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Sunday, October 30, 2011

हाइकु ( उदन्ती मासिक)


हिन्दी हाइकु को जिन पत्रिकाओं ने ऊँचाई प्रदान की है, उनमें वीणा , उदन्ती , गर्भनाल ,हिन्दी गौरव , आरोह -अवरोह ,अप्रतिम ,लोक गंगा प्रमुख हैं । उदन्ती में डॉ रत्ना वर्मा जी जनवरी -11से हाइकु का प्रकाशन कर रही है । इन सबका आभार प्रकट करते हुए डॉ हरदीप सन्धु के उदन्ती के अक्तुबर अंक में प्रकाशित हाइकु दिए जा रहे है ।इन्हें उदन्ती के इस लिंक पर भी पढ़ा जा सकता है ।







Monday, October 24, 2011

दीवाली [चोका]*


आई दीवाली 
जगमग रौशन
घर आँगन 
जब मिट्टी का दीया 
स्नेह बाती से 
परोपकार तेल 
डाल जलाया 
दीए को माना 
जीवन का आदर्श 
शुभ संकल्प
कभी न माँगा 
अंधकार हमने 
दिव्य ज्योति से 
असंख्य दीप जले 
भीतर छाया 
अज्ञान का तमस 
तेज पुंज से 
चूर -चूर हो जाए 
बुहारो तुम 
ज्यों कर्म का कचरा 
जमा जो हुआ 
चेतना के आँगन 
मोह दीप की 
जला अखंड ज्योति 
कौन बुझाए 
आँधियों में भी जले 
दिव्य प्रकाश मिले !

हरदीप 
*चोका जापानी काव्य शैली की लम्बी कविता है जिस में 5 +7 5 +7 +5  का क्रम होता है और अंत में ताँका [ 5 +7 +5 +7 +7 ] जोड़ दिया जाता है |

Saturday, October 22, 2011

"गुम हुई नदिया "{चोका}

*चोका जापानी काव्य शैली की लम्बी कविता है जिस में 5 +7 5 +7 +5  का क्रम होता है और अंत में ताँका [ 5 +7 +5 +7 +7 ] जोड़ दिया जाता है |
रेगिस्तान  में 
गुम हुई नदिया 
सूख जाती है 
चीखती- पुकारती 
चाहती मुक्ति 
 मंजिल न ठिकाना 
न कोई रास्ता 
 मिले नहीं सागर 
गुम जब हो 
सागर में नदिया 
मिटा अस्तित्व 
गुम होते किनारे 
मिटे नाम भी 
छोटी सी ये नदिया 
बड़ी हो जाए 
सीमित से अब ये 
हो सीमाहीन
ऐसे गुम हो जाना 

ब कुछ पाना है


हरदीप 



Saturday, October 8, 2011

मिले किनारे {ताँका -चोका संग्रह}


                     [ पूरा पढ़ने के लिए चित्र पर क्लिक कीजिए ]     

                                      मिले किनारे 

                         ताँका - चोका संग्रह 

रामेश्वर काम्बोज' हिमांशु ' / डॉ.हरदीप कौर सन्धु 
                       संस्करण - 2011
                                                     

काम्बोज जी से व्यक्तिगत परिचय बरेली आने पर आज से 24 वर्ष पूर्व हुआ | इनकी रचनाओं  से मैं पहले से ही परिचित था | लघुकथा , कविता ,व्यंग्य , समीक्षा , लेख आदि  सभी में इनकी पकड़ सदा समाज की नब्ज़  पर रही है | सामाजिक सरोकार कभी भी इनकी रचनाओं से ओझल नहीं हुए |
         हाइकु 1986 से लिख रहे थे , लेकिन उस समय जिस तरह की रचनाएँ आ रही थीं , ये उनसे संतुष्ट नहीं थे | ' मिले किनारे ' संग्रह के ताँका और चोका रचनाओं में भी इनके वही सामाजिक सरोकार , वही अनुभूति की ईमानदारी , वही बेबाक अभिव्यक्ति दिखाई देती है , जो इनके जीवन का भी अटूट हिस्सा रही है |मैंने इनको शिक्षक एवं प्राचार्य के रूप में भी निकटता से देखा है |ये जीवन और साहित्य में एक ही जैसी क्षमता से कार्य करते नज़र आते हैं |इनके चाहे ताँका  हों या चोका , वे व्यक्ति और समाज के दुःख -सुख के साक्षी ही नहीं , भागीदार बने दिखाई देते हैं| पर-दुखकातरता की इनकी विशेषता एक ओर इनकी भावभूमि है तो भाषा पर मज़बूत पकड़ , सार्थक शब्द -चयन  में इनकी परिपक्वता और क्षमता भाषा -संस्कार के रूप में हर पंक्ति में दृष्टिगत होती है |पाठक इनकी रचनाओं को पढ़कर इन्हें जान सकता है ,इसमें दो राय नहीं है |
                                      ------- सुकेश साहनी

