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Monday, May 30, 2011

अनुभूति और मैं

अनुभूति और मैं
अनुभूति भारत की साहित्यिक , सांस्कृतिक और दार्शनिक विचारधाराओं की रचनात्मक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका है ।  यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित होती है। श्रीमती पूर्णिमा वर्मन जी इस की संपादक है अनुभूति के मासिक पाठक ३ लाख से भी ऊपर है ।
आज 30 मई 2011 को मेरी  कुछ कविताएँ  इस पत्रिका  में प्रकाशित हुईं  हैं |
 यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है।

 हर अच्छे काम के लिए आपका कोई न कोई मार्ग दर्शन करता है | मेरे लिए यहाँ वो नाम है  श्री रामेश्वर कम्बोज हिमांशु जी का....जिनका आज मैं  ह्रदय से धन्यवाद करना चाहती हूँ| मैं उनकी पाठशाला की वो छात्रा हूँ जिसने इस पाठशाला में  दाखिला लेने में बहुत देर कर दी ...लेकिन अब मैं तमाम उम्र वहाँ की छात्रा बने  रहना चाहती हूँ !      
हरदीप कौर सन्धु ( बरनाला) 









Sunday, May 22, 2011

मुझे सांदल बार दिखा दे माँ


 "मुझे सांदल बार दिखा दे माँ" कविता लिखने की प्रेरणा मुझे मेरी माँ से मिली !


आज मैं सांदल बार की बात करने जा रही हूँ जिसे पकिस्तान का मानचेस्टर(City of Textile )  भी कहा जाता है | मेरा ननिहाल परिवार भारत - पाकिस्तान के बटवारे से पहले वहाँ ही रहता था | मेरी पड़नानी अपने बीते दिनों को याद करतीहुई कहा करती  थी , " जब हम बार में थे ...." और फिर वह कभी न खत्म होने वाली बातों की लड़ी शुरू कर देती |


मेरा ननिहाल  चक्क नंबर 52  तहसील समुंदरी जिला लायलपुर में रहता था | मेरी माँ का जन्म भी वहाँ का ही है | मेरे नाना जी ( स. हमीर सिंह तूर -  1915 -2005 ) ने खोजकर पंजाब का इतिहास लिखा था मगर अफ़सोस कि वह बँटवारे की बली चढ़ गया । जब गाँव छोड़ने के समय कुछ जरूरी सामान ही बैलगाड़ियों पर रखा था मगर लम्बा 

रास्ता होने के कारण बैलों ने आगे बढ़ने से मना कर दिया  तब कुछ और सामान के साथ  मन मसोसकर पुस्तकें भी फेंकनी पड़ी इस बात का अफ़सोस नाना 

जी को उम्र भर रहा |

नाना जी सांदल बार के बारे में बताते थे कि राय सांदल खान भट्टी , दुल्ले भट्टी के दादा थे जिस कारण इसे दुल्ले की बार भी कहा जाता था | " बार " शब्द का अर्थ है - वह जंगली इलाका जहाँ खेती करने का कोई साधन न हो यानी पानी वगैरह न मिलता हो | 1896 में पंजाब के गवर्नर सर जेम्स लायल के नाम से इस इलाके को लायलपुर कहा जाने लगा ,जो बाद में बदलकर (1977  ) में फैसलाबाद ( साउदी अरब के बादशाह फैसल बिन अब्दुल अजीज के नाम से) बना दिया |

आज मै उस सांदल बार को देखने की तमन्नाओं की बेकरारी लिये यह कविता पेश कर रही हूँ .......


