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Monday, December 19, 2011

पंजाबी लोकगीत: धड़कते दिल का आईना

कृपया पूरा अंक पढ़ने के लिए गर्भनाल पर क्लिक कीजिए






Thursday, December 8, 2011

हाइकु मुक्तक


सरस्वती सुमन का अक्तुबर -दिसम्बर अंक मुक्तक विशेषांक के रूप में प्रकाशित किसी भी पत्रिका का अब तक का सबसे बड़ा विशेषांक है ।इस अंक के सम्पादक हैं-जितेन्द्र जौहर । इसमें भारत और देशान्तर के लगभग 300 रचनाकर सम्मिलित किए गए हैं।इस अंक में 6 साहित्यकारों के हाइकु मुक्तक भी दिए गए हैं; जिनमें भावना कुँअर ,डॉ हरदीप कौर सन्धु आस्ट्रेलिया से, रचना श्रीवास्तव , संयुक्त राज्य अमेरिका से और तीन भारत से हैं। डॉ हरदीप कौर सन्धु के मुक्तक हाइकु यहाँ दिए जा रहे हैं ।- प्रस्तुति -रामेश्वर काम्बोज हिमांशु


डॉ हरदीप कौर सन्धु

1
तपती धूप / सरपट दौड़ती  / नंगे थे पाँव
वाण की खाट / खड़ी कर धूप में / माँ करे छाँव 
खुले आँगन / जोड़कर बिछाते / खाट  से खाट
निर्मल हवा / बरगद की छाँव / थी मेरे गाँव

2
मेरे मन में/ घुमड़े  तूफ़ान हैं / कुछ अनाम
कब थमेंगे / भला जानूँ मैं कैसे ? मुश्किल काम 
सहज नहीं /बाँधकर रखना /अपना मन
तेरे मन की/ शीतल लहरों ने / दिया है थाम
3
 ढूँढना ज़रा / गुम हो गई कहीं /मेरी मुस्कान
ऐसी गोलाई / जो रोक दे उमड़ा/ हुआ तूफ़ान
घर-आँगन/ मुस्कान से बिखरे/ खुशी के रंग
माँगना है तो/ माँग रब से सिर्फ़ / ये पहचान
  4
गाँव जाकर/ मुझे मिला ही नहीं /गाँव जो मेरा
न जाने कहाँ / मुर्गे की बाँग वाला / गुम सवेरा 
नीम के झूले/ ठण्डी -छैंया फुदके / पाखी का डेरा 
बहुत ढूँढा/ दिल में जो बसता/ यादों का डेरा
             5
समय कभी / हाथ नहीं आएगा / ख़ुशी से जीना
हिम्मत जुटा/ मिलेगी वो मंजिल/ दर्द भी पीना
निराश मन/ कोई भी न आएगा / साथ में तेरे
सीख ओ मन/जला आशा का दीप/जख्म को सीना
                 6
यह संसार/ है मोह का सागर/ डूब ही जाना
मोह -माया में / खेल  आँख मिचौली/ कुछ न पाना
अकेला कर्म / संग जाएगा तेरे / तय इतना
झूठे सुख को / सच जान तुमने / सुख है माना।
-0-

Monday, November 28, 2011

भावों का मेला {महिया}

लोकगीत पंजाबी लोक संस्कृति का अटूट हिस्सा हैं | लोकगीत  कभी नहीं मरते | पंजाबी साहित्य में अगर किसी को आशीष देनी हो तो कहा जाता है , " जा तेरी उम्र लोकगीत जितनी हो" | लोगों के मन में हमेशा जिन्दा रहते हैं लोकगीत | 
पंजाबी लोकगीतों का दायरा बहुत बड़ा है जिसमें 'माहिया' गुलाब के फूल जैसे अपनी अलग- सी खुशबू  लिये हुए हैं | 

