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Sunday, September 12, 2010

कुछ मीठा हो जाए....

















1.      आकाश में उडते बादलों को देखकर
         आकाश में उडते बादलों को देखकर
         यह ख्याल आया.....
        ओ लै छाता तो मैं घर में ही भूल आया
2.     राहे-राह सी तुरिया जांदा
        राहे-राह सी तुरिया जांदा
       ते मोड़ आया.....
       मोड़ आया-मुड़ गया
3.     इन ठंडी रातों में
       रिमझिम सी बरसातों में
       ओ मलमल के कुर्ते वाले
       की तैनू ठंड नहीं लगदी ?
4.    आकाश में उडती चिड़िया ने सोचा
      आकाश में उडती चिड़िया ने सोचा
      कि बिठ किथ्थे करां ?
5.   अकसर मैं बरसातों में
     यही सोचा करती हूँ
      कि मंजी किथ्थे डाहाँ ?
6.  तेरी सुन्दर चाल है ऐसी
    तेरी सुन्दर चाल है ऐसी
    जैसे उपलों पर कौआ चलता


हरदीप संधु

29 comments:

संजय भास्कर said...

सुंदर शब्दों के साथ.... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....

संजय भास्कर said...

हमेशा की तरह ये पोस्ट भी बेह्तरीन है

MUFLIS said...

rachna mn-mohak hai
bachpan ki kuch yaadein bhi to judee haiN aisi haasya-paheliyoN ke saath.... !!
C O N G R A T S

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

हा हा हा ..मस्त हैं जी ....:):)

हास्यफुहार said...

बेहतरीन। लाजवाब।

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
काव्यशास्त्र (भाग-1) – काव्य का प्रयोजन, “मनोज” पर, आचार्य परशुराम राय की प्रस्तुति पढिए!

Bhushan said...

ਜੇ ਮੈੰ ਜ਼ਿਆਦਤੀ ਨਹੀੰ ਕਰ ਰਿਹਾ ਤਾਂ ਇਣਾ ਚੁਟਕਲਿਯਾਂ ਵਿੱਚ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਮਿੱਟੀ ਦੀ ਮਹਕ ਹੈ. ਹਾ ਹਾ ਹਾ ਹਾ ਹਾ ਹਾ.

ali said...

सभी के लिए शानदार पर ...मलमल के कुर्ते पर और भी ज्यादा वाह वाह !

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश कि शीघ्र उन्नत्ति के लिए आवश्यक है।

एक वचन लेना ही होगा!, राजभाषा हिन्दी पर संगीता स्वारूप की प्रस्तुति, पधारें

Babli said...

भगवान श्री गणेश आपको एवं आपके परिवार को सुख-स्मृद्धि प्रदान करें! गणेश चतुर्थी की शुभकामनायें!
वाह! बहुत खूब! लाजवाब!

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन..ये बात!

ललित शर्मा said...


सार्थक लेखन के शुभकामनाएं

दांत का दर्द-1500 का फ़टका
आपकी पोस्ट ब्लॉग4वार्ता पर

मो सम कौन ? said...

मस्त आईटम है जी।
अकेला मीठा नहीं, खट्टा मिट्ठा है, tingling.
@ 5. सबसे बढ़िया लगा।

सहज साहित्य said...

हल्की फुल्की रचनाएं मन को मोह गई । आपकी यह गुदगुदाने की कला भारत की बरनाला की भूमि की देन है । इसे बनाए रखिएगा डॉ हरदीप जी !आपकीैन रचनाओं को पढ़कर बहुतों का तनाव कम हो गया होगा । बहुत बधाई !

निर्मला कपिला said...

राहे-राह सी तुरिया जांदा
राहे-राह सी तुरिया जांदा
ते मोड़ आया.....
मोड़ आया-मुड़ गया
इहो मोड मैनूँ वी इस ब्लाग वल खिच लियाया। रचना बडी चंगी लगी। शुभ कामना। धन्यवाद।

arvind said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

RAJNISH PARIHAR said...

ये पोस्ट भी अच्छी है
पढ़ना अच्छा लगा.....

दिगम्बर नासवा said...

वाह वाह ... बहुत मजेदार ... इन हल्के फुल्के शेरों / त्रिवेनियों ने ताज़ा कर दिया ....

पी.सी.गोदियाल said...

बहुत मजेदार संधु साहब ! एक खट्टा-मीठा मेरी तरफ से भी !

मच्छर ने जो काटा ...दिल में मेरे जूनून था !
खुजली हुई इतनी ................ दिल बेसुकून था !!.
पकड़ा उसे और फिर छोड़ दिया, यह सोच कर ....
कि साले की रगों में............... अपना ही खून था !

shikha varshney said...

अरे वाह ये हलकी फुलकी मस्त रचना तो बहुत ही अच्छी है..

'अदा' said...

सावन की घटायें..
सावन की घटायें..
मेरा क्या है
बरस जाएँ...
हा हा हा ..मस्त हैं जी ....:):)

डॉ टी एस दराल said...

हा हा हा ! चंगा जी , बहुत चंगा ।

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....

सुधीर said...

हिन्दी दिवस पर आपको बहुत-बहुत बधाई।

http://sudhirraghav.blogspot.com/

Harman said...

very funny and mazedar :-)

हास्यफुहार said...

बहुत अच्छी कविता।

Virendra Singh Chauhan said...

सुंदर रचनाएँ...........

इस नारे के साथ कि......चलो हिन्दी अपनाएँ
आप सभी को हिन्दी दिवस पर शुभकामनाएँ

budh.aaah said...

Wah that was funny..and reminded me of my childhood..
I loved your 'nani ka baag''...can identify with it so..

रचना दीक्षित said...

वाह वाह ! लाजवाब सच ही कहा है. भरपूर बचपन लौट आया