मुझे सांदल बार दिखा दे माँ 

जिस मिट्टी से  मामा आए 
नाना ने यहाँ हल चलाए 
चक्क नं : 52 तहसील समुंदरी 
लायलपुर उसे  सभी बुलाते
 अब वो फैसलाबाद कहलाए 
मुझे सांदल बार दिखा दे माँ 
जहाँ नाना का था घर-बार 
बड़ा था उनका कारोबार 
जब लीडरों ने किया बँटवारा 
मुश्किल से अपनों को सँभाला 
भरा -पूरा घर छोड़के  आए 
मुझे सांदल बार दिखा दे माँ 
पड़नानी की रूह वहाँ बसती
'बार ' की बातें वह दोहराती 
अपने गाँव  कुँए का पानी 
पीने को मरते दम रही तरसती
उस पानी से प्यास बुझा दे माँ 
मुझे सांदल बार दिखा दे माँ 
वहाँ बाबा नानक  का था ठिकाना 
हाँ वहाँ रहा अपना ननकाना 
पड़नानी की यादों में से 
बार- बार मैंने देखा है 
आज वही मुझे दिखला दे माँ 
मुझे सांदल बार दिखा दे माँ 

सपने में मैंने एक रात 
माँ देखा तेरा सांदल बार 
जहाँ नाचें खुशियाँ गली - गली 
हर आँगन देखी खिली बहार
जहाँ बचपन तेरा बीता था माँ 
मुझे सांदल बार दिखा दे माँ 

हरदीप कौर सन्धु ( बरनाला )










Tuesday, May 17, 2011

लाडो-बिटिया

आज 17 मई है | आज "शब्दों का उजाला"' शुरू किए पूरा एक वर्ष हो गया है ....और इत्फाक  से आज मेरा जन्म दिन भी है  ! आज मैं आपके लिए  'लाडो-बिटिया ' कविता पेश करके अपना जन्म-दिन मना रही हूँ !





















एक बेटी के मन की बात 
बात पुरानी वही आज 
मैं बताने लगी हूँ 
माँ के आँचल की बात 
बाबुल के महलों की बात 
मैं सुनाने लगी हूँ 
जिस दिन बिटिया जन्मी 
न दी किसी ने बधाई 
बिटिया को सीने से 
लगाकर बैठी माँ की 
पिता ने की खूब 
हौसला - अफ़जाई 
और कहा-
तुम देखना अपनी बिटिया 
लाखों में एक होगी 
कहती हैं नन्हीं उँगलियाँ 
हर कला में वह कुशल होगी 
लाडो बिटिया ने भी 
माँ -बाप के आगे 
न कभी आँख उठाई 
न  कभी खोली थी जुबान 
तन - मन से उसने 
माँ -बाप के किए 
पूरे सब अरमान 
प्यार भर आँचल में 
लाडो ससुराल चली गई 
बाबुल का आँगन वह 
सूना -सूना सा कर गई 
अब मीलों दूर बैठी भी 
माँगती है बस यही दुआएँ 
बाबुल के महलों में 
चलती रहें हमेशा 
सुख की शीतल हवाएँ
बेटी की बलाएँ लेती 
प्यार भरा आशीष  देती 
आँचल में भरकर उसे 
मन ही मन माँ सोचती -
पूत करें घर का बँटवारा
बिटिया दुःख है बाँट लेती 
दुःख - सुख सुनकर माँ बाप के 

दिल का दर्द बिटिया हर लेती 
 जन्म देकर बेटी को 
फिर क्यों ......
एक माँ अभागन  कहलाती 
जिस दिन बिटिया जन्मी थी 
'ओ मन ' तूने....
 ख़ुशी क्यों नहीं मनाई 
लाडो बिटिया के जन्म पर 
लोग देते क्यों नहीं बधाई  ? 
हरदीप कौर सन्धु
(बरनाला)

Saturday, May 14, 2011

वस्त्र परिधान पत्रिका में मेरी कविता ख़्वाहिशों के पाखी

मुंबई से प्रकाशित वस्त्र परिधान पत्रिका के  68 वें अंक ( अप्रैल ) में मेरी कविता .ख्वाहिशों के पाखी प्रकाशित हुई है | यह भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय की पत्रिका है ...
जिसका पूरा पता है ...
वस्त्र आयुक्त का कार्यालय 
 निष्ठा भवन 
 न्यू मरीन लाईन्स ( चर्चगेट )  
 मुंबई - 400 020  
वैदही जोशी जी इस पत्रिका के सहायक निर्देशक हैं ! इस कार्यालय की  गृह पत्रिका " वस्त्र परिधान " के माध्यम से साहित्यिक रचनाओं के अतिरिक्त इस कार्यालय की गतिविधियों को पाठकों के समक्ष उजागर करने का प्रयास किया जाता है | राजभाषा परिवार की ओर से प्रस्तुत है यह अंक ! जिसमें आप मेरी कविता भी पढ़ सकते हैं ! आशा है आपको अच्छी  लगेगी  ! मैं रामेश्वर कम्बोज जी का दिल से धन्यवाद करती हूँ जिनके आशीर्वाद से मैं यहाँ तक पहुंची हूँ ! 


