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Friday, April 29, 2011

गए वो दिन


ताँका शब्द का अर्थ है लघुगीत |  ताँका जापानी कविता का एक रूप है जिसमें 5 + 7 + 5 + 7 + 7 के वर्णक्रम में कुल इकतीस वर्ण होते हैं |डॉ सुधा गुप्ता जी ने सन् 2000  में ताँका की रचना शुरू की थी | 2004  और 2009  के संकलनों में उनके कुछ ताँका भी छपे थे | हिन्दी में रामेश्वर काम्बोज ' हिमांशु' जी ने भी ताँका कविताएँ लिखी हैं | इन दोनों प्रतिष्ठित साहित्यकारों की इन रचनाओं से प्रभावित होकर मैंने भी ताँका लिखने की कोशिश की है | आप डा. सुधा जी के ताँका हिंदी हाइकु तथा रामेश्वर जी के सहज साहित्य ब्लॉग पर पढ़ सकते हो | 
पंजाब में जन्मी.. पंजाब की बात किए बिना नहीं रह सकती | मेरे ताँका भी पंजाब की झलक आपको दिखलाएँगे |


 {1}

  गए वो दिन 
 बाण की खाट कहाँ
 हो गई गुम
 वो डिब्बीदार छाँव
 न मिले किसी गाँव ! 





( २ ) 
गिरा जो मुन्ना 
चींटी का आटा गिरा 
पुचकारे माँ 
भूल गई चोट यूँ
  चींटी गई रे कहाँ !

  (३) 
तोड़ उपले 
दादी हारे में डाले 
आग सुलगे 
उर्द की डाल पके 
बहुत धीरे - धीरे !

(४)

बच्चे जो बोले 
न करो बँटवारा
आँगन छोटा 
न दीवार बनाओ 
बोलो कहाँ वो खेलें !

(५)
अम्मा न रुके 
सुनी जो मेघ - ध्वनी 
उपले ढके 
सँभाले चूल्हे - हारे 
जब बादल छाए !

(६)
शादी के दिन
स्पीकर था लगता 
जोड़ दो खाट
विवाह वाले घर 
फिर गाना बजता !

(७)

सरसों  तेल 
लगे नानी के बाल
सोने के तार
धन्य हो गई नानी 
पाया  नातिन  -प्यार !


( ८)

माँ की कढ़ाई
चादर जो बिछाऊं 
माँ स्पर्श पाऊँ 
उठे  हूक कलेजे 
सीने  इसे लगाऊँ !

(९)

गर्मी जो आए
घुंघरू वाली पंखी
अम्मा बनाए 
छन - छन घुंघरू 
गर्मी दूर भगाए !



(१०)

श्रावण माह 
पकते गुलगुले 
माँ की रसोई 
याद मीठी खुशबू
हर श्रावण आई !












हरदीप कौर सन्धु

(बरनाला)   






  









Sunday, April 24, 2011

अंतरजामी



















1.

अंतरजामी  
बिन शब्दों के जाने 
मन की बात !

2.
जान लेता तू 
देखकर चेहरा 
 दिल की पीड़ !

3.
देखी मुस्कान 
जब मेरे लबों पे 
खुश हुआ तू !

4.
 मेरे वो अश्रु 
शब्द बन समाए 
तेरे दिल में !

5.
दर्द ए दिल 
यूँ सुनाकर तुझे 
हुआ है कम !

हरदीप सन्धु


Thursday, April 21, 2011

दुःख -सुख के साथी

पेड़ शरीक
गिराकर पत्तियाँ
मेरे दुःख में !
**

रोया, मगर
नहीं गिरने दिया
एक भी आँसू !
**

दुःख -सुख में
पेड़ देते हैं सदा
साथ हमारा !
**
पेड़ चुकाते
ऋण की पाई -पाई
धरती माँ की !
                     
 हरदीप कौर सन्धु

                                                                          (बरनाला)

Tuesday, April 19, 2011

चाटी की लस्सी

                 





Friday, April 15, 2011

देखा चाँद उतरा














आज मैं पहली बार एक हाइकु - कविता आपके सामने पेश करने जा रही हूँ | इस  कविता में 14 हाइकु लिखे गए हैं !

