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Tuesday, June 14, 2011

रुतबा पिता का

( डा. अमरजीत सिंह बरार - 20 अप्रैल 1940 - 14 जून 1991 )

आज मेरे डैडी को हम से बिछुड़े २० वर्ष हो गए हैं | आज भी जब डैडी मेरे सपनों में आते हैं तो मैं पूछती हूँ कि आप हमको छोड़कर क्यों चले गए ...कहाँ चले गए थे ..??? अब हम आपको पकड़कर रखेंगे ....आपको कहीं जाने नहीं देंगे .....आपको पता है इतने वर्ष हमने आपके बिना कैसे गुजारे.....??? .....और जब सपना टूटता है ....

 याद उसे किया जाता है जो भूल जाए ..डैडी तो  हरदम मेरे  सांसों में समाए हुए हैं  ....आज मैं इन शब्दों से अपने पिताश्री को विनम्र श्रद्धांजलि दे रही हूँ .........  




कलम स्याही 
बार-बार करती 
माँ का ही ज़िक्र 
हर पन्ना सजाएँ
पिता की बात 
भला क्यों नहीं होती 
ये तो बताएँ
ममता की मूरत 
माँ प्रेम - देवी 
माने जहान सारा 
बिन पिता के 
घर -परिवार का 
कहाँ गुजारा
पकड़कर हाथ 
नन्हे -मुन्नों का
चलना वो सिखाए 
पिता का जूता 
बेटे को जब आए 
मित्र बेटे का 
खुद वो बन जाए 
पहली रोटी 
जब बेटी पकाए 
चाहे हो कच्ची 
पिता को वो लगती 
पकवानो से 
बहुत ज्यादा अच्छी 
पिता का नाम 
जीवन किताब के 
पन्ने -पन्ने पे 
जगमगाए  लिखा 
कौन है जो ले 
बच्चों के जीवन में 
पिता का वो रुतबा !


हरदीप 


11 comments:

Udan Tashtari said...

नमन एवं श्रद्धांजलि.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

हार्दिक श्रद्धांजलि।

सचमुच, पिता का रूतबा और कौन ले सकता है।

---------
सलमान से भी गये गुजरे...
नदी : एक चिंतन यात्रा।

udaya veer singh said...

पिता की यादमें हरदीप तुने रुला दिया ... / हर गलतियों को तिरोहित करता ,दिशा देता ,शाखियाँ सुनाता ,फौलाद की तरह पीछे खड़ा शाया,
प्यार की थपकियाँ देता ,हर मुश्किल आसान करता,भौतिक रूप
में जब साथ नहीं होता है, उसका दर्द मैं समझ सकता हूँ .....सच्चे दिल से मेरी श्रधांजलि ....

दीनदयाल शर्मा said...

Dr.Sahiba...kisi ke jane ke baad unki kami ka ehsaas hota hai...apke dady ji ko mera hardik naman....Deendayal Sharma, Rajasthan, India

निर्मला कपिला said...

आपके पिता जी को विनम्र श्रद्धाँजली।

सहज साहित्य said...

पिता के चरण
( विनम्र श्रद्धांजलि)

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

हाथ की रेखाओं में
होता है कर्मों का लेखा -जोखा;
क्योंकि हाथ में पड़े गट्टे
दिखाते हैं कर्म करने की दृढ़ता
लेकिन
चरण भी बताते हैं अपनी पहचान
दिखाते हैं ज़िन्दग़ी का मुकाम
चरण ही बनाते हैं आचरण
किधर जाते हैं चरण?
वही दिशाएँ
सारा लेखा-जोखा रखती हैं
आचरण का मधुर फल चखती हैं।
वे चरण जो मेरी दिशा तय करते
बरसों पहले
चुपचाप , बिना बताए
अचानक अँधेरे में गुम हो गए
उन्हें तो अभी नापने थे
ढेर सारे रास्ते
पाने थे बहुत सारे मुकाम
वे चरण इतने प्यारे थे कि
तारों के बीच जाकर
आकाश गंगा में खो गए
और हम उनको छूने के लिए
सिर्फ़ माथा झुकाए रह गए

