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Saturday, October 23, 2010

माँ तू समझी नहीं

'


















जब तू नन्हा सा था

माँ की गोद में खेलता था 

तुतला-तुतला बोलता था

माँ समझ जाती थी

तेरी हर तोतली बात

अब तू हो गया बहुत बड़ा  

हर बात साफ़ -साफ़  बोलता

 बात-बात पर तू यह कहता

माँ तू  समझी  नहीं.....

मेरी बात......??

अपनी माँ को न: समझ बताकर

खुद को बहुत समझदार समझता!!

हरदीप कौर संधु

28 comments:

Udan Tashtari said...

यही तो होता आया है सदियों से...

बढ़िया रचना.

यश(वन्त) said...

काश!आप की बात हम सब समझ सकें.

वन्दना said...

ओह ! चंद पंक्तियों मे ही सारा दर्द उँडेल दिया।

Patali-The-Village said...

काश! कि आदमी इतना समझ सके|

बहुत सुन्दर रचना|

Sunil Kumar said...

पुरानी यादों को ताजा कर लिया आपने , सुंदर रचना

डॉ टी एस दराल said...

समय को कौन पकड़ पाया है ।
अच्छा एक्सप्रेस किया है ।

संजय भास्कर said...

Beautiful as always.
It is pleasure reading your poems.

राकेश कौशिक said...

सच्चा सन्देश

निर्मला कपिला said...

माँ और बच्चों मे यही तो फर्क होता है। अच्छी लगी रचना। बधाई।

Bhushan said...

हर माँ का यही अनुभव है. बेटा भी क्या इसे समझता है कि वह क्या कर रहा है?.... उसका ताज़ा मन इसे नहीं समझता.... जब तक माँ उसे न समझाए.

mahendra verma said...

जेनरेशन गैप इसी को कहते हैं।

मनोज भारती said...

बेटा बड़ा हो गया ....इस दौरान जमाने के अनेक रंग बदल गए और माँ पुरानी हो गई ...

नहीं... माँ कभी कुमाता नहीं होती और हर माँ के लिए उसका बेटा हमेशा प्यारा बना रहता है ...

abhishek1502 said...

very nice post

राकेश कौशिक said...

जी बिलकुल सही !

डॉ. हरदीप संधु said...

मैं सभी दोस्तों की आभारी हूँ।
आपने अपने कीमती समय में से समय निकाल कुछ समय शब्दों का उजाला को दिया ।

सब का अपना-अपना ख्याल है...
कोई इसे समय की रफ़तार मानता है,
तो कोई जेनरेशन गैप....

माँ का अनुभव बेटा/बेटी से हमेशा से ही ज़्यादा रहा है..हम चाहे पुराने ज़माने की बात करें या बदल चुके नए ज़माने की....
ऐसी कौन सी बात है जो बेटे/बेटी की समझ में तो आ रही हो और वह कहें ....नहीं-नहीं माँ तू समझी नहीं ...
माँ को यह बात कहना तो सूर्य को चिराग दिखाने वाली बात हुई ।

रानीविशाल said...

एक दम सही बात कही ....शुभकामनाएँ

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

यही सच है जी....

सहज साहित्य said...

कल -परसों अधिक समय तक कम्प्यूटर से दूर था अत: केवल मेल चैक कर सका । आपकी कविता युग सत्य को बयान करती है । माँ भले ही तुतली/ अटपटी भाषा भी समझ ले बच्चा तो बड़ा होकर बहुतभूल जाता है और वह है बच्चे की भाषा। खलील ज़िब्रान की इस पर बहुत मार्मिक लघुकथा ह॥ आपकी कविता उसी भाव को और आगे बढ़ाती है ।

shikha kaushik said...

bahut bhavuk rachna.shayad hum sabhi kahi n kahi is se jude huye hai

SURINDER RATTI said...

Hardip Ji,
अपनी माँ को न: समझ बताकर
खुद को बहुत समझदार समझता!!
Aaj ki nayi pidi aisi hi hai.....
Surinder Ratti
Mumbai

दिगम्बर नासवा said...

ये तो नियति का खेल है .... बड़े हो कर कोई नही समझता .... अच्छा लिखा है बहुत ही ...

Dr. Digvijai Singh said...

Aadrani Hardeep ji
Namaskar!
Aap ki kavita rab na mila achchi lagi.
Haiku bhi aap achcha likh ti hain.

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar said...

जहाँ ‘शब्द’है, वहाँ ‘उजाला’ तो होना ही है।
कितनी सहज-सरल भाषा में आपने एक सुन्दर कविता सामने रख दी है...बधाई!

MUFLIS said...

माँ तो अपने बच्चों के हाव-भाव से ही
बच्चों की हर बात जान लेती है ...
इसी का नाम ममता है
और बच्चे ...
'बड़े' होते ही खुद को 'बड़ा' स्मम्झने लगते हैं
खैर... भावनाओं को अछा रूप दिया है, अच्छी कविता !

Prem Farrukhabadi said...

sundar bhav. badhai!!

KAHI UNKAHI said...

बहुत बड़ा सच बयान किया है आप ने...। हमें बहुत कुछ सिखा जाने वाली माँ को हम जाने-अनजाने ही नासमझ समझते हैं...और माँ हमारी इस समझ को भी ज्यादातर स्वीकार ही करती है , हमेशा की तरह...। मन को छू जाने वाली इस रचना के लिए मेरी बधाई...।

प्रियंका

abhi said...

बच्चे बड़े होने के बाद माँ को ही कह देते हैं "माँ आप नहीं समझतीं...."
उसी माँ को कहते हैं जो बचपन में हमारी हर अनकही बात समझ लेतीं थीं...

"एक अरसा हुआ मेरी माँ नहीं थी सोई, जब... मैंने इक बार कहा था माँ मुझे रातों को डर लगता है"

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

सच्चाई की दर्द भरी ख़ूबसुरत अभिव्यक्ति एक अच्छी साहित्यकारा ही कर सकती है। बधाई।