समय प्रयोग होते हैं । लोगों ने इन्हे 'वालहैंगिन्ग' बनाकर दीवारों को भी सजा रखा है ।
यह तस्वीर मेरी नानी द्वारा बनाए 'बाग' की है ।

हरदीप कौर संधु

Saturday, September 4, 2010

गधा कौन ?


मानव जात कहे

मैं हूँ बुद्धिहीन

पता नहीं.....

यह पदवी उसने

मुझे क्यों दी ?

किसी  को बेवकूफ़

जब वो कहना चाहे

मेरे नाम से उसे पुकारे

कभी क्रोध न मुझे आया

सूखा - सड़ा घास

जैसा भी डाला

मैने खुशी से खाया

चेहरे पर मेरे

कभी असंतोष न छाया

सुख हो.....

चाहे दु:ख हो भला

कभी न बदलूँ

रहूँ एक सा

चाहे मुझमें हैं ढेरों गुण

पर बेवकूफ़ मुझे कहते तुम

किसी की अच्छाई.....

जो पहचान नहीं सकता

उससे बड़ा बेवकूफ़

हो ही नहीं सकता !!!


हरदीप कौर संधु

Wednesday, September 1, 2010

जन्माष्टमी

जन्माष्टमी की बहुत-बहुत बधाई !!!!!!

 

 

 

 

 

 

 

 

1.    मीरा के गिरधर

माखनचोर नटवर

वो हैं कृष्ण कन्हैया

2.   बंशी बजैया

नटखट कन्हैया

नन्दकिशोर

3.   सोलह कलाओं का

मोरपंखी मुकुटधारी

वृन्दावन विहारी

4.  विष्णु का अवतार

अज्ञान के अन्धकार में

ले आया उजियार

5.  नन्द ने पाला

संसार उसे कहे

नन्द का लाला

हरदीप संधु