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Saturday, June 18, 2011

चींटी का गिर गया आटा....

बचपन की थीं नन्हीं -नन्हीं सी बातें 
छोटी -छोटी खुशियाँ तुतलाती फरियादें 
कभी खेलते हम छुपम-छुपाई
खेलने लगते कभी पकड़म  -पकड़ाई
उछलना -कूदना सबको भाता 
खेलते -खेलते  कोई रूठ जाता 
खेल-कूद में कोई गिर जाता 
चींटी का तो सारे का सारा 
ज़मीं पर आटा बिखर जाता 
रोते हुए को माँ पुचकारती 
आँसू भरी अँखियों से 
हमको चींटी ढूंढने में लगाती 
चींटी ढूँते चोट भूल जाते 
उठकर फिर खेलने लग जाते 
वो भोला बचपन अब क्यों नहीं आता
 अब क्यों नहीं गिरता चींटी का आटा ?
हरदीप 



7 comments:

Udan Tashtari said...

काश कि बचपन लौट पाता...

उम्दा रचना.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

मजेदार रचना। बधाई।

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ब्‍लॉग समीक्षा की 20वीं कड़ी...
2 दिन में अखबारों में 3 पोस्‍टें...

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बचपन कप निश्चछलता की याद दिलाती सुन्दर भावपूर्ण रचना....

Patali-The-Village said...

क्यों की अब हमें दीन दुनियां का पता लग गया है|

सहज साहित्य said...

बालसुलभ चेष्टाओं का मनोहारी चित्रण किया गया । आदमी को कुछ भी क्यों नमिल जाए पर बचपन के सुनहले दिन वापस नहीं मिलते , वह भोलापन और बेफ़िक्री वापस नहीं आती ; क्योंकि उम्र के साथ हम अपनी सहजता खो चुके होते हैं। जिसके साथ सहजता होती है , उस पर लोग आज के हालात में भरोसा ही कहाँ करते हैं हरदीप जी । यही कारण है कि न आटा गिरता है और न कोई चींटी को तलाशता है । सहजता जहाँ है , वही सकारात्मक जीवन की बेल पनपती है ।
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

निर्मला कपिला said...

मै तो अब भी बच्चों को यही कहती हूँ सच मे बचपन की कहावतें और कहानियाँ कितनी अच्छी थी। सुन्दर रचना। बधाई।

Dilbag Virk said...

ati sunder