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Sunday, May 8, 2011

माँ-कुछ त्रिपदियाँ


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माँ-कुछ त्रिपदियाँ
1
जब सब जगह 
खुद न पहुँचा
रब ने बनाई माँ !
2
सबसे बड़ा 
इस दुनिया का 
तीर्थ होती माँ!
3
प्रेम दया की
जीती जागती
मूरत होती माँ
4
जब कुछ कहती 
दिल से सोचे 
पारदर्शी होती माँ !
5
चेहरा पढ़कर 
बात जान लेती
अंतर्यामी होती माँ
6
क्या हुआ जो 
रब नहीं देखा 
रब-जैसी होती माँ !
7
माँ की दुआएँ
करती रहेंगी 
मेरे सिर पर छाँव !

हरदीप कौर सन्धु




5 comments:

Rachana said...

क्या हुआ जो
रब नहीं देखा
रब-जैसी होती माँ !
sach kaha hai kitne sunder bhav .
सबसे बड़ा
इस दुनिया का
तीर्थ होती माँ!
kya khoob likha hai maa se bada koun hai
sabhi haiku ek se badh ke ek hai.
rachana

Udan Tashtari said...

एकदम सच कहा-ऐसी ही तो होती है माँ.

सुन्दर!!!

निर्मला कपिला said...

जब सब जगह---- सही कहा आपने बहुत अच्छी हैं सब त्रिपदियाँ। शुभकामनायें।

Bhushan said...

बहुत सुंदर त्रिपदियाँ. माँ का सुदर शब्द-चित्र.

मीनाक्षी said...

माँ का बेहद खूबसूरत रूप ...