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Sunday, January 23, 2011

मेरे गांव की फिरनी*

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मेरे गांव की फिरनी*

 यूँ  पड़ गई वो सोच में

 अब आते कम हैं.....

हर कोई जाने की सोचे

मैं तो खड़ी वहीं हूँ

जहाँ छोड़ गए तुम

अब प्रदेसी होकर

भूल गए गांव को

भला सब का चाहूँ

न कोई शिक़वा मुझको

 फिर से फेरा डालो

ओ मेरे वतन वालो....

इन्तजार है उसको

 वो दिल से पुकारे

एक बार आ जाओ ....

फिर से जो तुम

देखो गांव के नजा़रे !

हरदीप कौर सन्धु

 * गांव के चारों ओर बना कच्चा/ पक्का रास्ता 

 

 

 



14 comments:

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (24/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

vijaymaudgill said...

sandhu ji rehna main city ch ha par andro kadi v pind d mehak nahi gayi. reh-reh k chinag mach uthdi hai andar............par job ne te jimevariya ne bandhua jiha kar liya hai.

tuhadi nazar meri ki poem pind te hai


shehro pind gya ha
pind di firni
pathra wali sadak dharakdi hai
sadak te pair dhardiya
ma de pair chumme ne
hale char kadam nahi chalya
khet dharkan lage ne
kheta vich khara darna dharakda hai
zehan vich kidre
rail di shook to pehla
fatak dharak riha hai
meriya akha samne
fatak de paar, pind hai
ma hai, borh hai, duavan ne, shareeka v
rail shookdi nikal gayi hai
shayad ohdi shook de karke
fatak paar d dharkan
main sun nahi sakya

सहज साहित्य said...

गांव के ये कच्चे-पक्के रास्ते सचमुच बहुत जीवन्त होते हैं । अपने प्रिय दोस्तों की तरह इनको भुलाना मुश्किल है । आपने मानवीकरण करके पूरी कविता में प्राण फूँक दिए हैं । बहुत साधुवाद हरदीप जी!

मनोज कुमार said...

गांव से हो रहे पलायन को सूना रास्ता प्रतिबिम्बित करता है और आपकी कविता उसके दर्द को।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत अभिव्यक्ति ..गाँव की ओर चलो ..सन्देश देती हुई

Sushant Jain said...

Gaon prateek par hi 2 sher pesh hai -

dekh shahar me rahna hain to,
man me rakhna gaon bachakar

ek shahar ho jane me,
kitne gaon mare honge...

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

गाँव के कच्चे पक्के रास्ते सदा साथ ही चलते हैं..... बहुत सुंदर रचना

udaya veer singh said...

priya hardeep ji ,

satshri aakal .

soni koshish,apane pinda nu , virse nu ,dil diyan gaharayiyan vichon utarke,mahsus karna -----/
koyi ,koyi karda ve /

dhanvad.

जेन्नी शबनम said...

achhi rachna, badhai.

वाणी गीत said...

बुलाती है गाँव के नीम की छाँव ...
स्नेहिल आमंत्रण गाँव का और दर्द छोड़ जाने वालों का अच्छा लगा !

Kailash C Sharma said...

बहुत मर्मस्पर्शी...बहुत ख़ूबसूरत

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

आद. डा.हरदीप जी,
फिरनी का दर्द हर उस व्यक्ति का दर्द है जो अपनी मात्रु-भूमि से दूर बस उसकी खुशबू के सहारे जी रहा है !
दिल को छू गयी आपकी रचना

Bhushan said...

यह इशारा गाँव की फिरनी की ओर था. पहले लगा न्यौता फिरनी की प्लेट पर भी था. खैर मज़ा आया. अच्छी कविता.

यशवन्त माथुर said...

आप सब को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं.
सादर
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गणतंत्र को नमन करें