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Thursday, June 30, 2011

रब की चिता


बारिश की बूँदों जैसे 
ट्प ट्प अश्रु 
जब पलकों से टपके 
मैंने दिल से पूछा
क्या हुआ ...??
बीता हुआ कोई पल 
है याद आया 
दिल धड़का 
कुछ बोला न 
हमेशा की तरह 
चुप के आँचल में 
छुपाकर दर्द अपना 
बस आँखों से 
बहता चला गया 
मैं समझ गई
कि आज फिर ....
कोई कोख सूली 
चढ़ाई  गई है 
किसी कोख में 
कब्र बेटी की
फिर बनाई गई है 
चिता रब की 
आज फिर जलाई गई है !
हरदीप 


8 comments:

सहज साहित्य said...

हरदीप जी ,हमारे समाज के नकारात्मक सोच को उजागर करने वाली बहुत मार्मिक कविता है । क्रूर व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य तो पशुओं से भी गया बीता है । पशु यह भेदभाव नहीं करते ।

रश्मि प्रभा... said...

waah , phir chita rab kee ! bahut bhawpurn abhivyakti

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ज्वलंत मुद्दे पर मार्मिक प्रस्तुति

udaya veer singh said...

दर्द महसूस करने वाले को दर्द होता है ,बेदर्दों से क्या सवाल करना ,नासमझ जिस कोख से पैदा हुए उसके ही हत्यारे बनते हैं , और उसमें शामिल हैं कोख भी ,जो झूठी प्रतिष्ठा का संवरण करती है / ....... बहुत ही सामाजिक सार्थक जाग्रत सोच ,शुक्रिया जी /

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बेटियों के जन्म से परहेज करने वालों पर करारा प्रहार....
इस समसामयिक कविता हेतु हार्दिक धन्यवाद एवं आभार...

Bhushan said...

कन्या भ्रूण हत्या पर इन दिनों पढ़ी कविताओं में यह सबसे सशक्त रचना है. आभार.

Rakesh Kumar said...

हृदयस्पर्शी,मार्मिक.
हरदीप जी कमाल की अभिव्यक्ति है आपकी.
आपके भावुक हृदय को सादर नमन.

पूनम श्रीवास्तव said...

bahut hi kadvi sachchai liye dil ko chooti hai aapki rachna --bahut bahut badhai