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Monday, January 3, 2011

सजल आँखें
















आज कुछ पिंघला
शायद पिछली सुधियाँ
सजल हुईं आँखें

हरदीप कौर सन्धु ( बरनाला)

14 comments:

अरविन्द जांगिड said...

सुन्दर क्षणिका, सुन्दर चित्रण

"दिलों ने दोस्ती की पत्थरों से जब से,
नमी अश्क की चेहरों पे आती नहीं".

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नव वर्ष आपको जीने के नए आयाम दे आप समाज के उपयोगी बने, ऐसी इश्वर से कामना है.

ब्लॉग पर पधारते रहिएगा.

साधुवाद.

निर्मला कपिला said...

गागर मे सागर। सुन्दर क्षणिका। बधाई।

सहज साहित्य said...

आपकी इस मार्मिक क्षणिका और संलग्न चित्र का समन्वित प्रभाव इतना गहरा था कि भावोद्रेक के कारण हृदय ही पिंघल गया । सच्ची कविता की यही पहचान है ।

Bhushan said...

इतनी सुंदर नन्हीं कविता और इतने स्पष्ट आँसुओं का प्रभाव वाकई गहरा रहा.

दिगम्बर नासवा said...

बीता समय कभी ख़ुशी कभी गम .. पर आँखें तब भी नम ....
आपको और आपके पूरे परिवार को नव वर्ष मंगलमय हो ...

हरकीरत ' हीर' said...

हाइकू अपनी विशेषता लिए हुए .....

डॉ टी एस दराल said...

बहुत भावपूर्ण हाइकु ।

ktheLeo said...

नववर्ष की मंगल कामना!

Anonymous said...

Il semble que vous soyez un expert dans ce domaine, vos remarques sont tres interessantes, merci.

- Daniel

arvind said...

what a nice presentation.....

udaya veer singh said...

priya hardeep ji

sat shri akal

parmatma na kare kisi ki aankhen
is tarah sajal ho janyen . anubhutiyon ki athah gahrayion ka
chtran , sundar rachna, abhar .

स्वाति said...

सुन्दर क्षणिका....

Bhushan said...

Very good. I have been educated. It looks good.

Devi Nangrani said...

अर्थ अनर्थ सब एक से
क्या है हालत आज की
शान में किसके कहें अब
है ये हालत ताज की
मन को विचलित करते हाइकु