यह सुखद है कि हिन्दी जगत में ‘हाइकु’ के पूर्णत: प्रतिष्ठित एवं समादृत होने के पश्चात् अब जापान की अन्य काव्य शैलियों-ताँका ,चोका, हाइगाकी ओर रुझान बढ़ रहा है ।
डॉ हरदीप कौर सन्धु एक ख्यात हाइकुकार हैं और नवीन प्रयोगों में रुचि रखती हैं।प्रस्तुत संग्रह ‘मिले किनारे’ में उनके एक सौ ताँका और ग्यारह चोका  कविताएँ संगृहीत हैं । ‘ताँका’ में उन्होंने ग्राम्य जीवन और लोक संस्कृति के ऐसे अनूठे चित्र उकेरे हैं,जिन्होंने उनकी कविता को एक नई ताज़गी प्रदान की है । आंचलिक शब्दों के प्रयोग ने कविता में अपूर्व माधुर्य एवं विश्वसनीयता भर दी है । उनकी रचनाओं में रिश्तों की पावन महक-विशेष रूप से माँ के प्रति लगाव  दर्शनीय है! डॉ सन्धु के ताँका आर्जव , माधुर्य एवं लालित्य से भरपूर हैं।
           चोका कविताओं में तारत्म्य और नैरन्तर्य  बना रहता है;जो चोका का विशेष गुण है, साथ ही आन्तरिक लय भी है । ‘गुलमोहर’ , ‘वसन्त ॠतु’, ‘तेरी ख़्वाहिश’ ,’रब की चिता’, ‘अपना घर’ और  ‘रब जैसी माँ’ शीर्षक चोका  कविताएँ विशेष मोहक बन पड़ी हैं ।
 -डॉ0 सुधा गुप्ता
पवित्रा एकादशी 9 अगस्त ,2011

Tuesday, October 4, 2011

रब का घर


छोटी सी छपरी छह -सात जने

जिसको निक्कू घर है कहता

चले आँधियाँ छत उड़ जाती

रब जाने वह क्या-क्या सहता

फटे -पुराने पहनकर कपड़े

भूख-दंश से लड़ता रहता

पेट कमीना भरने की खातिर

इधर-उधर भटकता रहता

न जाने सुख कौन -सी चिड़िया

दुःख-पीड़ा को में दहता रहता

निक्कू पकड़कर माँ की उँगली

कूड़ा-करकट सदा बीनता

रुक गया एक दिन चलता-चलता

बिना-झपके मन्दिर को देखता

‘माँ इत्ता बला सुन्दर-सुन्दर’

‘तिसका घल है ?’ निक्कू पूछता

बेटा इस बड़े घर के अन्दर

हमारा सबका ‘वो रब’ रहता

‘माँ बता मुझे औल तौन-तौन’

‘उस लब के साथ वहाँ लहता’

और कोई नहीं’ पुत्तर मेरे

रब तो वहाँ अकेला ही रहता

माँ तल फिर वहाँ रहें हम

लब हमें तुछ नहीं कहता !

हरदीप 

Saturday, October 1, 2011

हरदीप सन्धु के हाइकु

 गर्भनाल  हिन्दीं की नेट   पत्रिका  अपने विश्वस्तरीय   साहित्यिक सफर के पांच वर्ष पूरे करने वाली है .अब यह पत्रिका मुद्रित रूप में भी उपलब्ध है .इस पत्रिका ने भारतीय और प्रवासी साहित्यकारों को तो जोडा   ही है ,साथ ही साथ हिन्दी की नव्य विधाओं -हाइकु और लघुकथा को भी प्रोत्साहित किया है.चंदनमन( हाइकु -संग्रह -सम्पादक:रामेश्वर काम्बोज  व डा भावना ) की समीक्षा व काम्बोज जी के हाइकु पूर्व अंकों में दिए  जा चुके हैं .  इसके अक्तूबर  अंक में प्रकाशित हरदीप सन्धु के नए अंदाज़ के  हाइकु पढने  के लिए चित्र पर क्लिक कीजिएगा.