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Wednesday, September 21, 2011

अकेला रही {चोका }




ओ मेरे मन 
तुझे लगता है तू 
अकेला राही
इस जग त्रिंजण 
मगर ऐसा 
होता नहीं पगले 
कोई न कोई 
बैठा मन त्रिंजण 
बिन बोले ही 
पढ़ता है तुझको 
दिल तरंगें 
ज्यों उसके भावों की 
आ मिलती हैं 
तेरे ह्रदय उठीं 
शोर मचाती 
ख़ामोशी की लहरें 
खुद -ब-खुद 
चेहरे पे बिखरे 
सुकून की चाँदनी!
  
हरदीप 

10 comments:

सहज साहित्य said...

ओ मेरे मन -चोका अन्य रचनाओं की तरह कसा हुआ और सहृदय पाठक को भावविभोर करनेवाला है । डॉ हरदीप कौर सन्धु जी आपने बहुत कम समय में बहुत सार्थक रचनाएँ हिन्दी -जगत की दी हैं ।

डॉ. हरदीप कौर सन्धु said...

आदरणीय रामेश्वर जी ,
हर्षित हूँ आपको मेरा यह प्रयास अच्छा लगा ! मेरी रचना [चोका] पर अपने विचारों से अवगत कराने के लिए आभार | आपके आत्मीय विचारों ने मेरा उत्साह बढ़ाया |
इसी तरह स्नेह बनाएं रखें।
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार।

रविकर said...

खुबसूरत ||
बधाई ||

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') said...

सार्थक चिंतन वाली रचना।

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मायावी मामा?
रूमानी जज्‍बों का सागर है प्रतिभा की दुनिया।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह! क्या बात है

Bhushan said...

'त्रिंजण' की छवि के साथ ये पंक्तियाँ काव्य की खूबसूरत रचना करती हैं. बहुत खूब.

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति....मन को छू लेने वाली.

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर...

राजीव थेपड़ा said...

पढ़कर मन को कुछ चैन-सा मिला...क्यों ना मिलता....अपने लिखा ही जो ऐसा है...!!

Udan Tashtari said...

वाह!! ये भी खूब हाईकु निकाले...अच्छा लगा..