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Sunday, May 22, 2011

मुझे सांदल बार दिखा दे माँ


 "मुझे सांदल बार दिखा दे माँ" कविता लिखने की प्रेरणा मुझे मेरी माँ से मिली !


आज मैं सांदल बार की बात करने जा रही हूँ जिसे पकिस्तान का मानचेस्टर(City of Textile )  भी कहा जाता है | मेरा ननिहाल परिवार भारत - पाकिस्तान के बटवारे से पहले वहाँ ही रहता था | मेरी पड़नानी अपने बीते दिनों को याद करतीहुई कहा करती  थी , " जब हम बार में थे ...." और फिर वह कभी न खत्म होने वाली बातों की लड़ी शुरू कर देती |


मेरा ननिहाल  चक्क नंबर 52  तहसील समुंदरी जिला लायलपुर में रहता था | मेरी माँ का जन्म भी वहाँ का ही है | मेरे नाना जी ( स. हमीर सिंह तूर -  1915 -2005 ) ने खोजकर पंजाब का इतिहास लिखा था मगर अफ़सोस कि वह बँटवारे की बली चढ़ गया । जब गाँव छोड़ने के समय कुछ जरूरी सामान ही बैलगाड़ियों पर रखा था मगर लम्बा 

रास्ता होने के कारण बैलों ने आगे बढ़ने से मना कर दिया  तब कुछ और सामान के साथ  मन मसोसकर पुस्तकें भी फेंकनी पड़ी इस बात का अफ़सोस नाना 

जी को उम्र भर रहा |

नाना जी सांदल बार के बारे में बताते थे कि राय सांदल खान भट्टी , दुल्ले भट्टी के दादा थे जिस कारण इसे दुल्ले की बार भी कहा जाता था | " बार " शब्द का अर्थ है - वह जंगली इलाका जहाँ खेती करने का कोई साधन न हो यानी पानी वगैरह न मिलता हो | 1896 में पंजाब के गवर्नर सर जेम्स लायल के नाम से इस इलाके को लायलपुर कहा जाने लगा ,जो बाद में बदलकर (1977  ) में फैसलाबाद ( साउदी अरब के बादशाह फैसल बिन अब्दुल अजीज के नाम से) बना दिया |

आज मै उस सांदल बार को देखने की तमन्नाओं की बेकरारी लिये यह कविता पेश कर रही हूँ .......


मुझे सांदल बार दिखा दे माँ 

जिस मिट्टी से  मामा आए 
नाना ने यहाँ हल चलाए 
चक्क नं : 52 तहसील समुंदरी 
लायलपुर उसे  सभी बुलाते
 अब वो फैसलाबाद कहलाए 
मुझे सांदल बार दिखा दे माँ 
जहाँ नाना का था घर-बार 
बड़ा था उनका कारोबार 
जब लीडरों ने किया बँटवारा 
मुश्किल से अपनों को सँभाला 
भरा -पूरा घर छोड़के  आए 
मुझे सांदल बार दिखा दे माँ 
पड़नानी की रूह वहाँ बसती
'बार ' की बातें वह दोहराती 
अपने गाँव  कुँए का पानी 
पीने को मरते दम रही तरसती
उस पानी से प्यास बुझा दे माँ 
मुझे सांदल बार दिखा दे माँ 
वहाँ बाबा नानक  का था ठिकाना 
हाँ वहाँ रहा अपना ननकाना 
पड़नानी की यादों में से 
बार- बार मैंने देखा है 
आज वही मुझे दिखला दे माँ 
मुझे सांदल बार दिखा दे माँ 

सपने में मैंने एक रात 
माँ देखा तेरा सांदल बार 
जहाँ नाचें खुशियाँ गली - गली 
हर आँगन देखी खिली बहार
जहाँ बचपन तेरा बीता था माँ 
मुझे सांदल बार दिखा दे माँ 

हरदीप कौर सन्धु ( बरनाला )










16 comments:

Bhushan said...