फूलों में फूल गुलाब 
लोकगीत महिया का 
है नहीं कोई जवाब 

डॉ. सोहिन्द्र सिंह बेदी के अनुसार माहिया शब्द माही से बना है जिसका अर्थ है ' भैसे चराने वाला चरवाहा"| वारिस शाह के जमाने में इसका यही अर्थ था | वारिस की हीर में 'माही' शब्द का प्रयोग इसी संदर्भ में किया गया है | यह कोई नहीं जानता कि कब और कैसे माही शब्द का अर्थ बदलकर प्रियतम हो गया | 
माहिया तीन पंक्तियों का एक छोटा सा छन्द है जिसकी पहली और तीसरी पंक्ति में 12-12 मात्राएँ तथा दूसरी में 10 मात्राएँ होती हैं |पहली और तीसरी पंक्तियाँ तुकान्त होती हैं| 
पंजाबी में जितने माहिए अब तक लिखे गए हैं उनमें पहली पंक्ति तुकान्त जोड़ने के लिए ही होती है | इसमें कोई चित्रण या दृश्य पैदा किया होता है, असली भाव दूसरी व तीसरी पंक्ति में ही होता है|माहिया का विषय प्यार -मोहबत ही है|

 मैं पहले पंजाबी के माहिया का उदाहरण देने जा रही हूँ .......

कोट किल्ली ते ना टंगिया करो
साडे नाल नहीं बोलणा
साडी गली वी ना लंघिया करो 


कोट किल्ली उते टंगणा ए
गली थोडे पियो दी तां नहीं 
असीं रोज इथों लंघणा ए 

सोने दी परांत होवे 
अज मेरे माहिए आवणा
वीह वरियां दी रात होवे 

केहा कढिया कसीदा खेस ते 
होवे जे तू मुल विकदी 
तैनू लै लवां जिन्द वेचके

बागे विच आया करो 
जदों असीं सौं जाइए 
तुसीं मख्खियाँ उड़ाया करो 

बागे विच आया करो 
मख्खियाँ तों डर लगदा 
गुड़ थोड़ा खाया करो 


दो माहिया अमिता कौंडल जी ने याद दिलाए ......


बाईसाइकल चलाई जांदे हो 
ओ थोडी की लगदी 
जिहनू मगर बिठाई जांदे हो 


बाईसाइकल चलाई जांदा हाँ 
ओ साडी ओहिओ लगदी 
जिहनू मगर बिठाई जांदा हाँ 


अब पेश हैं मेरे लिखे माहिया 
1.
भावों का मेला है 
इस जग- जंगल में 
मन रहे अकेला है 

2.
ख़त माँ का आया है 
मुझको पंख लगे
दिल भी हरषाया है
3.
यह खेल अनोखा है
जग में हम आए 
बस खाया धोखा हैं 

4.
ये गीत  पुराना है 
रूठ गया माही
 अब उसे मनाना है

5.
तू जब से  रूठ गया
मुस्काना भूली 
दिल मेरा टूट गया 

6
देख गुड़िया पटोले
छलकी ये आँखें 
मेरा बचपन बोले 
7 .
चलता कौन बहाना
 मौत चली आई
बस साथ तुम्हें जाना
8.
गाँव कहाँ वो मेरा
मुर्ग़ा जब बोले
होता जहाँ सवेरा


9
शब्दों से  गीत बना 
अँखिया राह तकें 
तू दिल का मीत बना 

10 
 अनजाने  भूल हुई
जो दी ठेस तुम्हें
मुझको वह शूल हुई

हरदीप 





Friday, November 25, 2011

हिन्दी गौरव में मेरे हाइकु पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिएगा


        हिन्दी गौरव में मेरे हाइकु ( पन्ना 52 - नवम्बर -दिसम्बर अंक )
                               
                                             हिन्दी गौरव 
                  ऑस्ट्रेलिया का प्रथम हिन्दी ऑनलाइन समाचार -पत्र 

Thursday, November 17, 2011

हाइबन - कुछ तो लोग कहेंगे

हाइबन जापानी भाषा के शब्द ‘हाइबन ‘ का अर्थ है - काव्य- गद्य |
हाइबन गद्य और कविता का जोड़ है|  यह शैली 1690 में बाशो ने अपने सफरनामे/ डायरी के रूप में अपने मित्र को एक खत ‘भूतों वाली झोंपड़ी’ लिखकर शुरू की थी ।इस खत के अंत में एक हाइकु लिखा गया था|
हाइबन का गद्य भी हाइकु जैसे जो हो रहा है उसका वर्णन प्रतिबिम्ब से सूक्ष्म होता है
हाइबन में 1०० से लेकर 2००-3०० शब्द हो सकते हैं|
लम्बे हाइबन में तीन - चार हाइकु गद्य के भाव को और स्पष्ट करते हुए हो सकते हैं

                                                     कुछ तो लोग कहेंगे
आप चाहे कोई भी काम करें - अच्छा या बुरा , लोगों ने कोई न कोई टिप्पणी तो देनी ही होती है , क्योंकि हमारे यहाँ ये बीमारी आम ही पाई जाती है ....

