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Wednesday, September 8, 2010

नानी का बाग*















तब मैं बहुत ही छोटी थी

नानी जब चल बसी

मुझे तो उसका चेहरा भी

याद नहीं है कोई

माँ ने रखी हैं सँभा

नानी की निशानियाँ

जिनमें से मैं नानी का

चेहरा ढूँढ लेती हूँ

माँ ने दी कीमती सौगात

नानी के हाथों बनाया बाग*

जब हुए विवाह के शगुन मेरे

'नानी बाग' रहा पास ही मेरे

सबसे पहले हुई ' नहाई-धोई'

नानी बाग ने मुझे  'आँचल' में भर लिया

ऐसे लगा जैसे नानी ने

मुझसे आ गलबहियाँ  पाई

आनंद कारज  के बाद सगे-सम्बन्धियों ने

जोड़ी को जब शगुन दिए

इस बाग ने दी आशीष

बेटा रहो जुग-जुग जीते

बाग में लपेटकर अपना दुलार

माँ ने दिया नानी का  प्यार

बेटी को जब विदा किया ससुराल

माँ-नानी की यह निशानी

रखती हूँ मैं लगाकर ह्रदय से

अपनी बेटी को दूँगी मैं

उसके विवाह के शगुन जब होंगे

नानी की दी हुई प्यार-आशीष

मेरी बेटी को भी मिल जाए

नानी के गुणों की पोटली

पीढ़ी-दर-पीढ़ी  सँभाली जाए !!!

*बाग...फुलकारी की तरह होता है लेकिन इस पर ज़्यादा कढ़ाई होती है। कढ़ाई के लिए खादी  का कपड़ा प्रयोग किया जाता है । एक खास बात और है....कढ़ाई रेश्मि के धागे से और हाथ से की होती है। यह तकरीबन २.५  मीटर लम्बा और  १ मीटर चौड़ा होता है। आजकल ऐसी कढ़ाई नहीं मिलती ।
यह कीमती बाग-फुलकारियाँ पंजाब में विवाह के समय प्रयोग होते हैं । लोगों ने इन्हे 'वालहैंगिन्ग' बनाकर दीवारों को भी सजा रखा है ।
यह तस्वीर मेरी नानी द्वारा बनाए 'बाग' की है ।

हरदीप कौर संधु

21 comments:

सहज साहित्य said...

हरदीप की कविता सदा अपनी ज़मीन से बहुत नज़दीक से जुड़ी होती हैं ।इस कविता में स्मृतियो की पर्ते खुलती चलती हैं जो कवयित्री को भविष्य की यात्रा करा देती हैं । पूरी कविता पढ़कर कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् की स्मृति गहरा उठती है । डॉ हरदीप इस कविता को थोड़ा और आगे ले जाती हैं-बेटी तक । जीवन में मूल्यवान् क्या है? यह बहुत बड़ा प्रश्न है । जिससे आदमी का जुड़ाव है , वही सर्वाधिक मूल्यवान् है। चाहे वह भेँट में दिया गया साधारण पेन ही क्यों न हो । हरदीप की कलम निरन्तर ऐसा ही सुन्दर सर्जन करती रहे !

डॉ टी एस दराल said...

ये सफ़र यूँ ही चलता रहे ।
अच्छी यादें ।

मनोज कुमार said...

@ नानी के गुणों की पोटली
पीढ़ी- दर- पीढ़ी सँभाली जाए !!!

बहुत भावभीनी रचना। नानी दादी से कितना कुछ ज्ञान और नीति की बाते हम सीखते हैं। इसे संभाल कर हम में से कितने रखते हैं। बहुत अच्छी सोच से लिखी कविता।
देसिल बयना-खाने को लाई नहीं, मुँह पोछने को मिठाई!, “मनोज” पर, ... रोचक, मज़ेदार,...!

Surendra Singh Bhamboo said...

बहुत अच्छी कविता है। पढ़कर बहुत अच्छा लगा
‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

मालीगांव
साया
लक्ष्य

Virendra Singh Chauhan said...

बहुत ही सुंदर और भावुक रचना .
पढ़कर बहुत ही अच्छी लगी .

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मधुर यादों को समेटे भावात्मक रचना ....

नानी जब चली बसी ...चल बसी

बाग ..... बैग कर लें ..

काजल कुमार Kajal Kumar said...

:) बहुत सुंदर भावपूर्ण अनुभूति.

डॉ. हरदीप संधु said...

सभी दोस्तों का बहुत-बहुत धन्यवाद ।
संगीता जी,
यह बैग नहीं है......
बाग ही है.........
बाग...फुलकारी की तरह होता है लेकिन इस पर ज़्यादा कढ़ाई होती है। कढ़ाई के लिए खद्दर का कपड़ा प्रयोग किया जाता है । एक खास बात और है....कढ़ाई रेश्मि के धागे से और हाथ से की होती है। आजकल ऐसी कढ़ाई नहीं मिलती ।
यह कीमती बाग-फुलकारियाँ पंजाब में विवाह के समय प्रयोग होते हैं । लोगों ने इन्हे 'वालहैंगिन्ग' बनाकर दीवारों को भी सजा रखा है ।
यह तस्वीर मेरी नानी द्वारा बनाए 'बाग' की है ।

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
हिन्दी का प्रचार राष्ट्रीयता का प्रचार है।

काव्य प्रयोजन (भाग-७)कला कला के लिए, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

ललित शर्मा said...


बेहतरीन लेखन के बधाई

356 दिन
ब्लाग4वार्ता पर-पधारें

ali said...

भावपूर्ण !

arvind said...

jamin se judi hui bhaavapurn rachna...bahut badhiya.

shikha varshney said...

हरदीप जी ! ये बाग मुझे भी समझ नहीं आया था :) फिर सोचा कमेन्ट पढ़ लूं शायद किसी ने बताया हो ..और वही हुआ.अब समझ कर आपकी कविता का पूरा आनद लिया ..बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

नानी की यादों को समेटे सुंदर भाव।
………….
गणेशोत्सव: क्या आप तैयार हैं?

Vivek VK Jain said...

this is my firt visit on ur blog, but im really impressed from ur skills!

Vivek Rastogi said...

कविता में आपके शब्द चयन से कविता में जान आ गई है, ऐसा लगा कि नानी का हर एक पल इस कविता में आ गया है, बाग अच्छा लगा।

'साहिल' said...

भावुक कर देने वाली कविता है..........शुभकामनाएं

राकेश कौशिक said...

यही है हमारे संस्कार और परम्पराएँ जो हिन्दुस्तान को विशेष बनती हैं -

"माँ-नानी की यह निशानी
रखती हूँ मैं लगाकर ह्रदय से
अपनी बेटी को दूँगी मैं"

उनका आदर और सम्मान करने के लिए आभार

सुशीला पुरी said...

बहुत सुंदर !!!!!!!

मनोज भारती said...

आप पंजाब की जमीन से जुड़ी हुई हैं और पंजाबी विरासत को जिंदा रखने में अमूल्य सहयोग दे रहीं हैं । आभार !

दीनदयाल शर्मा said...

"माँ-नानी की यह निशानी
रखती हूँ मैं लगाकर ह्रदय से
अपनी बेटी को दूँगी मैं"

भावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए बधाई...........