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Sunday, August 28, 2011

त्रिंजण

त्रिंजण शब्द पंजाब की लोक संस्कृति  से जुड़ा  शब्द है | आज सेतीन-चार दशक पहले अविवाहित लड़कियाँ मिलकर चर्खा काता करती थीं | सामूहिक  रूप से चर्खा कातने वाली लड़कियों की टोली को त्रिंजण कहा जाता था  |चर्खा कातने के साथ-साथ …गीत गाकर अपने मन के भाव व्यक्त करती थीं|

 यह संसार भी एक त्रिंजण ही है, जहाँ हम सब मिलकर एक दूसरे के सहयोग से अपना जीवन व्यतीत करने के लिए आए हैं |  हमारा मन भावों का त्रिंजण  है जो दिन-रात भावों के रेशे काता करता है और हम अपने अनुभवों को शब्दों की माला में पिरोकर अभिव्यक्त करते हैं |

   आज मैं इसी जग त्रिंजण तथा मन त्रिंजण की बात अपने हाइकुओं में कहने जा रही हूँ | आशा है आपको यह प्रयास अच्छा लगेगा |

* कुल मिलाकर 50 हाइकु हैं जिनमें से 30 यहाँ हैं और 20 हिंदी हाइकु ब्लॉग पर आप पढ़ सकते हैं
"मन त्रिंजण"

1
ये मुलाकातें
मन त्रिंजण मेले
संदली रातें 
2
त्रिंजण मन
लगा भावों का मेला
नहीं अकेला
3
त्रिंजण मन
जीवन का झमेला
झेले अकेला
4
हृदय आँच
अनुभव पगते
मन त्रिंजण
5
बुझी प्यास
प्रेम मटका भरा 
मन त्रिंजण
6
गुनगुनाए
ये मधुर संगीत 
मन त्रिंजण
7
गूँजा जो राग
मन मयूर नाचा
मन त्रिंजण
8
मन त्रिंजण 
सहमी सहमी सी 
उदासी छाई 
9
मन त्रिंजण 
तुम्हारे कदमों के 
ढूँढे निशान 
10
मन त्रिंजण 
बजी यूँ शहनाई 
गूँजे तराने 
11
मन त्रिंजण 
लो तेरी याद आई
हँसी तन्हाई 
12
मन त्रिंजण 
सपनों की झालर 
बैठा लगाए 
13
मन त्रिंजण 
गीत दें यूँ दस्तक
जैसे तू आया 
14
मन त्रिंजण 
सुने धुन पुरानी
तेरी आहट 
15
 मन त्रिंजण 
रखा  प्यार जुगनू 
चिराग जले 
16
मन त्रिंजण 
पढ़ना हो  अगर 
चाहिए दिल 
17
मन त्रिंजण 
पत्थर में ढूँढ़ता 
प्यारा -सा दिल
18 
मन त्रिंजण
मेरी साँसों से जुड़े 
तेरी यूँ साँसे 
19
मन त्रिंजण 
छुपकर आँखों  से 
बहते आँसू 
२० मन त्रिंजण 
बिन अल्फ़ाज के भी 
पढ़ता श्वास  

21 
मन त्रिंजण 
पिंघले यूँ सपने
टीसते रहे 
22
मन त्रिंजण
उतरी कहकशाँ
तेरी छुअन
23
मन त्रिंजण 
बिन बोले पढ़ ले 
हर जज़्बात


"जग त्रिंजण "


24 जग त्रिंजण 
तिनके  तिनके  से 
बनाया घर 
25
जग त्रिंजण 
ये बाग़ वो जिसका 
रब है माली 
26
जग त्रिंजण
अनजान नगरी 
कहाँ ठिकाना 
27
जग त्रिंजण  

गिनती के हैं साँस  
बेगाना धन 

28
जग त्रिंजण 
लगा आशा का पौधा 
मिलेगा फल 
29
जग त्रिंजण
अनकहा सा लम्हा 
बीतता जाए 
30
जग त्रिंजण 
उजली चादर से
ढकता दुःख

डॉ . हरदीप कौर सन्धु 

16 comments:

Rakesh Kumar said...

