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Tuesday, October 4, 2011

रब का घर


छोटी सी छपरी छह -सात जने

जिसको निक्कू घर है कहता

चले आँधियाँ छत उड़ जाती

रब जाने वह क्या-क्या सहता

फटे -पुराने पहनकर कपड़े

भूख-दंश से लड़ता रहता

पेट कमीना भरने की खातिर

इधर-उधर भटकता रहता

न जाने सुख कौन -सी चिड़िया

दुःख-पीड़ा को में दहता रहता

निक्कू पकड़कर माँ की उँगली

कूड़ा-करकट सदा बीनता

रुक गया एक दिन चलता-चलता

बिना-झपके मन्दिर को देखता

‘माँ इत्ता बला सुन्दर-सुन्दर’

‘तिसका घल है ?’ निक्कू पूछता

बेटा इस बड़े घर के अन्दर

हमारा सबका ‘वो रब’ रहता

‘माँ बता मुझे औल तौन-तौन’

‘उस लब के साथ वहाँ लहता’

और कोई नहीं’ पुत्तर मेरे

रब तो वहाँ अकेला ही रहता

माँ तल फिर वहाँ रहें हम

लब हमें तुछ नहीं कहता !

हरदीप 

12 comments:

वन्दना said...

उफ़ बेहद मार्मिक चित्रण किया है।

रविकर said...

माँ इत्ता बला सुन्दर-सुन्दर’
‘तिसका घल है ?’ निक्कू पूछता


माँ तल फिर वहाँ रहें हम
लब हमें तुछ नहीं कहता !

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||

बहुत बहुत बधाई ||

सुरिन्दर रत्ती said...

hadeep ji satsri aakal
हरदीप जी, दिल को छूने वाले भाव हैं इस कविता के काश निक्कू जैसा भोलापन हमें मिल जाये तो वो दिन दूर नहीं रब हमें दर्शन ज़रूर देगा -
बधाई - सुरिन्दर रत्ती - मुंबई
माँ तल फिर वहाँ रहें हम
लब हमें तुछ नहीं कहता !

डॉ टी एस दराल said...

बाल मन की स्वच्छता।
बहुत सुन्दर रचना ।

सहज साहित्य said...

सर्वहारा वर्ग का बहुत मार्मिक और यथार्थ चित्रण किया गया है। एक एक शब्द मन को छू गया । नये तेवर वाली कविता !निदा फ़ाज़ली ने भी कुछ इसी तरह कहा है-
ऊँची मस्ज़िद देखकर बच्चा हुआ हैरान
अल्लाह तेरे रहने को इतना बड़ा मकान

रश्मि प्रभा... said...

माँ बता मुझे औल तौन-तौन’

‘उस लब के साथ वहाँ लहता’

और कोई नहीं’ पुत्तर मेरे

रब तो वहाँ अकेला ही रहता

माँ तल फिर वहाँ रहें हम

लब हमें तुछ नहीं कहता !

bahut pyaari rachna

मधुर गुंजन said...

dil ko choo jaane vali kavitaaen...

मनोज भारती said...

हमने परमात्मा के मंदिर तो बना लिया लेकिन शायद उसमें से उसके हृदय को अलग कर दिया ...बाल मन ने बहुत सुंदर बात कह दी है...हमेशा की तरह बहुत सुंदर कविता ...

Udan Tashtari said...

बहुत गहरे भाव...जबरदस्त रचना.

Patali-The-Village said...

दिल को छूने वाले भाव हैं इस कविता के|
आप को दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएँ|

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) said...

bahut-bahut-bahut sundar....hardeep ji....

avanti singh said...

अंतर्मन को झकझोरती रचना ,बहुत ही बेहतरीन ......