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Saturday, March 5, 2011

दिल ....समुन्दरों गहरे















फीता हो जाएगा खत्म
मन की गहराई
तू नाप न सकेगा

टूट जाएगा दिल तेरा
रिश्तों की दूरी
तू देख न सकेगा

क्यों हिसाब-किताब करने
बैठा  है मेरे दोस्त.......

अगर कुछ कर सकता है
तो बस इतना कर

दे दे तू
रिश्तों में पड़ी
दरारों को
मूंदने के लिए
कुछ वक्त उधारा !

हरदीप कौर सन्धु
( बरनाला)



14 comments:

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

आदरणीया हरदीप संधू जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

मन की गहराई
तू नाप न सकेगा

सच कहा आपने … मुमकिन ही नहीं …

रिश्तों के महत्व को दर्शाती , और उनके प्रति सजग सचेष्ट रहने की प्रेरणा देती हुई बहुत अच्छी कविता के लिए बधाई और आभार !

दे दे तू
रिश्तों में पड़ी
दरारों को
मूंदने के लिए
कुछ वक्त उधारा


हमें संबंधों को बचाने के लिए अपने हिस्से का समय देना ही होगा …

हार्दिक शुभकामनाएं ! मंगलकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार

मनोज कुमार said...

एक एक शब्द में गहन भाव।

ललित शर्मा said...

फीता हो जाएगा खत्म
मन की गहराई
तू नाप न सकेगा

बस इन पंक्तियों ने ही थाह ले ली।

आभार

डॉ टी एस दराल said...

बहुत सुन्दर बात कही है । आजकल वक्त ही तो नहीं होता logon के पास ।

Kailash C Sharma said...

दे दे तू
रिश्तों में पड़ी
दरारों को
मूंदने के लिए
कुछ वक्त उधारा

बहुत सुन्दर...हरेक पंक्ति दिल को छू जाती है.आज व्यक्ति के पास सब कार्य के लिए समय है, सिर्फ रिश्तों के सुधारने को छोड़ कर .बहुत संवेदनशील प्रस्तुति .

सहज साहित्य said...

दिल समुन्दरो गहरे/ फ़ीता हो जाएगा खत्म
मन की गहराई
तू नाप न सकेगा

टूट जाएगा दिल तेरा
रिश्तों की दूरी
तू देख न सकेगा

क्यों हिसाब-किताब करने
बैठा है मेरे दोस्त.......

अगर कुछ कर सकता है
तो बस इतना कर

दे दे तू
रिश्तों में पड़ी
दरारों को
मूंदने के लिए
कुछ वक्त उधारा !

फीता हो जाएगा खत्म
मन की गहराई
तू नाप न सकेगा

टूट जाएगा दिल तेरा
रिश्तों की दूरी
तू देख न सकेगा

क्यों हिसाब-किताब करने
बैठा है मेरे दोस्त.......

अगर कुछ कर सकता है
तो बस इतना कर

दे दे तू
रिश्तों में पड़ी
दरारों को
मूंदने के लिए
कुछ वक्त उधारा !-
-हरदीप जी आपकी किस पंक्ति को सराहा जाए किसको नहीं । दिल को नापने के लिए फ़ीते की सीमा आपने बता ही दी तो दिल भी उथला नहीं, गहरा है । रिश्ते न हिसाब किताब माँगते हैं , न सुबूत माँगते हैं और न ही सच्चे प्यार में प्रतिदान का स्थान होता है । आपकी यह कविता शीर्ष पर ठहरती है ।रिश्तों में पड़ी दरारों को भरने में यदि आदमी समय लगाए तो वह रिश्तों की अहमियत समझ सकेगा ।

vijaymaudgill said...

sachi bahut hi vadiya lagi tuhadi poem

baki jo kush v main kehna chahuna c oh ta sariya ne pehla hi keh dita


shukriya

देवेन्द्र पाण्डेय said...

सही है..वक्त ही सभी ज़ख्मों का इलाज करता है।

अनामिका की सदायें ...... said...

bahut sunder baat kahi. sunder sateek kavita.

हरकीरत ' हीर' said...

हरदीप जी बहुत सुंदर भाव हैं रचना के .......

दिगम्बर नासवा said...

अगर कुछ कर सकता है
तो बस इतना कर

दे दे तू
रिश्तों में पड़ी
दरारों को
मूंदने के लिए
कुछ वक्त उधारा ...

बस इंसान ये वक़्त ही तो नहीं देता ... और दरारे बढती रहती hai रिश्तों की ... खाई बन जाती है ....

Kunwar Kusumesh said...

बेहतरीन पोस्ट.
महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें.

सुलभ said...

क्यों हिसाब-किताब करने
बैठा है मेरे दोस्त.......
अगर कुछ कर सकता है
तो बस इतना कर
दे दे तू रिश्तों में पड़ी
दरारों को मूंदने के लिए
कुछ वक्त उधारा !

बहुत सही कहा आपने !

Vijay Kumar Sappatti said...

bahut hi gahre bhaavo se sazi hui rachna .. dil me utar gayi ..

badhayi sweekare kare..

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मेरी नयी कविता " तेरा नाम " पर आप का स्वागत है .
आपसे निवेदन है की इस अवश्य पढ़िए और अपने कमेन्ट से इसे अनुग्रहित करे.
"""" इस कविता का लिंक है ::::
http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/02/blog-post.html
विजय