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Saturday, September 4, 2010

गधा कौन ?


मानव जात कहे

मैं हूँ बुद्धिहीन

पता नहीं.....

यह पदवी उसने

मुझे क्यों दी ?

किसी  को बेवकूफ़

जब वो कहना चाहे

मेरे नाम से उसे पुकारे

कभी क्रोध न मुझे आया

सूखा - सड़ा घास

जैसा भी डाला

मैने खुशी से खाया

चेहरे पर मेरे

कभी असंतोष न छाया

सुख हो.....

चाहे दु:ख हो भला

कभी न बदलूँ

रहूँ एक सा

चाहे मुझमें हैं ढेरों गुण

पर बेवकूफ़ मुझे कहते तुम

किसी की अच्छाई.....

जो पहचान नहीं सकता

उससे बड़ा बेवकूफ़

हो ही नहीं सकता !!!


हरदीप कौर संधु

35 comments:

Udan Tashtari said...

किसी की अच्छाई.....
जो पहचान नहीं सकता
उससे बड़ा बेवकूफ़
हो ही नहीं सकता !!



-बिल्कुल सत्य!

ali said...

सही है !

Bhushan said...

अरे यह तो मुहावरा ही बदल गया. हम इसके बारे में क्या सोचते थे और यह हमारे बारे में कितनी सटीक जानकारी रखता है.

ललित शर्मा-ললিত শর্মা said...


बेहतरीन लेखन के बधाई


आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

राजभाषा हिंदी said...

यथार्थ लेखन। अच्छा संदेश।
हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।
स्‍वच्‍छंदतावाद और काव्‍य प्रयोजन , राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

सहज साहित्य said...

अज्ञेय जी ने गधे को धैर्यधन कहा है ।आदमी में इतनी भयावह तृष्णा बढ़ती जा रही है कि वह कभी इतना धैर्यवान् नहीं हो सकता ।अछुते विषय पर अच्छी कविता है , साथ ही इस कविता में अच्छा सन्देश भी निहित है।

अन्तर सोहिल said...

सच में
बहुत बढिया

प्रणाम

मनोज कुमार said...

इस कविता को मस्तिस्क से न पढ़कर बोध के स्तर पर पढ़ना जरूरी है – तभी यह कविता खुलेगी।

फ़ुरसत में .. कुल्हड़ की चाय, “मनोज” पर, ... आमंत्रित हैं!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

किसी की अच्छाई.....

जो पहचान नहीं सकता

उससे बड़ा बेवकूफ़

हो ही नहीं सकता !!!

बहुत सही बात ...वैसे मुझे लगता है कि गधा दार्शनिक होता है ...सुख दुःख दोनों अवस्थाओं में शांत रहने वाला ..

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

वाह्! सही...

डॉ टी एस दराल said...

बहुत बढ़िया जी ।
वैसे कोई तो वज़ह रही होगी --गधे को गधा कहने की ।

अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

राकेश कौशिक said...

जी बिलकुल सही - प्रेरक सन्देश

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH said...

गधा कौन?
मैं!
आशीष

Shah Nawaz said...

बेवक़ूफ़ कहलाए जाने वाले समझदार ने सही कहा.


मेरी ग़ज़ल:
मुझको कैसा दिन दिखाया ज़िन्दगी ने

Patali-The-Village said...

बहुत बढ़िया जी |

मो सम कौन ? said...

ਬਹੁਤ ਵਦਿਯਾ ਲਗੀ ਜੀ ਕਵਿਤਾ ਤੁਹਾਡੀ|

मो सम कौन ? said...

ਬਹੁਤ ਵਦਿਯਾ ਲਗੀ ਜੀ ਕਵਿਤਾ ਤੁਹਾਡੀ|

Pratul said...

