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Sunday, June 26, 2011

गीटे खेलना

ढली दुपहिर आथण वेले 
निक्कीयाँ कुड़ियाँ घर दे विहड़े 
आन जद जुड़ीयाँ खेडण रुझीयाँ
सब तों जियादा खेड़ पियारी
खेडण गीटे वारो -वारी 
गीटे चुकदीयाँ इक-इक करके 
इयों लगदा जिवें चुगदीयाँ  रिश्ते 
फेर ..........
इक हथ नाल बणाके घर 
इक -इक गीटा 
बोच -बोचके करदीयाँ  अन्दर 
इयों लगदा जिवें .......
'कठे करके सारे रिश्ते 
ओह सिखदीयाँ हुण बनणा घर 
इक हथ नाल सारे गीटे 
बोच-बोचके जिहड़ी बुच लैंदी 
वड्डे -छोटे सारे रिश्ते 
नाले आवदे हाण दे रिश्ते 
आपणी झोली पाऊणा सिख लैंदी !
हरदीप 

9 comments:

udaya veer singh said...

ਐਵੀਂ ਜਜਬਾਤਾਂ ,ਬਚ੍ਪਨਾਂ ਦੀ ਸੋਣੀ ਯਾਦਾਂ ਕਿਵੇਂ ਸ਼ਾਮ ਕੇ ਰਾਖਿਯਾ ..
ਚੰਗਾ ਲਾਗਿਯਾ ਖੇਡਾ ਦਾ ਉਪਰਾਲਾ ਹੋਰ ਸਲੀਕਾ ,ਕਵਿਤਾ ਵਿਚੋਂ ..
ਮੁਬਾਰਕਾ ਜੀ /

सहज साहित्य said...

गिट्टे के खेल के माध्यम से जीवन अनुभवों को सीखने की सहज कला की आपने कविता में जो व्याख्या की है , वह सराहनीय है ।

मनोज कुमार said...

अच्छा लगा।

kshama said...

Maza aa gaya padhke!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

मैंने भी बचपन में खेले हैं, पर मैं तो हमेशा अनाडी ही रहा इस मामले में।

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विलुप्‍त हो जाएगा इंसान?
ब्‍लॉग-मैन हैं पाबला जी...

Udan Tashtari said...

जितना समझ पाये भाव अच्छे अच्छे लगे.

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बचपन के दिन याद आ गये....बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.

मनोज भारती said...

ये गिट्टों का खेल भी आज शहरों से गायब हो गया है ...विकास के साथ-साथ बहुत सी चीजें पीछे छूट जाती हैं...जैसे बचपन के साथ सब खिलौने छूट जाते हैं...लेकिन इन खेल-खिलौने ने हमें जिंदगी की पाठशाला में बहुत कुछ सिखाया होता है।

आज के बच्चे गिट्टों से न खेल कर कंप्यूटर गेम्स खेल रहे हैं ...

आप अपनी रचनाओं में हमें हमारे बचपन के दिनों को याद करवा देती हैं साथ ही हमारी सासंकृतिक पहचान से भी जोड़े रखती हैं । ...आभार

Bhushan said...

मैंने भी बचपन में सहेलियों के साथ मिल कर गीटे खेले हैं. इसमें एक टेक्निकल टर्म होती थी- घर पुग्गणा. घर पुग्गने पर बड़ी खुशी होती थी. इसे ही आपने रिश्ते इकट्ठे करना कहा है.
मज़ा आ गया.