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Saturday, January 8, 2011

ताजमहल- प्रेम का प्रतीक

















ताजमहल
है एक अमरकृति

शाहजहां ने बनवाया था
याद में मुमताज की

होना चाहिए मन-पावन
देख बुलंदी ताज की

दूधिया सी चांदनी में
देख आकृति ताज की

होश ही खो जाती है
मदहोश जवानी आज की

होती है यूँ तारीफ
उंगलियों के घुमाव से

ताज के गुबंद की
ताज की उठान की

''वाह क्या पाई है जवानी....
रात भी जवां है...
और जवां है ताज भी ''

अधेड़ उम्र वालों की
आँखें ही नहीं होती गलत
गंदे हो जाते ख्याल भी

नहीं देखते वो ताज को
अपनी नापाक निगाहों से

देखते हैं वो....
किसी हसीना के शबाब को
हुसन की उठान को

उभरे गुबंद ताज के
लगते हैं उनको....
उभरे जोबन मुमताज के

अपनी हवस की तुलना
करते हैं वो....
बादशाह शाहजहां से

उफ़्फ़ !
अर्थ ही बदल डाले
इस प्रेम-प्रतीक के
दुनिया के अद्धुत शाहकार के
अपने नापाक ख्यालों से !
हरदीप  

12 comments:

मनोज कुमार said...

उफ़्फ़!
आपसे असहमत हो लूं।
इज़ाज़त है ...?
अगर ये ख़्यालात हैं, किसी के ... और सच है यह, ... तो, बहुत ही घिनौना है। शायद आपकी रचना उनकी आंखें खोले। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
फ़ुरसत में आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री के साथ

यशवन्त माथुर said...

ताजमहल सिर्फ और सिर्फ मोहब्बत और उस खूबसूरती का पर्याय है जिसकी तुलना हवस से नहीं की जा सकती.
मेरा सौभाग्य है कि मेरा जन्म ताज के शहर में हुआ और एक वक़्त ऐसा भी आया था जब सुबह को जॉब पर जाते हुए और रात को लौटते हुए दोनों वक़्त यमुना के उस पार ताज को निहारता चलता था.

सादर

ktheLeo said...

गम्भीर भाव लिये हुये सशक्त अभिव्यक्ति के लिये बधाई!

ताज से जुडे कुछ सच:

शाहजँहा ने मुमताज के पति को मार कर उससे शादी की थी।
मुमताज शाहजँहा की चौथी पत्नी थी।
मुमताज की मृत्यु चौदहवे बच्चे को जन्म देते समय हुई।
शाहजँहा ने मुमताज की मौत के बाद उस की छोटी बहन से शादी कर ली थी।
ताज बनाने में लगे सब कारीगरों के दोनों हाथ काट दिये गये थे।

शायद यह सच ताज की सुन्दरता से कोई ताल्लुक न रखते हों,पर ताज से अलग करके इन्हे, देखा भी नहीं जा सकता!

डॉ टी एस दराल said...

हरदीप जी , ताज के बारे में ऐसे ख्यालात कभी नहीं सुने ।
बेशक ताज एक बेइंतहा मोहब्बत का प्रतीक है ।

वन्दना said...

लोगो की मानसिकता कितनी ओछी हो गयी है कि वो ऐसा भी सोच सकते हैं…………उस मानसिकता को बखूबी उजागर किया है।

सहज साहित्य said...

ज़माना बदल गया तो लोगों की सोच भी बदल गई। अन्तर्मन में जब कलुष होता है तो बाहर भी ऐसे व्यक्तियों को हर चीज़ में केवल उपभोग ही दिखाई देता है । उस शाहजहाँ की पीड़ कौन जानेगा जो जीवन के अन्तिम दिनों में कारागार में रहकर अपनी स्मृतियों के ऊपर की राख कुरेद्कर आहत होता था ,जीकर भी रोज़ सौ-सौ मरण मरता था । हरदीप जी आपने बहुत ही सूक्ष्म दृष्टि से ताजमहल को नई व्याख्या दी है ।

Devi Nagrani said...

अर्थ अनर्थ सब एक से
क्या है हालत आज की
शान में किसके कहें अब
है ये हालत ताज की

Devi Nagrani

Udayaveer Singh said...

priya Hardeep ji

sat shri akal

taj mahal ko apne vicharon men pirone ka achha prayas kiya hai aapne
vaise kisi vidwan ne kaha hai ---
"the taj is the mass of tears "
sundar shilp ki prayog .achha laga .abhar.

Surinder Ratti said...

हरदीप जी,
बहुत सुंदर ढंग से दर्शाया है, लोगों के देखने का नजरिया ही अलग है, अर्थ का अनर्थ कर देतें हैं.
इन पंक्तियों में आपने जो चोट की है वह सही है
अधेड़ उम्र वालों की
आँखें ही नहीं होती गलत
गंदे हो जाते ख्याल भी
नहीं देखते वो ताज को
अपनी नापाक निगाहों से
देखते हैं वो....
किसी हसीना के शबाब को
हुसन की उठान को
सुरिन्दर रत्ती
मुंबई

राजीव थेपड़ा said...

hardeep.....!!!kyaa kahun main...!! is tarah kaa vichaar....ekdam alag-sa lagaa.....aur sach kahun...acchha bhi lagaa....sachmuch....!!!

संजय भास्कर said...

हरदीप जी,
नमस्कार !
सशक्त अभिव्यक्ति के लिये बधाई!

संजय भास्कर said...

आदत.......मुस्कुराने पर
किस बात का गुनाहगार हूँ मैं....संजय भास्कर
नई पोस्ट पर आपका स्वागत है