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Monday, November 8, 2010

पंजाब रोडवेज़ .....


1.    बिना टिकट सवारी
       ऊपर हाथ पकड़ो 
       जाने की 'गर जल्दी
2.    रोडवेज़ दी लारी
      'पास वालों' की
       आती बाद में वारी
3.    पी. आर. टी. सी. - पिटदी रोंदी तुरदी चल.....

 4. चलती बस से सिर व बाजू बाहर निकालना मना है....

     तोरी जैसे लटकना मना नहीं है !!

 5 . बस में बैठे कवि से कंडक्टर ने पूछा.....

     टिकट कहाँ की दूँ ? कहाँ जाना है ?

    कवि बोला.....दूर आसमान में ठिकाना है.....

    कहीं की भी देदो टिकट ....

   मैने तो बादलों के उस पार जाना है  !!!


हरदीप कौर संधु ( बरनाला )

16 comments:

यश(वन्त) said...

ऐसे नज़ारे तो अब हर जगह बहुत आम हैं.व्यंग्यात्मक रूप में आपने सही समस्या को उठाया है.

डॉ टी एस दराल said...

हा हा हा ! मजेदार ।

सहज साहित्य said...

डॉ हरदीप जी सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए शुक्रिया । आज पता चला की पी. आर. टी. सी. का मतलब है- पिटदी रोंदी तुरदी चल.....। आजकल ऐसी बसे तो आम हैं । अन्दर बैठने पर जूता बस के टूटे फ़र्श से निकल जाए तो ससुराल पैदल ही जाना पड़ेगा । ये बसें मरियल बैल की तरह कहीं भी खड़ी हो जाती हैं । इनका बस चले तो ये लेट तो होती ही हैं , थकान होने पर रास्ते में लेट भी सकती हैं। फिर इनका भगवान ही मालिक है । इनका कंडक्टर इतना अनुभवी होता है की सवारियों को आलू=बैंगन की तरह ठूँस-ठूँसकर भर देता है । पायदान पर लटकनेवाले अच्छी प्रक्टिस होने पर शायद अगले जन्म में चमगादड़ ज़रूर बन सकेंगे ।

Bhushan said...

पहले 'पंजाब रोडवेज़'को पंजाब 'रुड़वई' कहा जाता था. अब पंजाब रोडवेज़ ने वोल्वो चला दी हैं.

ललित शर्मा said...

"पिटदी रोंदी तुरदी चल" हा हा हा चंगा नांव दित्ता तुस्सी।

पंजाब रुड़वेज दा हाल-बेहाल

ali said...

ललित जी की टिप्पणी को हमारी भी मानियेगा !

मो सम कौन ? said...

पोस्ट टाईटल देखकर अपन तो वो गाना सुनने आये थे मोहम्मद सिद्दीक और रंजीत कौर का,
’आ गई रोडवेज दी लारी,
ना कोई बुहा ना कोई बारी,
ऐसदी केड़े रूट दी तैयारी’
खैर वो गाना तो अपने हार्ड डिस्क में भी है,आपने भी शायद न ही सुना हो।
लेकिन पी.आर.टी.सी. की फ़ुल्ल फ़ार्म पढ़कर मजा आ गया।
वैसे डाक्टर साहिबा, आप विदेश की बसों से तुलना करें तो आपकी बात ठीक ही है, लेकिन यदि भारत की बात करें तो पंजाब का मूल बाशिंदा न होने के बावजूद कहना चाहूंगा कि बहुत से दूसरे राज्यों की रोडवेज के मुकाबले यहां की हालत बहुत अच्छी है।
पोस्ट मजेदार लगी।

arvind said...

ha ha ha...kavi se ticket maangaa hee bekaar.ve to vina ticket ke pahuch hi jaate hain.

amar jeet said...

बहुत बढ़िया कविता, सुंदर, व्यंग्य से परिपूर्ण, परिवहन व्यवस्था पर कटाक्ष और व्यवस्था पर बहुत कुछ कहती !कुल मिलाकर सार्थक रचना ..............

Sunil Kumar said...

kavi se panga mat lena jordar vyang maja agya

निर्मला कपिला said...

पंजाब रोवेज पर कटाक्ष अच्छा लगा। धन्यवाद।

निर्मला कपिला said...

पंजाब रोवेज पर कटाक्ष अच्छा लगा। धन्यवाद।

मनोज कुमार said...

कमाल है!
आपकी लेखनी और कटाक्षों का जवाब नहीं।

केवल राम said...

चलती बस से सिर व बाजू बाहर निकालना मना है....
तोरी जैसे लटकना मना नहीं है !!
गंभीर व्यंग्य
वक़्त हो तो ...चलते -चलते पर भी आपका इंतजार रहेगा ..और आने के लिए अग्रिम स्वागत

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH said...

ਡਾਕ੍ਟਰ ਸਾਹਿਬਾ,
ਸੰਜਯ ਬਾਬੂ (ਮੋ ਸਮ ਕੌਣ?) ਦੀ ਗਲ ਦੇ ਨਾਲ ਸਹਮਤ!
ਉਡਦਾ ਤੁਸ੍ਸੀਂ ਤੋ ਫ਼ੋਰੇਨ ਚ ਰਹੰਦੇ ਨੇ....
ਕਦੇ ਯੂ ਪੀ ਰੋਡਵੇਜ਼ ਤੋਂ ਟਰੈਵਲ ਕਰਕੇ ਵੇਖੋ..... ਕਿੰਨਾ ਸ੍ਵਾਦ ਹੈ!
ਮੈਨੂ ਤੁਹਾਡੀ ਰਚਨਾ ਵਧਿਯਾ ਲਗੀ, ਤੇ ਤੁਹਾਨੂ ਮੇਰੀ ਪੰਜਾਬੀ??
आशीष
---
पहला ख़ुमार और फिर उतरा बुखार!!!

Dr Varsha Singh said...

Excellent my dear Dr. hardeep ji!