रोटी पकाए
तवे पर जो देखा 
चाँद उतरा (1)
लेकिन ......
ज़िक्र छेड़ा है आज जो 
है किसी और ही चाँद का ......
एक वो चाँद 
जो गगन का चाँद 
देखा करती (2)
हर दिन जिसे मैं 
बहुत दूर है मुझसे 
लेकिन ........
उस चन्दा की 
चाँदनी से ही 
मैं आँचल अपना 
हूँ भर लेती (3)
प्रेम - गाथा में 
चाँद सी चाँदनी की 
होती है चर्चा (4)
यह चाँदनी 
मिलती है सबको 
बिना ही खर्चा (5)
हम सभी को भला क्यों 
लगती प्यारी 
ये चन्दा की चाँदनी 
बता तू ज़रा (6)
बिन चाँदनी 
यह दिल किसी का 
कभी न भरा (7)
देखो खुदाई 
उस खुदा की 
मिलती है चाँदनी 
हमें एक - सी (8)
लेकिन .....
ज़िक्र छेड़ा है आज जो 
है किसी और ही चाँद का ....
माँ बैठी थी चूल्हे पास 
रोटी पकाए 
तवे पर जो देखा 
चाँद उतरा 
अदभुत से 
इस चाँद के बिना 
न पेट भरे (9)
आज हर कोई 
रोटी सा चाँद 
पाने को दिन - रात 
एक जो करे (10)
भूखा हो पेट 
चाँद की ये चाँदनी 
न भाए कभी (11)
ओ मेरे चन्दा 
किस काम की यह 
तेरी चाँदनी (12)
दे दे मुझे वो 
रोटी एक वक्त की 
ओ मेरा खुदा (13) 
देखो खुदाई 
फिर उस खुदा की 
चाँद तवे का 
नहीं मिलता कभी 
हमें एक - सा (14)


हरदीप कौर सन्धु
( बरनाला) 
















Wednesday, April 13, 2011

वैशाखी पर्व


वैशाखी को पंजाब में बैसाखी भी कहते हैं | वैशाखी का नाम लेते ही मुझे धनीराम चात्रिक की कविता याद आने लगती है .....
तूड़ी तंद सांभ हाड़ी वेच वट के
लंबडा ते शाहा दा हिसाब कट के
मीहां दी उडीक ते सिआड़  कड के
मॉल धंदा साभने नू चुडा छडके
पग - झग्गा चादरा नवें सवाके
सम्मा वाली डांग नू तेल लाके
कच्छे मार वंझली आनद आ गया  
मारदा दमामे जट मेले आ गया !
वैशाखी पर्व की मेरी तरफ से सभी पाठकों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ !
आज मैं वैशाखी पर्व  पर कुछ हाइकु आपके लिए लेकर आई हूँ !

1.
वैशाखी पर्व
है खालसा पंथ का
जन्म दिवस !
2.
' सिंह' नामक
वैशाखी पर्व पर
मिली उपाधि !
3.
दिन वैशाखी
 जलियाँ वाला बाग
दर्दीला कांड !
4.
मोती हैं सजे
धानी- सी  चूनर में
ढोल हैं बजे !
5.
बिखरा सोना
धरती का  आँचल
स्वर्णिम हुआ !
6.
वैशाखी पर्व
फसल की कटाई
कृषि उत्सव !
7.
वैशाखी पर्व
होता है कौमी जश्न
पंजाबियों का !
8.
वैशाखी पर्व
संदेश हमें देता
खुशहाली का !
9.
वैशाखी मेला
पकी गेहूं बालियाँ
ख़ुशी की बेला !
10.
वैशाखी सुना
फिरकी सा थिरका 
तन व मन !
11.
बजता ढोल
वो ढम्म ढमा  ढम्म
वैशाखी का यूँ !
12.
धड़का दिल
भाँगड़ा और गिद्धा
हुए शामिल !

हरदीप कौर सन्धु
( बरनाला)

Wednesday, April 6, 2011

रिश्ते

                   सीख लिया ये जिस दिन हमने



             बिना हिसाब रिश्ते निभाना॥


             देख लेना तुम फिर उसी दिन


             कुछ और ही होगा ज़माना !!
 
                      हरदीप कौर सन्धु
                                      (बरनाला)

Friday, April 1, 2011

होता है यूँ भारत में....

भारत मेरा
    करता है सम्मान
   हर धर्म का !
***

ऐसा करना
शौक तो नहीं होगा,
है मज़बूरी !
***

साधू बाबा ने
 उड़ा दी यूँ धज्जियाँ
दी सूचना की !
***



युग मशीनी
फलों की टोकरी यूँ
बदल गई !
***

जल्दी करो रे
धकेलो मुझे तुम
रेल गाड़ी में!
***


क्या हुआ   भई
है भिखारी का भेस
रखता  पैसा !
***

   ऊपर चढ़ी
  मोटर साइकिल 
   बिन  हाथों के !
***

क्या देख  रहे
किसी की मज़बूरी
या बच्चे स्कूली !
***


साधू हैं तो क्या
 मन चाहता कभी
हम भी खेलें  !
***
( चित्र गूगल के आभार से )
हरदीप कौर सन्धु