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Thursday, September 30, 2010

पति है राजा...पत्नी रानी...

इस कविता का पहला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक सहज साहित्य   कीजिए 


















           पति तो परमेश्रर ही है
             पत्नी का है कहना
       परमेश्रर वाला एक भी गुण
        चाहे पति सीख सके ना
              पति-पत्नी ....
        जीवन के हैं दो पहिये
      जीवन को चलाने के लिए
         दोनों ही हमें चाहिए
          यह बात पति ने 
         अब तक ना मानी
      करता फिरता फिर भी 
        वो अपनी मनमानी
     ऊँचा बोलकर रौब जमाता
    तुझे घर सँभालना नहीं आता
     बड़ी-बड़ी बातें सीख  गया वो
    पत्नी-सम्मान करना नहीं आता
       अपनी नाकामी  का सेहरा
        पत्नी के सिर  ही  बाँधता 
         ठीक हो चाहे गलत
       बस अपनी ही हाँकता
          पत्नी नहीं करती 
      कोई  गिला- शिक़वा 
          यही गुण उसे
        विरासत में मिला
         कोई बात नहीं 
        सुबह का भूला
          शाम को ....
       घर लौट आए
        हम दोनों तो 
        घी- शक्कर हैं
         कोई जुदा ...
       हमें कर न पाए
      माँ-बाप ने जब से 
    उसके जीवन की डोरी 
    पति के हाथ सँभाली
         तब से वह तो 
         उसी को  ही
   अपना सब कुछ मानती
         पति है राजा 
     वो है उसकी रानी
     दोनों से ही घर बनता है
    यही घर-घर की कहानी !!

हरदीप संधु 

27 comments:

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर रचना |

Bhushan said...

व्यावहारिक जीवन में पत्नी के एडजस्ट करने और दब जाने में अंतर करना बहुत कठिन हो जाता है. सुंदर रचना के बधाई.

डॉ टी एस दराल said...

दोनों से ही घर बनता है
यही घर-घर की कहानी !!

एकदम सही । यह बात वेस्ट में लोग भूलते जा रहे हैं ।

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है!
मध्यकालीन भारत धार्मिक सहनशीलता का काल, मनोज कुमार,द्वारा राजभाषा पर पधारें

ali said...

सुन्दर सार्थक सन्देश देती रचना !

Shekhar Suman said...

bahut hi sundar rachna...
mere blog par thode se bargad ki chhaon mein jaroor aayein....

सहज साहित्य said...

हरदीप बहन , आपने मेरी यूँ ही लिखी गई कविता में और रंग भर दिया मैंने तो अपनी रानी का मन रखने और गुदग्दाने के लिए लिखा था । आपने और आगे की बात कह दी है । इस बात में आपका लोहा मानता हूँ जी ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

घर गृहस्थी चलाने का मूल मन्त्र दे दिया आज तो ...अव्च्छी प्रस्तुति

arvind said...

यही घर-घर की कहानी !!
.....bilkul satik bataayaa aapne....badhai.

पी.सी.गोदियाल said...

दोनों से ही घर बनता है
यही घर-घर की कहानी !!

सार्थक सन्देश !

महेन्द्र मिश्र said...

सुन्दर प्रस्तुति...

मनोज कुमार said...

समानता एवं असमानता की सामाजिक विसंगतियों पर कवयित्री खरा व्यंग्य प्रहार करती हुई कहती है
उसके जीवन की डोरी
पति के हाथ सँभाली
तब से वह तो
उसी को ही
अपना सब कुछ मानती
पति है राजा
वो है उसकी रानी
दोनों से ही घर बनता है
बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
चक्रव्यूह से आगे, आंच पर अनुपमा पाठक की कविता की समीक्षा, आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!
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mahendra verma said...

दोनों से ही घर बनता है
यही घर घर की कहानी
सही बात है, ज़िंदगी की गाड़ी सही ढंग से चले, इसके लिए ज़रूरी है कि उसके दोनों पहिए बराबर हों...सार्थक कविता।

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

पति-और पत्नियों के रिश्ते के सन्दर्भ में
बिलकुल सही लिखा है आपने .
लेकिन
पत्नी नहीं करती
कोई गिला- शिक़वा
यही गुण उसे
विरासत में मिला

आजकल की पत्नियों पर
येपंक्तियाँ कितनी सही हैं, कहना मुश्किल है .

JHAROKHA said...

Bahut hee sarthak aur sundar rachna----hardik badhai svikaren.
Poonam

Udan Tashtari said...

सार्थक सन्देश देती पंक्तियाँ.

अनामिका की सदायें ...... said...

आप की रचना 01 अक्टूबर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
http://charchamanch.blogspot.com


आभार

अनामिका

हास्यफुहार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

बूझो तो जानें said...

आपकी यह कविता बहुत ही अच्छी लगी.

निर्मला कपिला said...

पति है राजा
वो है उसकी रानी
दोनों से ही घर बनता है
यही घर-घर की कहानी !!
और इसी मे सारी दुनिया और सारी ज़िन्दगी समाई है। बहुत अच्छी रचना। बधाई।

हरकीरत ' हीर' said...

इस राजा रानी का खेल आजकल अदालतों में खूब चलता है ....हरदीप जी ...
न जाने क्यों एक हाथ इतना ऊंचा उठ जाता है ...जबकि दोनों हैं तो बराबर .....

Mrs. Asha Joglekar said...

पति पत्नी एक ही गाडी के दो पहिये है, खुशी की बात ये है अब ज्यादा लडके इस बात को समझने लगे हैं । सुंदर सामयिक रचना ।

वन्दना said...

are wah.......pati patni ke rishtey ko bahut hi khoobsoorati se ukera hai.

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH said...

ਡਰ ਸਾਹਿਬਾ,
ਸਤ ਸ੍ਰੀ ਅਕਾਲ!
ਵਧਿਯਾ ਗਲ ਕਿਤ੍ਤੀ ਹੈ ਤੁਸ੍ਸੀਂ! ਮੈਂ ਨੀ ਕਰਨਾ ਇੱਦਾ ਦਾ ਬਿਹੇਵਿਯਰ ਅਪਨੀ ਪਤਨੀ ਦੇ ਨਾਲ! ਪਰ ਪਹਿਲੇ.......... ਵੇਯਾਹ ਤੋ ਹੋ!
ਹਾ ਹਾ ਹਾ
ਆਸ਼ੀਸ਼
--
ਪ੍ਰਾਯਸ਼੍ਚਿਤ

KAHI UNKAHI said...

बहुत अच्छा...। किसी और की लिखी रचना को यूँ ख़ूबसूरती से आगे बढ़ा ले जाना...बधाई...।

Apanatva said...

sunder aur sarthak rachana..
Aabhar

manukavya said...

पति-पत्नी ....
जीवन के हैं दो पहिये
जीवन को चलाने के लिए
दोनों ही हमें चाहिए

हरदीप जी बहुत सुन्दर रचना ! ये ही गृहस्थ जीवन का मूल मंत्र है और यदि पति और पत्नी दोनों ही इसे याद रखें तो जीवन ख़ूबसूरत और आसान रहता है. एक कविता से दूसरी कविता का जन्म, वाह ये आपकी अद्भुत क्षमता का द्योतक है

manju mishra