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Wednesday, September 15, 2010

चाटी की लस्सी













चाटी की लस्सी
गाँव जाकर मांगी
अम्मा हँसती
जी हाँ....आज बात होने जा रही है....पंजाब की 'चाटी की लस्सी' की !!!
 चाटी की लस्सी जैसा कुछ और  बना ही नहीं आज तक जिस का उदाहरण देकर आपको बताया जा सके कि इस का स्वाद ऐसा होता है....जिस ने इसको पीया है...वह ही जानता है.......
चलें सबसे पहले इसे कैसे बनाया जाता है....बता दें...... 















 सुबह होते ही दूध को काड़नी

( मिट्टी का मटके जैसा बरतन) में डालकर हारे ( तंदूर जैसा) में

उपलों की धीमी-धीमी आंच पर दिनभर धीरे-धीरे  उबलने के लिए

रखा जाता है ।  ऐसा करने से दूध का रंग थोड़ा बादामी सा हो

जाता है ।   
    










 


हारा 
शाम को कढ़े हुए दूध को चाटी ( मिट्टी का बरतन- मटके जैसा ...जिस का मुँह थोड़ा बड़ा होता है) थोड़ा दही का जामुन ( जाग) लगाकर रख दिया जाता है ।



















सुबह होते ही चाटी में मधानी डाल दही को रिड़क लिया जाता है। 
 रिड़कने से दही से मक्खन और लस्सी बन जाती है। इस लस्सी का रंग बादामी होता है।

















  
चाटी व मधानी 
 चाटी की लस्सी पहले केवल गाँव में ही प्रचलत थी । इसे पशुओं को भी पिलाया जाता था ।
शहर के लोग इसे बेकार की चीज़ कहते थे । परन्तु जब उन्हें इस लस्सी के गुण मालूम हुए...तो पता तो वह इसे पीने को तरस गए । 
 









  
शहर में आई गाँव से चाटी की लस्सी
 इस लस्सी की खास बात यह है कि यह १००% फ़ैटफरी होने के साथ-साथ प्रोटीन व मिनरल से भरपूर है । 









 फिर तेज़ रफ़तार होते ज़माने में इलैकर्टिक मधानी आई ...... 

लेकिन आजकर चाटी की लस्सी गाँव में भी नहीं मिलती  क्योंकि माडर्न हुए लोगों ने चुल्ले-हारे  तोड़ डाले....दूध बेचने लगे और लस्सी को छोड़कर कोक पीने लगे ।
  आज के ज़माने को एक नया नाम दिया जाने लगा है....''एनटीक का ज़माना''      
 अब जब सब पुरानी चीज़ें पास नहीं रही लोग उन्हें पाने के लिए बेताब होने लगे हैं ।
चाटी की लस्सी भी बड़े-बड़े होटलों के मीनू ( व्यंजन सूची) में सबसे ऊपर  होती है । 











  पंजाबी ढाबे तो इस लस्सी के लिए सबसे आगे हैं यहाँ  चाटी की लस्सी को इस का  असली स्वाद देने के लिए दूध को बिल्कुल वैसे ही हारों में कढ़ने के लिए रखा जाता है जैसे आज से तीन-चार दशक पहले पंजाब के हर गाँव के प्रत्येक घर में रखा जाता था ।  
 अब तक तो आप जान गए होंगे कि लस्सी मांगने पर अम्मा क्यों हँसी ???

  हरदीप कौर संधु                                                 

26 comments:

अन्तर सोहिल said...

कहाँ नसीब होती है जी आज वो लस्सी और मक्खन
हारे में ऊपलों पर कढावनी में ऊबल-ऊबल लालिमा लिये गाढा दूध और मलाई
अब तो यादें ही शेष हैं जी
18-20 साल हो गये घर में अब ना भैंस है और ना हारा

प्रणाम

सहज साहित्य said...

धन्यवाद हरदीप जी । मेरे गाँव वाले घर में आज भी इस तरह होता है । हारे में दूध कढ़ाने -(धीमी आँच पर पकाने) के लिए बरौला (मिट्टी की बड़े मुँह की मटकी) रख दिया जाता है । वही बादामी लस्सी गाँव में पी जाती है । जब दिल्ली आता हूँ ,दो-तीन लीटर ले आते हैं । मुझे आज भी सबसे अधिक पसन्द है । तनाव दूर करके गहरी नींद लाने वाला सुलभ साधन है । बहुत अच्छा है , आप आस्ट्रेलिया में रहकर भी हमें याद दिलाती रहती हैं ।और हाँ जिसका चेहरा खूब बड़ा होता है उसे हमारे यहाँ -'बरौले -से मुँह वाला' कहकर चिढ़ाते भी हैं । अच्छा उपमा अलंकार है । और आपके चाटी शब्द को लेकर हम मियाँ बीवी एक दूसरे का दिमाग़ चाट रहे थे ।
रामेश्वर काम्बोज

ali said...

