Followers- From 17 May 2010.....'til today

Wednesday, August 3, 2011

अंगारों की तपन[मुत्तक ]



















जानते हैं वो इन अंगारों की तपन

झेलतें रहे जो इनको यूँ ही निश-दिन

अंगारों को ही मानते सदा जीवन 

तपे बिन सोना कभी बने नहीं कुंदन !

हरदीप  

15 comments:

Udan Tashtari said...

बढ़िया...

रविकर said...

बहुत सुन्दर ||
बधाई |

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत प्रस्तुति

kshama said...

Kya baat hai!

सहज साहित्य said...

भुक्तभोगी ही पीड़ा को जान सकता है । इस हाइकु में बहुत ही गहरी बात की गई है।

ਸੁਰਜੀਤ said...

Very good Hardeep ji.

ktheLeo said...

वाह!

डॉ टी एस दराल said...

मुक्तक लिखने का प्रयास अच्छा है ।

Rakesh Kumar said...

हरदीप जी बहुत अच्छा प्रयास है आपका.
यह पंक्ति बहुत अच्छी लगी
'तपे बिन सोना कभी बने नहीं कुंदन !'

आभार.

Babli said...

अद्भुत सुन्दर पंक्तियाँ! लाजवाब प्रस्तुती!

Dilbag Virk said...

सुंदर मुक्तक

परिकल्पना ब्लॉग पर शामिल आपकी कविताओं को आज के चर्चा मंच पर लिया गया है
कृपया पधारें
चर्चा मंच

Bhushan said...

सुंदर रचना.

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर...बधाई

mahendra srivastava said...

क्या कहने,
बहुत सुंदर
बधाई

मेरा साहित्य said...

sahi hai aag me jal kar hi sona nikharta hai
badhai
rachana