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Sunday, December 19, 2010

दादी के बाद.....
























दादी के बाद
संदूक व चरखा
एक कोने में
कौन काते सूत
और संभाले संदूक
कौन बनाए खेस
व बनाए बंबल
झंझट निपटाओ
शहर से लाओ कम्बल !

हरदीप कौर सन्धु ( बरनाला)

9 comments:

Udan Tashtari said...

एक शेर याद आया:
(शायद मुन्नवर राणा जी का है)

नए कमरे में चीजें पुराणी कौन रखता है
कुंडों में परिंदों के लिए मेह पानी कौन रखता है
आप जैसे लोग ही हैं जो संभालते हैं गिरती दीवारों को
वर्ना नए दौर में बुजुर्गों की निशानी कौन रखता हैं

सहज साहित्य said...

हरदीप जी , धीरे-धीरे हाथ से काम करने की आदत छूटती जा रही है । पहले हर व्यक्ति किसी न किसी काम में लगा रहता था ; इसीलिए अपने यहाँ का हस्तशिल्प ज़िन्दा था । आज ऐसे काम को फ़िज़ूल का काम और वक़्त की बरबादी मानने लगे हैं । परिणाम सामने है-तरह -तरह की बीमारियाँ और तनाव हमें खोखला कर रहे हैं। आप इस तरह की रचनाएं देकर सबको अपनी जड़ों की याद दिलाती रहती हैं। बहुत साधुवाद!

दीनदयाल शर्मा said...

बूढा मा-बाप

बूढा मा-बाप
घर रा
जींवता-जागता ताळा
अर घर रा रूखाळा।

जुवान मा-बाप

मन री
सगळी बात
पूरी करै
हातोहात।

डॉ टी एस दराल said...

एक मोमेंटो समझ कर ही रख लेना चाहिए ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

परिवर्तन ज़रूरी है ..पर पुरानी यादें कहाँ छूटती हैं

अरविन्द जांगिड said...

"बदलाव की आंधी में सस्कृति उड़ गयी" बदलाव सृष्टि का नियम है, लेकिन ये बदलाव इतनी तेजी से हो रहा है की शायद आगे जाकर हमारे पास दिखाने को कुछ बचे ही नहीं...

Bhushan said...

आपकी रचना तीन हाइकु का समामेल है. है न? बहुत सुंदर रचना.

Apanatva said...

badiya rachana.

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

डा. हरदीप संधू जी,
पुरानी मान्यताओं पर नए दौर के विश्व्वास के बनावटी चहरे को नोचती हुई आपकी कविता ने मन को झकझोर दिया!
सुन्दर और सच्ची अभिव्यक्ति के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें!
ज्ञानचंद मर्मज्ञ