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Wednesday, October 20, 2010

यह तेरा रब...वो मेरा रब ..!















रब को ढूँढने
पहले तो हम
मन्दिर-मस्जिद  जाते
थोड़ा सा अहिसास होते 
रब का ...
कि भई हाँ ...
रब तो है...
उसके मिलने से पहले ही
उसको राम व अल्ला में 
बाँटने बैठ जाते हैं...
तभी तो हम
मानव जाति कहलाते हैं 

हरदीप संधु

25 comments:

kshama said...

Ham bahari taur pe maan lete hain,ki eeshwar ek hai...sabhee ke liye. Lekin na jane kyon,jab mankee gahraayi me jhaankte hain,aisa maan ke chalne waleki,to Raam aur Raheem,do pruthak pate hain!
Bahut seedhe saral alfaaz aur sundar rachana!

Udan Tashtari said...

तभी तो हम
मानव जाति कहलाते हैं


-यही वजह है.

डॉ टी एस दराल said...

रब को बांटने वाला इन्सान ही है । वह तो एक ही है ।

वन्दना said...

सही कहा………………सुन्दर्।

यश(वन्त) said...

बिलकुल सही कहा आपने.GOD(Generator-Operator-Destroyer)को हम (मनुष्य)ही धर्म के नाम पर बाँट रहे हैं.है तो वो एक ही चाहे कोई भी नाम दे दिया जाए.

'जो मेरा मन कहे' पर आने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.

सहज साहित्य said...

रब का आधा-अधूरा अहसास होते ही हम सब कुछ भूल जाते हैं । यह अपरिपक्व मानसिकता ही हमें विभाजन की ओर ले जाती है। हरदीप जी का चिन्तन इन पंक्तियों में सूफ़ियाना अहसास लिये हुए है ।
रामेश्वर काम्बोज

मनोज कुमार said...

कठोड़ सत्य है।

Apanatva said...

sahee baat pyaree abhivykti....

mahendra verma said...

मनुष्य को ऐसी बुद्धि देने वाला रब नहीं, शायद कोई और है।

Babli said...

बिल्कुल सही कहा है आपने ! बहुत सुन्दर!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

इन्सान भगवान से ज़्यादा समझदार जो हो गया है.

shikha varshney said...

billkul yahi vajah hai .

ali said...

समझा में नहीं आता कि उसकी जरुरत क्या है ?

अनामिका की सदायें ...... said...

कम शब्दों में तीखा कटाक्ष.

उम्दा.

Bhushan said...

मज़हब (धर्म) ही है सिखाता आपस में बैर रखना.

बूझो तो जानें said...

सुन्दर कविता. बहुत सही कहा है आपने.

Vijai Mathur said...

darasal aisa karne vale apni dukandari chamkatey hain,jaise-
pagamber sab ne chand ke do tukre kar diye ka javab hai -hanuman 5 varsh ki umr me Surya ko nigal gaye.Nihayat hi bevkoofi ki baaten hain lekin insan hi to man raha hai kyon?Jo agar akl ki baat kahe to use dharam -virodhi kah diya jata hai .jo dharm ki a,b,c,d bhi nahi jantey ve dharm ke thekedar hain to aisa hi hoga.

निर्मला कपिला said...

सही बात है ये मानव के बनाये हुये ही भेद भाव हैं वर्ना भगवान तो एक ही है। सुन्दर रचना
शुभकामनायें।

मनोज भारती said...

मानव जाति की विडम्बना है यह

कम शब्दों में बड़ा सत्य जाहिर किया है आपने इस कविता में । सुंदर ...अति सुंदर ...

हरकीरत ' हीर' said...

मोको कहां कहाँ ढूंढें रे बन्दे मैं तो तेरे पास रे....!!

संजय भास्कर said...

सुन्दर रचना
शुभकामनायें।

दिगम्बर नासवा said...

सच्चा मानव ये सब नही करता ... हम मानव कहा रह गये अब ....

Anand Rathore said...

aap bhi parindo se dosti kar len... jo sirf pyar ki boli jante hain...jinka majhab sirf azadi hai..jinka manna hai ye aasmaan sabka hai...humari tarah ye ishwar ko bantte nahi...

ਸੁਰਜੀਤ said...

Well said !

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

बेहतरीन ।