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Thursday, November 25, 2010

कुछ तो करना होगा ..........














शाम हुई   रात गई काली
कब का मिट गया था अँधेरा
रिश्वतखोरी के बादलों ने
 होने दिया था नहीं सवेरा.........
करता रहा तेरे शहर को
अपना बनाने की  मैं कोशिश
झूठ- फ़रेब की  गर्म हवा ने
होने नहीं दिया  वह मेरा.......
आशाओं का नन्हा पौधा
रोपा  था मन के आँगन में
भ्रष्टाचार के  दूषित जल ने
चारों तरफ़ जमाया डेरा …
नन्हीं  ख़्वाहिशों के पाखी तो
कब के आकरके  बैठे थे
हेरा-फेरी व कपट-जाल ने
कहीं ना होने  दिया बसेरा.........
हमारी सब भोले-भालों की
कुराहे डाली भरी  जवानी
आज के  इन  सब रहबरों  ने
धुँधला कर दिया चार-चुफेरा............
सभी   तैरते   लहरों के संग
कि  वे बदल  डालेंगे  जग को
अब  चीरकर इन लहरों को
हम तोड़ेंगे  इनका घेरा …


हरदीप कौर सन्धु ( बरनाला)

9 comments:

arvind said...

bahut achhi rachna...sundar prastuti.

सहज साहित्य said...

आज की विषम परिस्थितियों को आपने बहुत बेवाकी से चित्रित किया है । आज के गुमराह समाज के प्रति आपकी चिन्ता ज़ायज़ है ।इन नए तेवरों का स्वागत है ।

निर्मला कपिला said...

नन्हीं खाहिशों के पक्षी तो
कब के आकर बैठे थे
हेरा-फेरी के जाल ने
होने नहीं दिया बसेरा.........
सही बात है ये भ्रष्टाचार देश को किस तरह निगल रहा है। बहुत अच्छी लगी आपकी रचना। बधाई।

Dr (Miss) Sharad Singh said...

रिशवतखोरी के बादलों ने
होने नहीं दिया सवेरा... कटाक्ष पूर्ण सुन्दर बिम्ब का प्रयोग किया है आपने। अच्छी रचना के लिए बहुत-बहुत बधाई।

वन्दना said...

सुन्दर कटाक्ष्।

Bhushan said...

अपनी सुंदर रचना में आपने कुछ पंजाबी अभिव्यक्तियाँ रखी हैं. अच्छा लगा.

abhi said...

ये सिस्टम है जी ये सिस्टम है..
अच्छा कटाक्ष किया है आपने.

ज़मीर said...

बहुत ही सुन्दर रचना . शुभकामनाएं

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

हरदीप जी,
आपकी कविता समाज में व्याप्त विद्रूपताओं पर गहरा प्रहार करती है ! आपके तेवर मन को छूते हैं !
बहुत बहुत साधुवाद !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