पहले भी आपने अपनी रचना में 'त्रिंजण' शब्द का प्रयोग किया था.तब कम समझ आया था.

आज आपने इसको समझाया ही नहीं वरन सुन्दर काव्यात्मक प्रयोग के द्वारा इसे दिल में ही उतार दिया है.

आपकी सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.

मेरे ब्लॉग पर आपका इंतजार है.

सहज साहित्य said...

सारे हाइकु पढ़कर मैं तो एक अव्यक्त रस से सराबोर हो गया हूँ । यह हाइकु की शक्ति तो है ही हरदीप जी की गहन अनुभूति , गहन मन्थन का प्रिपाक है । बहुत बधाई !!! हाइकु का यह उन्नयन साहित्य को नई गरिमा प्रदान करेगा ।

kshama said...

Behad achha likha hai....lekin ek hee baar me zyada ho gaya....waise maine inhen baar baar padha!

Bhushan said...

30 सुंदर छवियाँ देते हाइकु. बढ़िया.

सुभाष नीरव said...

हरजीत जी,
त्रिंजण के बहाने आपने बहुत खूबसूरत हाइकु हिन्दी साहित्य की झोली में डाल दिये हैं। आपकी रचनाओं में जो सबसे बड़ी बात मुझे नज़र आती है, वह यह कि आप अपनी रचनाओं में पंजाबी लोक जीवन और उससे जुड़े शब्दों-सन्दर्भों को जीवन्तता प्रदान करती हैं…पंजाबी लोक जीवन की खुशबू वहाँ सहज ही हमें मिल जाती है… बहुत बहुत बधाइ !

Dilbag Virk said...

ek shabd par haaiku ki lmbi shrinkhla

SBHI EK SE BDHKAR EK

Udan Tashtari said...

त्रिंजण naya shabd maloom pada...bahut umda haiku hain...jeevan jine ka salika. badhai..

KAHI UNKAHI said...

बहुत प्यारे हाइकु हैं...शब्द नहीं हैं मेरे पास इसकी तारीफ़ के लिए...बहुत बधाई...।

प्रियंका

Devi Nangrani said...

त्रिंजण मन
लगा भावों का मेला
नहीं अकेला

त्रिंजण मन
जीवन का झमेला
झेले अकेला
Hardeep ji
Meri Badhayi v shubhkamanyein kabool karein is sunder त्रिंजण shabd ko abhivyakt kiya hai.
यह संसार भी एक त्रिंजण ही है, जहाँ हम सब मिलकर एक दूसरे के सहयोग से अपना जीवन व्यतीत करने के लिए आए हैं |
Sach mein aapke har prayas se hamara soch ka vistaar ek naya kshitij dhoondhta hai

ऋता शेखर 'मधु' said...

sabhi haiku bhut suljhe hue aur pyare hain.'trinjan ek naya shabd hai mere liye,iska arth janne ke baad iski vyapakta badh gai.aap sab kucch dil se likhti hain isliye hamare dilon ko bhi bha jati hai...badhai..

Dr.Bhawna said...

Bahut ache lage nye andaj ke haiku'trinjan'badhai ...

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण हायकूज़....

Rachana said...

'त्रिंजण shabd ke bare me aapne jo likha hai bahut sunder hai aapne uske mayane bhi bahut sunder tarike se baten hain .usko padhne ke bad jab aapke haiku padhe aanand aagaya
badhai
rachana

udaya veer singh said...

हृदय से संघात करते मन त्रिंजण , ममस्पर्शी एवं हृदय ग्राही हैं , बड़े मनोयोग से लिखा आपका काव्य बिन नाद मुखरित हो रहा है ........चिंतन सहित सृजन ,सम्मान योग्य है /
shubhkamnayen

डॉ. हरदीप कौर सन्धु said...

मेरे नए प्रयास को आपका स्नेह मिला ….हर्षित हूँ
मेरे त्रिंजण हाइकु पर अपने विचारों से अवगत कराने के लिए आभार | आपके आत्मीय विचारों ने मेरा उत्साह बढ़ाया | इसी तरह स्नेह बनाएं रखें।
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार।

bhootnath said...

kuchh ujala-ujala-sa ho gaya mere bheetar.....ab kuchh kah paane men asamarth hun....