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Friday, June 10, 2011

कौन चाहेगा


कौन  चाहेगा 

अपने मन को रुलाना 
इन आँखों में 
आँसुओं को बसाना
दर्द देता है
जब ये ज़माना 
बन जाती हैं
तब  ये  डरी आँखें
 आँसुओं का ठिकाना 
मगर 
इन डरी आँखों में 
आँसू मत लाना 
जीने नहीं देगा 
तुमको ये ज़माना 
इन डरी आँखों में 
ये तिरते आँसू
कुछ कह रहें हैं ...
इन आँसुओं  से
ये डरी आँखें 
 और साफ हुईं हैं .....
इस कपटी दुनिया को 
साफ -साफ देखने के 
काबिल हुईं हैं .....
कोई पोंछे या न पोंछे 
इन डरी आँखों के 
आज ये आँसू 
कोई गम नहीं .....
आज के बाद 
इस ज़माने को 
देखकर साफ-साफ 
कभी भी न तिरेंगे 
इन अँखियों में आँसू 
होगा अब यहाँ 
हिम्मत का ठिकाना 
इन अँखियों की दृढ़ता 
अब देखेगा ज़माना !
हरदीप 

12 comments:

सहज साहित्य said...

जीवन में जिसके आँसू पोंछने के लिए निर्मल और पावन हथेलियाँ स्वयं आगे आ जाती हों , उसको जीवन में किसी प्रकार का कष्ट नहीं हो सकता । जिसकी व्यथा का आभास होते ही कोई अचानक साथ आकर खड़ा हो जाता है और कह उठता है-'मैं हूँ न!' उसे किसी का डर नहीं हो सकता । वह जीवन भर संघर्ष कर सकता है ।

Udan Tashtari said...

बहुत भावपूर्ण...

udaya veer singh said...

अश्क बिन आँखें ,दर्द बिन दिल ,कांटे बिन पथ , यथार्थ नहीं होते ,काव्य सृजन की मौलिकता मुझे पसंद आई जी . शुक्रिया .

Bhushan said...

सुदंर भावपूर्ण रचना.

दिगम्बर नासवा said...

बहुत भाओक .... मन में उठते द्वंद को अंत में दिशा देता ... लाजवाब रचना है ..

Chandra Bhushan Mishra 'Ghafil' said...

भावपूर्ण रचना

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत अच्छी लगी यह कविता.
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आपका स्वागत है "नयी पुरानी हलचल" पर...यहाँ आपके ब्लॉग की किसी पोस्ट की कल होगी हलचल...
नयी-पुरानी हलचल

धन्यवाद!

Patali-The-Village said...

सुदंर भावपूर्ण रचना| धन्यवाद|

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सार्थक सन्देश देती रचना

Kailash C Sharma said...

सार्थक सन्देश देती बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना...

Dilbag Virk said...

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच

shikha varshney said...

भावपूर्ण ,एक सन्देश देती रचना.