बिन चुगली
पेट नहीं भरता
यहाँ किसी का

ठीक ऐसे ही जब कोई एक नई कार लेकर आया तो अपने दोस्त को दिखाने लगा । दोस्त बोला , “यार अगर तू नीले रंग की जगह लाल रंग की कार लेता तो ज्यादा अच्छा होता।” उस भले बंदे से दो बोल तारीफ के नहीं बोले गए
 
हम में ज्यादा
कह नहीं सकते
अच्छे को अच्छा
 
इसी तरह अपनी एक सहेली का नया घर देखने आई उसकी सहेली बोली,”ऊँह ...हमारे मकान जितना बड़ा तो नहीं है ये।” भई भलिए ...तुझे किसी ने पूछा है कि तेरा मकान कितना बड़ा है ? दूसरे के काम में त्रुटि निकालने में हर कोई बहुत माहिर है लेकिन ......
 
क्या पड़ा हुआ
अपनी खाट नीचे
कौन झाँकता ?
 
हरदीप

Saturday, November 5, 2011

मधाणीआं - पंजाबी लोकगीत- (कल और आज )

पंजाबी लोक गीत …..मधाणीआं……बीते होए कल नूं याद करदिआं …….सुरेंदर  कौर दी आवाज़ ‘च



मधाणीआं ……
हाए ओ मेरिआ डाढिआ रबा, किन्ना  जमीआं किन्ना  ने लै जाणीआं होए
छोले…….
बाबुल तेरे महिलां ‘चों, सत रंगीआ  कबूतर बोले
छोई….
बाबुल तेरे महिलां विच्चों  तेरी लाडो परदेसण होई
फीता…..
इहनां सकीआं भाबीआं ने डोला तोर के कच्चा  दुध पीता
फीता……
मेरे आपणे वीरां ने , डोला तोर के अगांह नूं  कीता
कलीआं….
मावां -धीआं मिलण लगीआं, चारे कंधां ने चुबारे दीआं हलीआं

मधाणीआं…….अज दे कौड़े सच नूं  उजागर करदिआं…अमरिंदर  गिल्ल दी आवाज़



मधाणीआं…..
हाए ओ मेरे डाढिआ रबा,धीआं जमणे तों पहिलां मर जाणीआं,
हाए छल्लीआं…..
रबा कैसी जून चंद री,जग वेखणे तों पहिलां मुड़ चल्लीआं.
हाए लोई……
बापू तेरा धन जिगरा,असीं मरीआं ना अख तेरी रोई
हाए फीता …..
बाबला वे मुख मोड़िआ , तूँ वी अमीए तरस ना कीता.
हाए डेरा….
पुतां तेरा घर वण्डणा ,धीआं वण्डणा  बापू वे दुख तेरा, हाए.
हाए जोड़ी….
अमीए ना मार लाडली ,कौण गाऊगा  वीरे दी दस्स  घोड़ी……हाए ।                                                                                                                                                                                                                    


- हरदीप 

Sunday, October 30, 2011

हाइकु ( उदन्ती मासिक)


हिन्दी हाइकु को जिन पत्रिकाओं ने ऊँचाई प्रदान की है, उनमें वीणा , उदन्ती , गर्भनाल ,हिन्दी गौरव , आरोह -अवरोह ,अप्रतिम ,लोक गंगा प्रमुख हैं । उदन्ती में डॉ रत्ना वर्मा जी जनवरी -11से हाइकु का प्रकाशन कर रही है । इन सबका आभार प्रकट करते हुए डॉ हरदीप सन्धु के उदन्ती के अक्तुबर अंक में प्रकाशित हाइकु दिए जा रहे है ।इन्हें उदन्ती के इस लिंक पर भी पढ़ा जा सकता है ।







