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Saturday, September 18, 2010

रब न मिला



















पूजा के उपरान्त

अगरबत्ती की राख ही

हाथ आई थी मेरे

बहुत ढूँढा....बहुत ही ढूँढा

रब न मिला मुझे

एक दिन मन में

 रब को  मिलने की ठानी

खाना न मैं खाऊँगी

मैं भूखी ही मर जाऊँगी

जब तक  रब को न  पाऊँगी 

तभी एक भिखारी ने

मेरे द्वार आ दस्तक दी

भूखा था वो शायद

माँग  रहा था वो खाना

मैने कहा अभी नहीं

मैं तो रब को खोज रही हूँ

थोड़ी देर बाद तुम आना

फिर एक कुतिया  ने

मेरे सामने आ चऊँ -चऊँ  की

भूखी होगी वो भी शायद

पर मैने उसे भी फटकारा

थोड़ी देर बाद...

एक बूढ़ी अम्मा आकर बोली

बेटी रास्ता भूल गई हूँ

और सुबह से भूखी भी हूँ

क्या थोड़ा खाने को दोगी

मैने कहा .....

जा.. रे.. जा... 

जा... रे... अम्मा

रास्ता नाप तू अपना

मैं तो कर रही हूँ

इन्तज़ार अपने रब का  

 तभी आसमान में

गूँजी एक आवाज़

किस रब का

है तुझे  इन्तज़ार 

मैं तो आया 

तीन बार तेरे द्वार

पर तूने मुझे 

ठुकराया बार-बार

अगर रब को है तुमने पाना

छोड़ दे तू इधर-उधर भटकना
 
मैं तो हर कण में हूँ

और रहता तेरे पास ही हूँ

ज़रा  अपने मन की

खोल तू आँखे

पाओगी मुझे

हर प्राणी में

हरदीप संधु

25 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

भावुक रचना...आभार

राजभाषा हिंदी said...

ज़रा अपने मन की

खोल तू आँखे

पाओगी मुझे

हर प्राणी में
सच, सबमें रब बसता है, हम अपने मन की आंखें खोल कर देखें तो दिखेगा ना।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
साहित्यकार-महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

Bhushan said...

जहाँ कविता ने पहुँचाया है इसे ही बंदगी कहते हैं. धर्म के 'दया' तत्त्व को कविता में सजा कर कहा है आपने. मानव में दया हो तो युद्ध कभी न हों.

Bhushan said...

जहाँ कविता ने पहुँचाया है इसे ही बंदगी कहते हैं. धर्म के 'दया' तत्त्व को कविता में सजा कर कहा है आपने. मानव में दया हो तो युद्ध कभी न हों.

सहज साहित्य said...

आपके इस सूफ़ियाना कलाम ने बहुत बड़ी आध्यात्मिक बात कह दी है । भक्त कवि भी कह गए हैं- मोको कहा ढूँढ़े रे बन्दे मैं तो तेरे पास में, ना मैं मन्दिर ना मैं देवल ना काबे कैलास में,,,, ढूँढ लो कहूं राम मिलेंगे दीन जनों की भूख प्यास में । इस कथात्मक कविता में आपने सारी बात कह दी । आपका हाइकु ने इस कविता में विस्तार पाकर नया रूप धारण कर लिया है । यह कविता तो आज की पीढ़ी को पाठ्य्क्रम में पढ़ाई जानी चाहिए ।

निर्मला कपिला said...

मैं तो हर कण में हूँ

और रहता तेरे पास ही हूँ

ज़रा अपने मन की

खोल तू आँखे

पाओगी मुझे

हर प्राणी में
हरदीप जी यही तो कारण है कि लोग रब्ब को ढूँढ नही पाते। सही कहा आपने रब्ब तो कण कण मे है बस अपनी आंम्खें खोल कर देखने की जरूरत है। लेकिन हम केवल धार्मिक हो जाते हैं धर्म को जीते नही। बहुत अच्छी लगी आपकीयेरचना। बधाई।

ali said...

आसमान के बजाये ये आवाज अपनें अंतर्मन में गूंजती तो और भी बेहतर होता !
बहरहाल बडी सुन्दर और सुचिंतित प्रस्तुति !

