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Tuesday, October 26, 2010

चलो ढूँढे एक रुपया

 


















एक बार तीन दोस्तों ने किसी ढाबे पर खाना खाया । हर एक ने 10 रुपए दिए । इस तरह उन्होंने ढाबे वाले को 30 रुपए दिए । लेकिन उनका खाने का 'बिल' 25 रुपए बनता था। ढाबे वाले के पास पाँच (5)  का नोट नहीं था।इस लिए उस ने बराबर का हिसाब करने के लिए हर एक को 'एक-एक' (1) रुपया वापिस कर दिया और बाकी के दो (2)  रुपए उसने खुद रख लिए ।इस तरह उस दिन तीन दोस्तों को अपनी-अपनी जेब से केवल '9' रुपए 
खर्च करने पड़े ।
चलें अब थोड़ा हिसाब - किताब कर लें .....
एक आदमी ने दिए = 9 रुपए
तीन ने दिए = 9 + 9 + 9 =27 रुपए
ढाबे वाले ने रखे = 2 रुपए
कुल रकम = 27 + 2 = 29 रुपए
तो फिर बाकी बचता एक (1)  रुपया कहाँ गया ?

 हरदीप संधु

Saturday, October 23, 2010

माँ तू समझी नहीं

'


















जब तू नन्हा सा था

माँ की गोद में खेलता था 

तुतला-तुतला बोलता था

माँ समझ जाती थी

तेरी हर तोतली बात

अब तू हो गया बहुत बड़ा  

हर बात साफ़ -साफ़  बोलता

 बात-बात पर तू यह कहता

माँ तू  समझी  नहीं.....

मेरी बात......??

अपनी माँ को न: समझ बताकर

खुद को बहुत समझदार समझता!!

हरदीप कौर संधु

Wednesday, October 20, 2010

यह तेरा रब...वो मेरा रब ..!















रब को ढूँढने
पहले तो हम
मन्दिर-मस्जिद  जाते
थोड़ा सा अहिसास होते 
रब का ...
कि भई हाँ ...
रब तो है...
उसके मिलने से पहले ही
उसको राम व अल्ला में 
बाँटने बैठ जाते हैं...
तभी तो हम
मानव जाति कहलाते हैं 

हरदीप संधु

Wednesday, October 13, 2010

शहर से लौटा खुशिया चाचा




















छोटापुर भाव समालपुर वाले खुशिया चाचा को तो आप जानते ही हैं। अब वह शहर की नौकरी छोड़कर गाँव में रहने लगा। किसी ने पूछा तो चाचा ने अपने शायराना अन्दाज़ में जो रंग बाँधा ....उसी का सीधा प्रसारन आपको सुनवाते हैं ....याद है न खुसिया चाचा ' छ/श' को ' स' बोलता है....

मन भर गया सहर से

अब गाँव में ही रहूँगा

सोटापुर को तो कब का

बना दिया मैने समालपुर

अब गाँव में भी

सहरी इस्टाईल से रहूँगा...

हिन्दी तो नेस्नल 

यानि रास्ट्र भासा (राष्ट्रभाषा)

यह तो नहीं सोडूँगा

लेकिन ........

थोड़ी इंगलिस भी  बोलूँगा ....

काला चस्मा(चश्मा ) लगाएगा 

तेरा खुसिया चाचा

मसली(मछली) को फिस्स  कहेगा

चाय में सक्कर (शक्कर) नहीं

अब सूगर डालकर पीएगा

सिक्सा (शिक्षा) को कुयालिफकेसन

छुट्टी  को वकेसन कहेगा 

गाँव के हर काम में होगा

अब चाचा सामिल(शामिल) ...

न..न..पार्टीसिपेसन

किसी का न होने देगा 

सोसन (शोषण)..उफ़..एक्सपलॉएटेसन

बूढ़ा होने लगा तो क्या हुआ

दिखता तो अभी भी मैं फ़ैसनेबल

नहीं समझे क्या .....सैल-सबीला

शिवजी को कहूँगा- लॉरड सिवा

लेकर आ गया हूँ मैं पैनसन (पैन्शन)

निभाऊँगा सारे रिस्ते (रिश्ते)

हाँ..हाँ..रिलेसन

तभी तो कहलाऊँगा 

भारतीय क्रिएसन !!!

हरदीप संधु 

Friday, October 8, 2010

एक आम आदमी












 एक आम आदमी......
 

मन ही मन में
 

दूसरों को
 

अपना समझता है
 

मगर हर कोई
 

उसके अरमान
 

यूँ ही कुचल देता है
 

 एक आम आदमी.......
 

सड़क पर बेखौफ़ चलता है
 

क्योंकि उसके पास
 

खोने के लिए
 

कुछ भी तो नहीं होता है
 

 एक आम आदमी......
 

कभी कभी देखता
 

बड़े-बड़े सपने
 

क्योंकि केवल
 

सपने ही तो वह देख पाता है
 

 एक आम आदमी......
 

जगा होता है
 

चिन्ता व दु:ख का मारा
 

जब सारा संसार
 

बेफिकर सो रहा होता है

हरदीप संधु 

 



Tuesday, October 5, 2010

स्प्रे कैन् में टी शर्ट

आ गया है विज्ञान  का एक नया आविष्कार .....
 जल्दी ही  आ जाएगा आपके शहर ..........
जी हाँ....अब यात्रा करते समय भारी-भरकम सूटकेस उठाने की जरूरत नहीं....बस एक कैन् ही काफ़ी है....जिस में होगा आपका पहनने वाला सामान। चौंक गए न...जी हाँ...अब आपकी टी-शर्ट है एक स्प्रे कैन् में....जब दिल चाहे कैन् खोलकर स्प्रे कर लीजिएगा ...और मन चाहे रंगों में टी-शर्ट पहन लीजिएगा  । इम्पीरियल कालेज लंदन के वैज्ञानिकों  ने  ऐसे तरल पदार्थ खोज निकालें हैं जिन का प्रयोग कपड़ा बनाने के लिए किया जा सकता है । इन तरल पदार्थों को अपने शरीर पर छिड़काव करने   के बाद यह सूखकर कपड़े की तरह बन जाते हैं ।     
अब देखें यह कैसे होता है ........ 
 डॉ. टौरर्स स्प्रे कैन् से छिड़कवा करते हुए.....थोड़ी गुदगुदी तो होगी ही.......
 तरल पदार्थ सूखने लगा है....देखिए क्रीज़ दिखने लगी है !
सफेद.....ऊँ...हूँ...कुछ अच्छा नहीं लगा....डॉ. साहिब टी-शर्ट को कुछ रंगीन बनाते हुए...........

 अरे वाह ! यह तो बन भी गई.....

 आप जब चाहें इसे उतार कर ....धोकर ....फिर से पहन सकते हैं....... 
 क्या कहा आप ने......आप नहीं मानते.....तो फिर वीडियो देख लीजिएगा....तसल्ली हो जाएगी..........
स्प्रे कैन् टी - शर्ट
आप भी पहनें