ओह मुंह में पानी आ गया ! ऐसी पोस्ट लिखियेगा तो बंदे की तकलीफ बढ़ती जायेगी :)

डॉ टी एस दराल said...

बचपन में हमने भी बहुत पी है । लेकिन अब तो तरस जाते हैं । बेशक उसका स्वाद कुछ और ही होता था ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत बढ़िया जानकारी ...कभी पियें तो पता चले ..

निर्मला कपिला said...

हमारे हिमाचल के कई गावों मे आजकल भी चाटी की लस्सी मिलती है। मैं तो खुद दूध मिट्टी के बर्तन मे जमा लेती हूँ। फिर मधानी से लस्सी बनाती हूँ। हाँ वोपहले जैसा स्वाद कहाँ है। इस लस्सी का मट्ठा भी बहुत स्वादिश्ट बनता है गावों मे लोग भल्ले इसी मे बनाते थे। कढी तो पूछो मत उस कढी जैसा स्वाद कहांम। धन्यवाद हर्दीप जी मुँह मे पानी आ गया।

Patali-The-Village said...

पोस्ट बहुत अच्छी लगी| चाटी की लस्सी के लिए धन्यवाद|

राजभाषा हिंदी said...

बहुत सुंदर चित्रों से सजी पोस्ट। आपने तो मुझे मेरे चंडीगढ के दिनों को ताज़ा कर दी।
इस पोस्ट की विशेषता है कि इसके चित्र बोल रहे हैं।
बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

काव्य प्रयोजन (भाग-८) कला जीवन के लिए, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

Sunil Kumar said...

आपने तो पंजाब कि लस्सी का स्वाद हैदराबाद में दिला दिया बहुत खूब

Bhushan said...

लस्सी बहुत बार पी है पर यह तो बहुत अच्छी बनी है.....इस पर लस्सी में चित्रों का मक्खन...क्या बात है.

Arvind Mishra said...

अरे वाह !

budh.aaah said...

Oh have never had this 'chaati ki lassi'..chalo hope to taste it someday.

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-१, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

arvind said...

muh me paani aa gayaa..chatee ki lassi ke liye...achhi jankaari.

Harsh said...

bahut khoob. apka blog achcha laga

Udan Tashtari said...

बहुत सालों पहले शिमला जाते समय पंजाब के किसी ढाबे पर पी थी, आजतक याद है.

बहुत अच्छी जानकारी दी.

abhi said...

मैं लस्सी नहीं पीता लेकिन जानकारी अच्छी लगी :)

rashmi ravija said...

अरे वाह...कढ़ा हुआ दूध इसे कहते हैं आज जाना ...कई बार पढ़ा था...पर जाना पहली बार...मुझे तो पोस्ट से जैसे सोंधी सोंधी खुशबू भी आने लगी :)

Babli said...

बहुत अच्छी जानकारी दी है आपने! सुन्दर तस्वीरों के साथ शानदार प्रस्तुती! मैं चार साल पहले जब अमृतसर घूमने गयी थी तब मैंने लस्सी पीया था ! पता नहीं फिर कब इतनी बढ़िया लस्सी पीने को मिलेगी !

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

अच्छी जानकारी दी है आपने.
मेरे गाँव में भी ऐसा ही होता है .

Mrs. Asha Joglekar said...

Chaati ki lassi are wah peeni padegi Dilli men milati to hogi.

अनामिका की सदायें ...... said...

बादामी दूध तो कई बार पिया बचपन में. लेकिन चाटी की लस्सी पीने का कभी मौका नहीं मिला.

गाँव की याद दिला दी आपकी पोस्ट ने.

आभार.

हास्यफुहार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

मनोज भारती said...

चाटी की लस्सी तो मुझे भी बहुत पसंद है जी...पर नानी के जाने के बाद न वह हारा रहा न वह चाटी की बादामी लस्सी ।

बहुत सुंदर !!! आप मुझे अक्सर मेरे बचपन की याद दिला देती हैं ।

RAJWANT RAJ said...

aisi lssi maa pilati thi. hu b hu vhi swad vhi rng vhi khushboo vhi sondhapn , prmatma aapki lekhni me brkkt de .ameen .

संजय भास्कर said...

बहुत सुंदर चित्रों से सजी पोस्ट।
बहुत सुंदर !!! आप मुझे अक्सर मेरे बचपन की याद दिला देती हैं ।