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Friday, October 8, 2010

एक आम आदमी












 एक आम आदमी......
 

मन ही मन में
 

दूसरों को
 

अपना समझता है
 

मगर हर कोई
 

उसके अरमान
 

यूँ ही कुचल देता है
 

 एक आम आदमी.......
 

सड़क पर बेखौफ़ चलता है
 

क्योंकि उसके पास
 

खोने के लिए
 

कुछ भी तो नहीं होता है
 

 एक आम आदमी......
 

कभी कभी देखता
 

बड़े-बड़े सपने
 

क्योंकि केवल
 

सपने ही तो वह देख पाता है
 

 एक आम आदमी......
 

जगा होता है
 

चिन्ता व दु:ख का मारा
 

जब सारा संसार
 

बेफिकर सो रहा होता है

हरदीप संधु 

 



27 comments:

संजय भास्कर said...

सुंदर प्रस्तुति....

नवरात्रि की आप को बहुत बहुत शुभकामनाएँ ।जय माता दी ।

संजय भास्कर said...

आदरणीय हरदीप संधु जी
नमस्कार !

कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

Bhushan said...

सुंदर भाव. सच यह भी है कि आम आदमी हमारे सुख-दुख के हिसाब-किताब में हाशिए पर भी नज़र नहीं आता. आपने उसे पृष्ठ के ठीक बीच रख दिया है. नवरात्रों की शुभकामनाएँ.

वन्दना said...

यही आम आदमी का सच है जिन्हे आपने बखूबी महसूस किया है।

निर्मला कपिला said...

आम आदमी के दर्द की सटीक अभिव्यक्ति। बधाई आपको।

संजय कुमार चौरसिया said...

सपने ही तो वह देख पाता है

एक आम आदमी......

sundar prastuti

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

samvedansheel....kavita...

डॉ टी एस दराल said...

सुन्दर सच्ची बात कही ।
नवरात्रों की शुभकामनायें ।

Apanatva said...

आपको नवरात्र की ढेर सारी शुभकामनाएं .

सुज्ञ said...

बेह्तरीन भाव निरूपण
आपको नवरात्र की ढेर सारी शुभकामनाएं

सुज्ञ said...

बेह्तरीन भाव निरूपण
आपको नवरात्र की ढेर सारी शुभकामनाएं

Anjana (Gudia) said...

सुंदर अभिव्यक्ति! शुभकामनाएं

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आम आदमी की सच्ची दास्तान

Poorviya said...

सड़क पर बेखोफ़ चलता है

क्योंकि उसके पास

खोने के लिए

कुछ भी तो नहीं होता है
aam aadmi kab khaas ban jata hai use pata hi nahi chalta hai

ali said...

आम आदमी के लिए खास कविता !

Mrs. Asha Joglekar said...

एक आम आदमी के दर्द उभर कर आये हैं इस कविता में । सुंदर ।

Udan Tashtari said...

कभी कभी देखता
बड़े-बड़े सपने
क्योंकि केवल
सपने ही तो वह देख पाता है

-कितना सटीक चित्रण किया...


या देवी सर्व भूतेषु सर्व रूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ||

-नव-रात्रि पर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं-

सहज साहित्य said...

नवरात्र के आरम्भ पर बहुत सुन्दर कविता पेश की है । इस कविता में आम आदमी की मज़बूरी और दीनता को बहुत कम शब्दों में साकार कर दिया है ।बहुत ही मार्मिक एवं सारगर्भित कविता है ।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

हाँ, आम आदमी यहाँ है..उसके दर्द को सिद्दत से महसूस किया है आपने।
एक आम आदमी.......
..
सड़क पर बेखोफ़ चलता है
क्योंकि उसके पास
खोने के लिए
कुछ भी तो नहीं होता है..

किसी बड़े साहित्यकार ने लिखा है, नाम नहीं याद आ रहा...

डरें वो
जिनकी जड़े हैं
बरगदी
अधर में लटके हुए को
क्या फिकर।
..बधाई।

S.M.MAsum said...

एक आम आदमी......

मन ही मन में

दूसरों को

अपना समझता है

मगर हर कोई

उसके अरमान

यूँ ही कुचल देता है

बहुत खूब कहा है ,

Prem Farrukhabadi said...

एक आम आदमी......
जगा होता है
चिन्ता व दु:ख का मारा
जब सारा संसार
बेफिकर सो रहा होता है

सुन्दर बात कही है.बधाई!!!
नव-रात्रि पर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं.

मनोज भारती said...

आम आदमी के लिए सुंदर अभिव्यक्ति ...बहुत सुंदर !!!

MUFLIS said...

aam aadmi ke dukh aur majbooriyoN ko bkhoobi prastut kiya hai aapne
zindgi ki enekanek vidambnaaeiN jhalak rahi haiN

SURINDER RATTI said...

Hardeep Ji,
Yahi to hai zindagi, aam admi hi kya sab log kahin na kahin kuchh kho rahe hain .....Sunder Rachna Badhaayi.
Navratr Ki Shubh kaamnayein.

Surinder Ratti
Mumbai

SURINDER RATTI said...

Hardeep Ji,
Yahi to hai zindagi, aam admi hi kya sab log kahin na kahin kuchh kho rahe hain .....Sunder Rachna Badhaayi.
Navratr Ki Shubh kaamnayein.

Surinder Ratti
Mumbai

Robby Grey said...

बहुत खूब लिखा है अपने....

एक दम स्पष्ट.....

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

यथार्थ , पता नहीं हम सो रहे हैं या जाग रहे हैं।