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Sunday, June 5, 2011

गुम हुए हम

साबुन -लोशन लगाकर 
चमड़ी गोरी कर ली है 
दिल को धोने वाला 
अभी कुछ बना नहीं 
प्यार -मोहब्बत वाली सबातें*
आज जर्जर खंडहर हुईं  
फिर से बनाने का विकल्प  
अभी तक कोई मिला नहीं 
गुम हो गए  कहीं
घर आज मकानों में 
ढूंढ़ने का कोई प्रयत्न 
अभी तक किया नहीं !
हरदीप     
* घर में एक बड़ा सा कमरा जहाँ परिवार के सभी लोग खाट से खाट जोड़कर बैठते और रात को देर रात तक बातें करते  



8 comments:

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

डॉ. हरदीप संधु जी

अच्छा लिखा है -
दिल को धोने वाला
अभी कुछ बना नहीं



दिल का कलुष हम स्वयं ही अपने आचरण से धो सकते हैं और हमारा चरित्र ही इसमें सहायक होता है ।


हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !

- राजेन्द्र स्वर्णकार

सहज साहित्य said...

मकानों में सब कुछ है पर आज धड़कते हुए , प्यार करने वाले दिल नहीं हैं । सबातें का सुन्दर प्रयोग है । फिर वही भारत की पारिवारिक खुशबू ! क्या कहने आपकी कविता के !

Udan Tashtari said...

वाकई कितना कुछ बदल गया है.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज बस मकाँ ही बचे हैं ...

वीना said...

वाकई घर मकानों में गुम हो गए हैं...

डॉ टी एस दराल said...

गम हो गए कहीं
घर आज मकानों में ।
वाह बहुत सुन्दर बात कही है ।
लेकिन वक्त अब लौटने वाला भी नहीं ।

Dilbag Virk said...

ye makaano ka hi daur hai

Dr (Miss) Sharad Singh said...

सच की तस्वीर दिखाती बेहतरीन कविता...