हरदीप कौर सन्धु
 ख़्वाहिशों के पाखी 
करता रहा तेरे शहर को
अपना बनाने की  मैं कोशिश
झूठ- फ़रेब की  गर्म हवा ने
होने नहीं दिया  वह मेरा.......

आशाओं का नन्हा पौधा
रोपा  था मन के आँगन में
भ्रष्टाचार के  दूषित जल ने
चारों तरफ़ जमाया डेरा …...

नन्हीं  ख़्वाहिशों के पाखी तो
कब के आकरके  बैठे थे
हेरा-फेरी व कपट-जाल ने
कहीं ना होने  दिया बसेरा.........

हमारी सब भोले-भालों की
कुराहे डाली भरी  जवानी
आज के  इन  सब रहबरों  ने
धुँधला कर दिया चार-चुफेरा............

सभी   तैरते   लहरों के संग
कि  वे बदल  डालेंगे  जग को
अब  चीरकर इन लहरों को
हम तोड़ेंगे  इनका घेरा …....



Sunday, May 8, 2011

माँ-कुछ त्रिपदियाँ


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माँ-कुछ त्रिपदियाँ
1
जब सब जगह 
खुद न पहुँचा
रब ने बनाई माँ !
2
सबसे बड़ा 
इस दुनिया का 
तीर्थ होती माँ!
3
प्रेम दया की
जीती जागती
मूरत होती माँ
4
जब कुछ कहती 
दिल से सोचे 
पारदर्शी होती माँ !
5
चेहरा पढ़कर 
बात जान लेती
अंतर्यामी होती माँ
6
क्या हुआ जो 
रब नहीं देखा 
रब-जैसी होती माँ !
7
माँ की दुआएँ
करती रहेंगी 
मेरे सिर पर छाँव !