पर आज चारों तरफ़ महसूस होता है-
उन चरणों के निशान,
उनकी खुशबू,
रास्ता खोजने में मदद करती है
आज भी उन चरणों से
प्यार-दुलार की आवाज़ आती है-
‘’शाबाश ! बढ़े चलो पुत्तर
ये धरती तुम्हारी है
जिसके चरण सही दिशा में बढ़ते हैं
उसका मज़मून
सारी दुनिया वाले
सदियों तक पढ़ते हैं।”
टप्- टप्- टप्-¬ टप्
आँखों का गरम जल
उन निशानों पर टपकता है
वे चरण
और भी उजाला करने लगते हैं
साफ़-शफ़्फ़ाक़ दिखने लगती हैं -
सारी दिशाएँ,
महकने लगती हैं फिज़ाएँ
मेरे शुभ आचरण वाले पिता
आज भी बसे हैं मेरे तन-मन में
फेरते हैं हाथ आज भी
सोते -जागते ,थकान में ,सपन में
देते हैं हल्ला शेरी-
“बढ़े चलो पुत्तर
ये धरती तुम्हारी है
तुम्हें बनानी है दुनिया की नई तस्वीर
तुम्हें लिखनी है एक नई इबारत
और तुम्हें बनाना है
एक नई पगडण्डी
जिससे होकर लोग जा सकें,
जीवन का सत्य पा सकें।”

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

विनम्र श्रद्दांजलि ... पिता के लिए सटीक भाव लिखे हैं ,

Dr (Miss) Sharad Singh said...

पिता जी की स्मृतियों को सहेजे आपकी इस मार्मिक कविता को पढ़ मन भीग गया.

Dilbag Virk said...

हार्दिक श्रद्धांजलि

डॉ. हरदीप संधु said...

@समीर जी
@जाकिर अली जी
@उदय वीर जी
@दीनदयाल जी
@निर्मला जी
@संगीता जी
@ शरद जी
@ दिलबाग जी ...आप सबका बहुत -बहुत आभार ..दुःख के पल में शामिल होने के लिए ...
@रामेश्वर जी ,
आपने यह कविता ही नहीं लिखी .....यह तो उस दिल की पीड़ा है जिसने इस दर्द को छोटी आयु में झेला है | सन्तान चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए ...माँ -बाप के लिए वो बच्चे ही होतें हैं ....और माँ -बाप का साया वो हमेशा चाहते हैं |
वाह रे ! "हिमांशु कविमन" ....क्या तेरी पकड़ है ...कितनी गहरी सोच है ...........
जब मैंने कविता पढ़नी शुरू की तो बिलकुल नार्मल थी .....कुछ पंक्तियाँ पढ़ने के बाद मन भर आया ....और जब कविमन ने कविता में ...टप्- टप् आँसू की बात की....मुझे पता भी न चला ... तब तक मेरी आँखों से टप्- टप् आँसू टपकने लगे ....और आगे पढ़ा ही नहीं गया ....पढ़ना बंद कर दिया | मन को चैन फिर भी न था ...फिर कम्पुटर खोला ....फिर से अधूरी छोड़ी कविता पढ़ने बैठी |
बरसों पहले
चुपचाप , बिना बताए
अचानक अँधेरे में गुम हो गए........
सच में ...पता नहीं कहाँ गुम हो गए ...
और हम उनको छूने के लिए
सिर्फ़ माथा झुकाए रह गए.........
हमने तो अभी बहुत सी बातें करनी थीं उनके साथ ....
मेरे पिताजी डाकटर थे और मेरे नाम के आगे भी डा. लिखा देखना चाहते थे ...
“बढ़े चलो पुत्तर
ये धरती तुम्हारी है..........
यह पंक्तियाँ पढ़ते ही मुझे मेरे पिताजी की आवाज़ सुनाई देने लगी .."शाबाश !...वाह बई वाह ! ...हमेशा यही कहा करते थे ...जब भी हम बहन-भाई कोई काम करते ...खुलकर हर अच्छी बात की तारीफ करना ...उनका सबसे बड़ा गुण था !
मेरे शुभ आचरण वाले पिता
आज भी बसे हैं मेरे तन-मन में
फेरते हैं हाथ आज भी
सोते -जागते ,थकान में ,सपन में
देते हैं हल्ला शेरी..........
ठीक कहा 'हिमांशु जी' ...आज भी पिताजी मेरे पास ही हैं ...वह मेरे दिल में हैं और कभी -कभी जब भी कुछ बुरा होने वाला होता है उस रात पिताजी मेरे .... सपने में जरुर मुझे मिलते हैं |कुछ अच्छा हुआ हो तो शाबाश तो आज भी मिलती है !
हरदीप

सुरिन्दर रत्ती said...

हरदीप जी,
माँ और पिता के बिना हमारा जीवन अधूरा है, छोटे बच्चे माँ-बाप पर ही आश्रित रहते है, और जो सेवा उन्होंने हमारी की उसको हम कैसे भुला सकते हैं, उनकी याद सदा हमारे ज़ेहन में रहती है. आपकी कविता में माँ और पिता के प्रति श्रधा उनकी याद ताज़ा है बीस वर्ष तो क्या हम जीवन भर नहीं भूल सकते उनके प्यार को - बहुत खूब ....
सुरिन्दर रत्ती
मुंबई