Monday, October 24, 2011

दीवाली [चोका]*


आई दीवाली 
जगमग रौशन
घर आँगन 
जब मिट्टी का दीया 
स्नेह बाती से 
परोपकार तेल 
डाल जलाया 
दीए को माना 
जीवन का आदर्श 
शुभ संकल्प
कभी न माँगा 
अंधकार हमने 
दिव्य ज्योति से 
असंख्य दीप जले 
भीतर छाया 
अज्ञान का तमस 
तेज पुंज से 
चूर -चूर हो जाए 
बुहारो तुम 
ज्यों कर्म का कचरा 
जमा जो हुआ 
चेतना के आँगन 
मोह दीप की 
जला अखंड ज्योति 
कौन बुझाए 
आँधियों में भी जले 
दिव्य प्रकाश मिले !

हरदीप 
*चोका जापानी काव्य शैली की लम्बी कविता है जिस में 5 +7 5 +7 +5  का क्रम होता है और अंत में ताँका [ 5 +7 +5 +7 +7 ] जोड़ दिया जाता है |

Saturday, October 22, 2011

"गुम हुई नदिया "{चोका}

*चोका जापानी काव्य शैली की लम्बी कविता है जिस में 5 +7 5 +7 +5  का क्रम होता है और अंत में ताँका [ 5 +7 +5 +7 +7 ] जोड़ दिया जाता है |
रेगिस्तान  में 
गुम हुई नदिया 
सूख जाती है 
चीखती- पुकारती 
चाहती मुक्ति 
 मंजिल न ठिकाना 
न कोई रास्ता 
 मिले नहीं सागर 
गुम जब हो 
सागर में नदिया 
मिटा अस्तित्व 
गुम होते किनारे 
मिटे नाम भी 
छोटी सी ये नदिया 
बड़ी हो जाए 
सीमित से अब ये 
हो सीमाहीन
ऐसे गुम हो जाना 

ब कुछ पाना है


हरदीप 



Saturday, October 8, 2011

मिले किनारे {ताँका -चोका संग्रह}


                     [ पूरा पढ़ने के लिए चित्र पर क्लिक कीजिए ]     

                                      मिले किनारे 

                         ताँका - चोका संग्रह 

रामेश्वर काम्बोज' हिमांशु ' / डॉ.हरदीप कौर सन्धु 
                       संस्करण - 2011
                                                     

काम्बोज जी से व्यक्तिगत परिचय बरेली आने पर आज से 24 वर्ष पूर्व हुआ | इनकी रचनाओं  से मैं पहले से ही परिचित था | लघुकथा , कविता ,व्यंग्य , समीक्षा , लेख आदि  सभी में इनकी पकड़ सदा समाज की नब्ज़  पर रही है | सामाजिक सरोकार कभी भी इनकी रचनाओं से ओझल नहीं हुए |
         हाइकु 1986 से लिख रहे थे , लेकिन उस समय जिस तरह की रचनाएँ आ रही थीं , ये उनसे संतुष्ट नहीं थे | ' मिले किनारे ' संग्रह के ताँका और चोका रचनाओं में भी इनके वही सामाजिक सरोकार , वही अनुभूति की ईमानदारी , वही बेबाक अभिव्यक्ति दिखाई देती है , जो इनके जीवन का भी अटूट हिस्सा रही है |मैंने इनको शिक्षक एवं प्राचार्य के रूप में भी निकटता से देखा है |ये जीवन और साहित्य में एक ही जैसी क्षमता से कार्य करते नज़र आते हैं |इनके चाहे ताँका  हों या चोका , वे व्यक्ति और समाज के दुःख -सुख के साक्षी ही नहीं , भागीदार बने दिखाई देते हैं| पर-दुखकातरता की इनकी विशेषता एक ओर इनकी भावभूमि है तो भाषा पर मज़बूत पकड़ , सार्थक शब्द -चयन  में इनकी परिपक्वता और क्षमता भाषा -संस्कार के रूप में हर पंक्ति में दृष्टिगत होती है |पाठक इनकी रचनाओं को पढ़कर इन्हें जान सकता है ,इसमें दो राय नहीं है |
                                      ------- सुकेश साहनी