मनोज कुमार said...

कस्तुरी कुंडलि बसै, मृग ढ़ूंढ़े बन माहिं।
ऐसे घटि-घटि राम है, दुनियां देखै नाहिं।।
बहुत अच्छी प्रस्तुति।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

फ़ुरसत में … हिन्दी दिवस कुछ तू-तू मैं-मैं, कुछ मन की बातें और दो क्षणिकाएं, मनोज कुमार, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

अन्तर सोहिल said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
कविता के माध्यम से ये प्रेरक संदेश बहुत पसन्द आया जी, धन्यवाद

प्रणाम स्वीकार करें

kshama said...

अगर रब को है तुमने पाना

छोड़ दे तू इधर-उधर भटकना

मैं तो हर कण में हूँ

और रहता तेरे पास ही हूँ

ज़रा अपने मन की

खोल तू आँखे

पाओगी मुझे

हर प्राणी में

Haan..har kan me wo samaya hua hai...bas mankhi aankhen kholne bharkee der hai....par udvign awasthame ham yahi to nahi kar pate..

Coral said...

बहुत सुन्दर

गहरी बात कही है आपने दिल को छु गयी !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बिलकुल सटीक बात ...कण कण में ईश्वरीय शक्ति है

sada said...

बहुत ही गहराई है इस रचना में, ईश्‍वर को पाने के लिये न जाने कितने ही रास्‍तों का चयन करता है इंसान, पर जब वह सामने आता है तो उसे पहचान ही नहीं पाता,जो कि वह सभी जगह विराजमान है, प्रेरक अभिव्‍यक्ति ।

budh.aaah said...

Nice sentiments

डॉ टी एस दराल said...

वाह , बहुत खूबसूरत बात कही है । जो कण कण में बसा है , उसे इधर उधर खोजने की क्या ज़रुरत है । बहुत बढ़िया सन्देश ।

मनोज भारती said...

कण-कण में बसा वह , फिर भी इंसान पहचान न पाता उसे ...जो निकटतम है वही दूर बना हुआ है ।

PN Subramanian said...

बेहद सुन्दर रचना. आखिर रब मिल ही गया.

बेचैन आत्मा said...

सही कहा...
ईश्वर अवसर देता है मगर हम अपने अहंकार में उसे पहचान ही नहीं पाते!

SURINDER RATTI said...

Hardeep Ji,

Bahur sunder bhaav se bhari rachna... insaan bhool roz hi karta hai, Yeh baat sach hai Rab jab saamne aata hai to hum usey nahin dekh paatey, kyunki hamari budhhi us level ki nahin hai, aur hum har baar pariksha mein fail ho jaatey hain, Agar aapki bhaavna sachi hai toh Bhagwaan zaroor aapko darshan dengay. Aur ek baat Bhagwaan ko hum in aankhon se nahin dekh sakte uskey liye humko divya aankhen chahiye. Aur jis ko darshan detey hain pehle usko divya netr pradaan karte hain.

Surinder Ratti
Mumbai

लोकेन्द्र said...

वाह...
कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे चहु ओर

VIJAY KUMAR VERMA said...

ज़रा अपने मन की

खोल तू आँखे

पाओगी मुझे

हर प्राणी में
सच कहा आपने रब को बाहर की दुनिया में नहीं ,अपने अन्दर की दुनिया में खोजना चाहिए
सुन्दर रचना

बूझो तो जानें said...

बहुत ही सुन्दर कविता, शुभकामनाएं.

संजय भास्कर said...

वाह , बहुत खूबसूरत बात कही है

दीनदयाल शर्मा said...

मैं तो आया
तीन बार तेरे द्वार
पर तूने मुझे
ठुकराया बार-बार
अगर रब को है तुमने पाना
छोड़ दे तू इधर-उधर भटकना
मैं तो हर कण में हूँ
और रहता तेरे पास ही हूँ.....
वाह!!!!!!बहुत ही सुन्दर कविता........बधाई..

KAHI UNKAHI said...

सच है...रब तो कण-कण में है...।
मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे...मैं तो तेरे पास रे...