बचपन में मुझे मेरे पिता ने एक गड़बड़ कविराय जी एक कविता सुनायी थी —
"गदहे में गुन बहुत हैं, सदा पालिये भाय.
बोझा ढोवे घर रहे प्रातः देय जगाय.
प्रातः देय जगाय करे नित ढेंचू ढेंचू
जैसे करे सहाय मील का पहला भोंपू.
कह गड़बड़ कविराय यदि आप दुलत्ती बचा लें.
तो सब छोड़े अश्व आप सब गदहा पालें."
>>>>> आप कहीं दुलत्ती ना जड़ दें इसी मारे सभी बारी-बारी आपकी प्रशंसा करने में लगे हैं. लेकिन मैं दूर खड़ा होकर कहता हूँ कि 'जो भी दो वो खा लो' वाला सीधापन गदहे की विशेषता है लेकिन आदमी के सन्दर्भ में यह सीधापन गधापन कहलाने लगा है. आदमी अपने आदमी होने से जब संतुष्ट नहीं होता तब ही वह खुद को, औरों को पदवियों से नवाजता है.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

फिर भी गधा तो गधा ही होता है :)

हास्यफुहार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

Mahendra Arya said...

गधा सही बोलता है . धन्यवाद भगवन आपने जानवरों को इन्सान की भाषा नहीं सिखाई , वर्ना हर जानवर बहुत कुछ सुनाता हमें . बहुत बधाई इस अर्थपूर्ण कविता के लिए

Surendra Singh Bhamboo said...

ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

मालीगांव
साया
लक्ष्य

हमारे नये एगरीकेटर में आप अपने ब्लाग् को नीचे के लिंको द्वारा जोड़ सकते है।
अपने ब्लाग् पर लोगों लगाये यहां से
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RAJWANT RAJ said...

gunge ki aawaj bnna achchhi mansikta ka prichayk hai .sath hi is jeev ki darshnik viratta bhi abhivykt ho gai hai jise log aksar kya bhutayt me
andekha kr dete hai .
umda post . bdhai .

आनन्‍द पाण्‍डेय said...

ब्‍लागजगत पर आपका स्‍वागत है ।

किसी भी तरह की तकनीकिक जानकारी के लिये अंतरजाल ब्‍लाग के स्‍वामी अंकुर जी,
हिन्‍दी टेक ब्‍लाग के मालिक नवीन जी और ई गुरू राजीव जी से संपर्क करें ।

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प्रसार में अपना योगदान दें ।
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हमें ईमेल से संपर्क करें pandey.aaanand@gmail.com पर अपना नाम व पूरा परिचय)

धन्‍यवाद

JHAROKHA said...

सुन्दर और सच कहती हुयी रचना---।

राकेश कौशिक said...

सीधा साधा इसलिए गधा कहे हर कोइ,
गधा उसे जो बोलता उससे गधा न कोइ !!!

बेचैन आत्मा said...

हा..हा..हा..

Prem Farrukhabadi said...

किसी की अच्छाई.....

जो पहचान नहीं सकता

उससे बड़ा बेवकूफ़

हो ही नहीं सकता !!!

bahut khob kaha hai aapne.

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

बहुत अच्छी सरल कविता जो फिर बच्चों के पठ्यक्रम के लायक है , बधाई। इस कविता को पढकर मैं सोच रहा था की "गधा"शब्द का निर्माण कैसे हुआ,उसे कैसे विषलेषित किया जा सकता है।पर मेरी बुद्धि असफ़ल रही। शायद किसी "गधे" ने ही "गधे" को "गधे" की उपाधी दी है।

दिगम्बर नासवा said...

सच है अच्छी चीज़ों की कद्र कहाँ होती है इंसानो को ....
सीधे साढ़े लोग भी तो इसी श्रेणी में आते हैं .... अच्छी रचना है ...

Shekhar Suman said...

kaafi der ho gayi aane mein.....
maafi chahunga...
bahut hi behtareen rachna.....
GADHON KA ITNA ACHHA DRISHTIKON ...WAAH..

संगीता पुरी said...

हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

दीनदयाल शर्मा said...

'गधे' को 'गधा' कहने वाला गधा ही तो होता है
सच के लिये शुभकामनाएं...... बधाई......

shubham sharma said...

संधू जी आपका यह लेख बहुत ही दिलचस्प है. इस कविता के माध्यम से आपने तो गधे कि समस्त पीडाएं व्यक्त कर दी है.आपकी इस कविता तक मैं शब्दनगरी में लिखे लेख गधा कौन लघुकथा जिसके लेखक सुमित प्रताप सिंह जी है . आपसे निवेदन है कि ये लेख भी अवश्य पढ़ें