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Tuesday, April 19, 2011

चाटी की लस्सी

                 





11 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

लस्सी की और गाँव की बात ही कुछ और है।

रश्मि प्रभा... said...

आज भी न भूली चाटी -लस्सी तुझे चाटी की लस्सी यूँ माँगकर आज अम्मा को ले गईतू उसके गाँव जो बरसों से बसाकर दिल में रखा है गाँव !... gahre ehsaas

udaya veer singh said...

chati ki lassi --- / ham vikas daur men akele ho gaye hain . ab to bas mahak
yadon men hi simat gayi hain . bas yad kar,udas ho lete hain . sunder kavy sanyojan . shukriya .

सहज साहित्य said...

हरदीप जी आपकी यह चाटी की लस्सी सबसे उत्तम पेय है । एक दिन ऐसा आने वाला है कि हम अपनी इन चीज़ों के लिए भटकते रह जाएँगे । अभी वक़्त है , जागना ज़रूरी है और आपकी यह कविता उसी जगराते का काम करती है । आपके हाइकु निरन्तर नवीन रूप धारण कर रहे हैं । मेरी दिली बधाई !

kshama said...

Bachpan kaa ghar yaad dila diya! Anayaas aankhen bhar aayeen!

kunwarji's said...

kudarti chijo se door bhaagti jindagi me ek baar fir waapas dekhne ko mjboor karti aapki ye rachna....

kunwar ji,

Dilbag Virk said...

lassi ke nirale swad jaisi nirale swad vali rachna

मेरा साहित्य said...

हाइकु में पिरोई कविता बहुत सुन्दर बन गई है । नया और गाँव की माटी की याद दिलाने वाला प्रयोग

KAHI UNKAHI said...

आधुनिकता की दौड़ में हम न जाने कितनी चीजों और खुशियों से वंचित हो गए हैं । कहीं ऐसा न हो, जब तक चेतें , बहुत देर हो जाए...।
आपकी यह चाटी की लस्सी शायद लोगों को नींद से जगाए...।
आत्मा तक तृप्त हो गई...मेरी बधाई...।
अभी तक पी तो नहीं, पर शायद भविष्य में कभी चाटी की लस्सी का आनन्द उठा सकूँ...।

Bhushan said...

लस्सी अकेली नहीं होती थी
उसमें होता था प्रेम
दुलार
और श्रम का तेज
ऊपरी परत पर
दही की मोटी
जीवनसार सी मलाई
यूँ ही तो याद नहीं आती
लस्सी

Dr (Miss) Sharad Singh said...

यूँ माँगकर आज
अम्मा को ले गई
तू उसके गाँव
जो बरसों से
बसाकर दिल में
रखा है गाँव !

संवेदना से भरी मार्मिक रचना...