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Thursday, September 8, 2011

मेरा गाँव




6 comments:

Bhushan said...

बढिया चित्रों के साथ बढ़िया हाइकु अधिक संप्रेषणशील बन पड़े हैं. खूब.

सहज साहित्य said...

हरदीप जी काव्य में ग्राम्य जीवन छूटता जा रहा था , आपने उस जीवन को इन हाइगा में साकार कर दिया है, एकदम रंगीले चर्खे की तरह और विन्न भावों का सूत कातकर मान मोह लिया है । हार्दिक बधाई !!

Dr (Miss) Sharad Singh said...

ग्रामीण औरत की ज़िन्दगी को बखूबी पिरोया है अपनी कविताओं में...बधाई.

दीनदयाल शर्मा said...

ग्रामीण परिवेश की जीवंत रचनाएँ...मन को छु गई...डॉ. हरदीप जी , आपको हार्दिक बधाई..

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH said...

ਖੁਸ਼ਬੂ ਪਿੰਡ ਦੀ!
ਆਸ਼ੀਸ਼
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ਮੈੰਗੋ ਸ਼ੇਕ!!!

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') said...

जीवंत चित्र।

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कब तक ढ़ोना है मम्‍मी, यह बस्‍ते का भार?
आओ लल्‍लू, आओ पलल्‍लू, सुनलो नई कहानी।