यह सुखद है कि हिन्दी जगत में ‘हाइकु’ के पूर्णत: प्रतिष्ठित एवं समादृत होने के पश्चात् अब जापान की अन्य काव्य शैलियों-ताँका ,चोका, हाइगाकी ओर रुझान बढ़ रहा है ।
डॉ हरदीप कौर सन्धु एक ख्यात हाइकुकार हैं और नवीन प्रयोगों में रुचि रखती हैं।प्रस्तुत संग्रह ‘मिले किनारे’ में उनके एक सौ ताँका और ग्यारह चोका  कविताएँ संगृहीत हैं । ‘ताँका’ में उन्होंने ग्राम्य जीवन और लोक संस्कृति के ऐसे अनूठे चित्र उकेरे हैं,जिन्होंने उनकी कविता को एक नई ताज़गी प्रदान की है । आंचलिक शब्दों के प्रयोग ने कविता में अपूर्व माधुर्य एवं विश्वसनीयता भर दी है । उनकी रचनाओं में रिश्तों की पावन महक-विशेष रूप से माँ के प्रति लगाव  दर्शनीय है! डॉ सन्धु के ताँका आर्जव , माधुर्य एवं लालित्य से भरपूर हैं।
           चोका कविताओं में तारत्म्य और नैरन्तर्य  बना रहता है;जो चोका का विशेष गुण है, साथ ही आन्तरिक लय भी है । ‘गुलमोहर’ , ‘वसन्त ॠतु’, ‘तेरी ख़्वाहिश’ ,’रब की चिता’, ‘अपना घर’ और  ‘रब जैसी माँ’ शीर्षक चोका  कविताएँ विशेष मोहक बन पड़ी हैं ।
 -डॉ0 सुधा गुप्ता
पवित्रा एकादशी 9 अगस्त ,2011

Tuesday, October 4, 2011

रब का घर


छोटी सी छपरी छह -सात जने

जिसको निक्कू घर है कहता

चले आँधियाँ छत उड़ जाती

रब जाने वह क्या-क्या सहता

फटे -पुराने पहनकर कपड़े

भूख-दंश से लड़ता रहता

पेट कमीना भरने की खातिर

इधर-उधर भटकता रहता

न जाने सुख कौन -सी चिड़िया

दुःख-पीड़ा को में दहता रहता

निक्कू पकड़कर माँ की उँगली

कूड़ा-करकट सदा बीनता

रुक गया एक दिन चलता-चलता

बिना-झपके मन्दिर को देखता

‘माँ इत्ता बला सुन्दर-सुन्दर’

‘तिसका घल है ?’ निक्कू पूछता

बेटा इस बड़े घर के अन्दर

हमारा सबका ‘वो रब’ रहता

‘माँ बता मुझे औल तौन-तौन’

‘उस लब के साथ वहाँ लहता’

और कोई नहीं’ पुत्तर मेरे

रब तो वहाँ अकेला ही रहता

माँ तल फिर वहाँ रहें हम

लब हमें तुछ नहीं कहता !

हरदीप 

Saturday, October 1, 2011

हरदीप सन्धु के हाइकु

 गर्भनाल  हिन्दीं की नेट   पत्रिका  अपने विश्वस्तरीय   साहित्यिक सफर के पांच वर्ष पूरे करने वाली है .अब यह पत्रिका मुद्रित रूप में भी उपलब्ध है .इस पत्रिका ने भारतीय और प्रवासी साहित्यकारों को तो जोडा   ही है ,साथ ही साथ हिन्दी की नव्य विधाओं -हाइकु और लघुकथा को भी प्रोत्साहित किया है.चंदनमन( हाइकु -संग्रह -सम्पादक:रामेश्वर काम्बोज  व डा भावना ) की समीक्षा व काम्बोज जी के हाइकु पूर्व अंकों में दिए  जा चुके हैं .  इसके अक्तूबर  अंक में प्रकाशित हरदीप सन्धु के नए अंदाज़ के  हाइकु पढने  के लिए चित्र पर क्लिक कीजिएगा. 

Wednesday, September 28, 2011

उदास आँखें


न जाने क्यों 
उदासी के बादल
मन में छाए 

ढूँढ़ न पाया 
लाख यतन किए 
कोई उपाय 


उदास आँखें 
फूल-पँखुरियों में
ढूंढें सुकून 


कैसी उदासी 
तन्हाई के बादल
भीगी जुदाई 


खुश्क हैं आँखें 
जज्बात सागर में 
उठा तूफ़ान


हरदीप