हरदीप कौर सन्धु




Friday, May 6, 2011

स्कूल भी उदास है


   
स्कूल भी उदास है
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
मैं रात की गहरी नींद से जैसे ही जागता हूँ कि बच्चों की चहल-पहल शुरू हो जाती है। आज जागा तो सन्नाटा-सा लगा। ओह! आज तो रविवार है। स्कूल  की छुट्टी है। आज कोई बच्चा नहीं आएगा। कितना बुरा लग रहा है! आते ही बच्चों की धमा-चौंकड़ी शुरू हो जाती है। मेरे मैदान में छोटे बच्चे तो एक-दूसरे का पीछा करते हुए सरपट दौड़ते हैं। कुछ दौड़ते-दौड़ते गिर भी जाते हैं। घुटनों पर थोड़ी-बहुत चोट लग जाती है, फिर दौड़ने लग जाते हैं।बच्चों की यह दौड़ तब तक जारी रहती है ,जब तक शिक्षकों  का आना शुरू नहीं हो जाता है । कुछ शिक्षक टोकाटोकी नहीं करते । बच्चों को भी उनका  डर नहीं रहता है । कुछ का काम बात-बेबात डाँटना होता है, उन्हें देखकर बच्चे चुपचाप एक ओर हट जाते है ।मैं यह तमाशा दिन भर देखा करता हूँ।
पेड़ भी उदास हैं। अब तक चार-पाँच शैतान बच्चे आकर डालियों पर लटक गए होते ।सुधीर को उल्टा लकने में बहुत मज़ा आता है चोट लगने का डर बना  रहता है ।उसकी कई बार हैडमास्टर जी के पास भी पेशी हो चुकी है । छुट्टी के समय देबोश्री अपनी वाटर बोटल का बचा हुआ पानी नीम के पेड़ में डालकर जाती है । यह छोटी -सी बच्ची इस पेड़ का कितना ध्यान रखती है !नन्हीं सुधा तो पत्तियाँ तोड़े बिना रह नहीं सकती। माली को पता तक नहीं चलता। कई बार देबोश्री ने भी इसको समझाया है - “सभी बच्चे इसी तरह पत्तियाँ तोड़ते रहें ,तो छाया पूरी तरह खत्म हो जाएगी।” पर सुधा है कि किसी की बात नहीं सुनती ।कई बच्चे तो पानी पीने का बहाना बनाकर कैण्टीन के समोसे खाने के लिए आ जाते हैं। कुछ बच्चे शिक्षक के कक्षा में न आने पर चुपचाप खेल के मैदान में चले जाते हैं।
घण्टी की आवाज से मेरा आलस्य भाग जाता है । बिना घण्टी बजे पता ही नहीं चल पाता कि कितना समय हो गया है  !छुट्टी का समय बीतने का नाम ही नहीं लेता ।आज सन्नाटा देखकर मोर जरूर आ पहुँचा है। इसे छुट्टी के दिन ही आने का मौका मिलता है ।ह कमरे की खिड़की के काँच में खुद को देखकर, बार-बार उड़कर चोंच मारने की कोशिश कर रहा है । हो सकता है काँच में अपनी परछाई को यह दूसरा मोर समझ बैठा हो । अगर यह न आए तो मुझे बहुत बुरा लगता है।
बच्चे न आएँ तो मेरा मन दिनभर उदास रहता है। पता नहीं बच्चे मेरे बारे में भी सोचते हैं या नहीं! अरे आज छुट्टी के दिन ये दो बड़े-बड़े बच्चे इधर क्यों चले आ रहे हैं ? इतने बड़े बच्चे बाहर के ही होंगे ।इस स्कूल के तो नहीं हो सकते । पर इनके चेहरे तो जाने -पहचाने -से लगते हैं । इन्होंने आगे बढ़कर पाम के पेड़ों को बाहों में भर लिया है । दोनों लड़कों की आँखें नम हैं । इन्हें देखकर माली बीरनराम भी दौड़कर आ गया है -“ यह क्या कर रहे हो  तुम दोनों ? कौन हो , कहाँ से आए हो तुम ?” बीरनराम को इस तरह किसी का स्कूल में आना  अच्छा नहीं लगता । 
अरे काका हम हैं अभिषेक और राहुल ! नहीं पहचाना ? ये पाम के पेड़ हमने ही लगाए थे ।आपने ही  तो इन पेड़ों के नाम अभिषेक और राहुल रखे थे।” बीरनराम के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई -“अरे ! हाँ याद आ गया।कितने बड़े हो गए हो तुम ! तुम्हारे लगाए हुए ये पेड़ भी तो बहुत बड़े हो गए हैं।
मैं भी चुपचाप इनकी बात सुन रहा था ।
“काका , हम बरसात के महीने में आएँगे”-अभिषेक ने कहा-“ हम इस बार गुलमोहर के पेड़ लेकर आएँगे।”
“ दोनों गेट के सामने गुलमोहर  के पेड़ लगाएँगे । गर्मी में जब गुलमोहर लाल फूलों से लद जाएगा, फिर देखना हमारा स्कूल कितना अच्छा लगेगा”- राहुल ने कहा।
“काका , चारदीवारी के पास अमलतास के पेड़ लगा देंगे । सड़क से जानेवालों को भी कितना अच्छा लगेगा!” अभिषेक ने कहा ।
“बहुत अच्छा लगेगा  मेरे बच्चो ! मुझे तुम्हारा इन्तज़ार रहेगा”-बीरनराम के चेहरे पर चमक आ गई । उसकी आँखें गीली हो गई थीं । उसने दोनों के कन्धों को अपने खुरदुरे हाथों से छुआ तो उनकी  भी आँखें भर आईं ।
मेरा मन भी पिंघल गया । कुछ देर के लिए ही सही, मेरे मन की उदासी भी दूर हो गई ।मुझे लगा आज छुट्टी के दिन भी बच्चों की आवाजें मेरे आसपास गूँज रही हैं।
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