पाकिस्तान से आई एक पीढ़ी आज भी जिंदा है जिन्हें पुराने दिनों का यादें सताती हैं. उनमें मेरी सास भी है. उनका हर वाक्य 'जब हम पाकिस्तान में रहते थे' से शुरू होता है.
आपकी कविता पढ़ कर दुख और सुख दोनों की अनुभूति होती है.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बंटवारे ने सच ही मन को इतिहास बना दिया है ...बहुत सुन्दर रचना ..जहाँ पुरानी पीढ़ी ने जन्म लिया उसको देखने की बेकरारी ...बंटवारे ने बहुतों को बेघरबार कर दिया था ...आज भी वो दर्द लोगों की आँखों में उतर आता होगा .

सहज साहित्य said...

इस कविता में विभाजन से उपजे दर्द को बखूबी व्यक्त किया गया है । सियासत आदमी का कुछ न कुछ छीनती ज़रूर है। राज नेताओं के द्वारा बोई हुई ज़हर की फ़सल हमारी कई पीढ़ियों को नेस्ता नाबूद कर देती है ।

निर्मला कपिला said...

बटवारे का दर्द शायद आने वाली पीढियाँ इन्हीं रचनाओं से जान पायेंगी। पहली बार सुना सांदलबार। धन्यवाद।

Dr (Miss) Sharad Singh said...

ऐतिहातिक सच...
और
आपकी कविता ने मन भिगा दिया...

आपने अपनी कविता के कैनवास पर सच का रंग बिखेर दिया है....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 24 - 05 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

udaya veer singh said...

purani smritiyon se rubaru hone ,va karane ka aabhar ji , achha laga .itihas se navinata ka prayas khubasurat hai .

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

जानें ली हैं, खून पिये हैं, कितने दर्द दिये हैं, इस विभाजन ने।

लायलपुर के इतिहास की जानकारी, आपका जुडाव और नानाजी का सर्द सब स्पष्ट है इस आलेख और कविता में। भगवान करेगा तो राहें ज़रूर आसान होंगी एक दिन!

वाणी गीत said...

बंटवारे की त्रासदी ने लोगों से अपनी मिटटी छोड़ने को मजबूर किया , दर्द किसका कम है , इधर या उधर ...राम जाने ...
संदाल्बार के बारे में जानना अच्छा लगा !

सदा said...

आपके इन भावमय शब्‍दों को साथ ही जाना सांदलबार को भी ... बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

rachana said...

मुझे सांदल बार दिखा दे माँ
पड़नानी की रूह वहाँ बसती
'बार ' की बातें वह दोहराती
अपने गाँव कुँए का पानी
पीने को मरते दम रही तरसती
उस पानी से प्यास बुझा दे माँ
darad ko kya khoob shabdon me bandha hai
rachana

mridula pradhan said...

gazab ka likha hai......wah.

कौशलेन्द्र said...

सांदल बार - लायलपुर ...और फिर फैसलाबाद .....पर नानी के लिए तो वह सान्दलबार है ...केवल सान्दलबार ....
विभाजन की त्रासदी का कोई अंत नहीं ......मन अन्दर तक भींग जाता है .......और फिर आक्रोशित होता है ...सियासतदानों के खिलाफ बगावत के लिए .....
भावनाप्रधान एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है यह रचना.

Priyanka Gupta said...

प्रिय हरदीप,
बहुत मार्मिक कविता है...| आपने अपने दिल का ही नहीं, बल्कि उस पुरानी पीढ़ी का भी दर्द बयां कर दिया...|
ऐसी सुन्दर कविता के लिए मेरी बहुत बधाई...|

Patali-The-Village said...

आपकी कविता पढ़ कर दुख और सुख दोनों की अनुभूति होती है| धन्यवाद|

डा. अरुणा कपूर. said...

पाकिस्तान के शहर कराची, रावलपिंडी, क्वेटा वगैरे के बारे में मैने अपनी मां से बहुत कुछ सुना है, जो आनंददायक यादें है!...बंटवारे से ही आम जनता को दुःख झेलने पड गए!...बहुत सुंदर रचना, धन्यवाद!