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Tuesday, July 5, 2011

गाँव वो मेरा-हाइकु गीत


1.
गाँव जाकर
मुझे मिला ही नहीं
गाँव जो मेरा !
2.
बहुत ढूंढा
दिल में जो बसता
वो गाँव मेरा !

3.
न जाने कहाँ
मुर्गे की बांग वाला
गुम सवेरा!
4.
नीम के झूले
ठण्डी - छैंया फुदके
पाखी का डेरा!
5.
बूँद -  बूँद को           
तरसा अब प्यासा
मटका तेरा !
6.
कहीं न मिलें
पीपल नीचे बाबा
जमाते डेरा !
7.
दादी पूछती
कहाँ फैंक दिया रे
चरखा मेरा!
8.
कुँए का पानी 
शक्कर से भी मीठा 
गाँव वो  मेरा !

9.
कली करने
पीतल के बर्तन
आए ठठेरा !
10.
दाना चुगती                              
फिर चीं चीं चिड़िया
करे बसेरा
11.

सूना आँगन
चाहता फिर यहाँ 
डाले तू फेरा ! 
.
12.
लौटकर आ
पुकारे तुझे अब
गाँव वो तेरा !

हरदीप 

13 comments:

सहज साहित्य said...

"गांव वो मेरा" जड़ों की तलाश में लिखा गया मार्मिक हाइकु है । हरदीप जी ने गाँव को जीवन्त कर दिया है। मानवीकरण , चित्रात्मकता , व्याकुलता इस हाइकु गीत की आत्मा है । चित्र -संयोजन से इसे और अधिक प्रभावी बना दिया है । जो व्यक्ति अपने गांव-गली से प्यार नहीं कर सकता , वह किसी से प्यार नहीं कर सकता । विभिन्न उपादानों से गाँव सजीव था , पुन: उसी की तलाश जारी है । बहुत बधाई!

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

गांव का सजीव चित्रण
गांव बदल रहे शहर में

आभार

Udan Tashtari said...

भावपूर्ण हाईकु!!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

गाँव को सजीव करती अच्छी हाईकू रचनाएँ

Bhushan said...

गाँव में जब हम दस साल बाद लौटते हैं तो हमारी गाँव की छवि सबसे पहले टूटती है.
सुंदर हाइकुओं से सजी रचना.

Kailash C Sharma said...

बहुत खूब ! गांव का बहुत सजीव चित्रण..

डॉ टी एस दराल said...

सभी हाइकु बहुत सुन्दर हैं ।

Babli said...

बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण हाइकु! गाँव के बारे में आपने बड़े ही सुन्दरता से शब्दों में पिरोया है! उम्दा प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

Rakesh Kumar said...

मन मग्न हो गया आपकी सरल शब्दों में व्यक्त
भावुक और मार्मिक प्रस्तुति से.
आपकी काव्य प्रतिभा ने जादू भर दिया है सरल शब्दों में भी .
बहुत बहुत आभार.
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है.

Dr (Miss) Sharad Singh said...

गुम होते गांवों पर बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी हाइकूज़ ! हार्दिक शुभकामनायें !

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सभी हाइकु बहुत सुंदर ....

ऋता शेखर मधु said...

आदरणीया हरदीप सन्धु जी
सर्वप्रथम हिन्दी हाइकु की सफ़लता के लिए
बधाई स्वीकार करें|मैंने आपके ब्लाग की सैर की|
मैं मन्त्रमुग्ध सी एक स्थान से दूसरे स्थान की सैर
करती चली गई और मुझे वक्त का पता ही नही चला|
मैंने आपका गाँव और नानीघर देखा,हिमाँशु सर का
स्कूल देखा|बहुत जीवंत चित्रण था|
खुशिया चाचा के स्कूल गई और कनाडा यात्रा का वर्णन
पढ़ा|हँसते हँसते लोटपोट हो गई|
अपने प्रशंसकों की लिस्ट में मुझे भी शामिल कर लीजिए|
मेरा चोका आपको पसन्द आया इसके लिए धन्यवाद|
शुभकामनाऔं सहित,
ऋता शेखर मधु

mahendra srivastava said...

वाह बहुत बढिया