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Saturday, October 8, 2011

मिले किनारे {ताँका -चोका संग्रह}


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                                      मिले किनारे 

                         ताँका - चोका संग्रह 

रामेश्वर काम्बोज' हिमांशु ' / डॉ.हरदीप कौर सन्धु 
                       संस्करण - 2011
                                                     

काम्बोज जी से व्यक्तिगत परिचय बरेली आने पर आज से 24 वर्ष पूर्व हुआ | इनकी रचनाओं  से मैं पहले से ही परिचित था | लघुकथा , कविता ,व्यंग्य , समीक्षा , लेख आदि  सभी में इनकी पकड़ सदा समाज की नब्ज़  पर रही है | सामाजिक सरोकार कभी भी इनकी रचनाओं से ओझल नहीं हुए |
         हाइकु 1986 से लिख रहे थे , लेकिन उस समय जिस तरह की रचनाएँ आ रही थीं , ये उनसे संतुष्ट नहीं थे | ' मिले किनारे ' संग्रह के ताँका और चोका रचनाओं में भी इनके वही सामाजिक सरोकार , वही अनुभूति की ईमानदारी , वही बेबाक अभिव्यक्ति दिखाई देती है , जो इनके जीवन का भी अटूट हिस्सा रही है |मैंने इनको शिक्षक एवं प्राचार्य के रूप में भी निकटता से देखा है |ये जीवन और साहित्य में एक ही जैसी क्षमता से कार्य करते नज़र आते हैं |इनके चाहे ताँका  हों या चोका , वे व्यक्ति और समाज के दुःख -सुख के साक्षी ही नहीं , भागीदार बने दिखाई देते हैं| पर-दुखकातरता की इनकी विशेषता एक ओर इनकी भावभूमि है तो भाषा पर मज़बूत पकड़ , सार्थक शब्द -चयन  में इनकी परिपक्वता और क्षमता भाषा -संस्कार के रूप में हर पंक्ति में दृष्टिगत होती है |पाठक इनकी रचनाओं को पढ़कर इन्हें जान सकता है ,इसमें दो राय नहीं है |
                                      ------- सुकेश साहनी

यह सुखद है कि हिन्दी जगत में ‘हाइकु’ के पूर्णत: प्रतिष्ठित एवं समादृत होने के पश्चात् अब जापान की अन्य काव्य शैलियों-ताँका ,चोका, हाइगाकी ओर रुझान बढ़ रहा है ।
डॉ हरदीप कौर सन्धु एक ख्यात हाइकुकार हैं और नवीन प्रयोगों में रुचि रखती हैं।प्रस्तुत संग्रह ‘मिले किनारे’ में उनके एक सौ ताँका और ग्यारह चोका  कविताएँ संगृहीत हैं । ‘ताँका’ में उन्होंने ग्राम्य जीवन और लोक संस्कृति के ऐसे अनूठे चित्र उकेरे हैं,जिन्होंने उनकी कविता को एक नई ताज़गी प्रदान की है । आंचलिक शब्दों के प्रयोग ने कविता में अपूर्व माधुर्य एवं विश्वसनीयता भर दी है । उनकी रचनाओं में रिश्तों की पावन महक-विशेष रूप से माँ के प्रति लगाव  दर्शनीय है! डॉ सन्धु के ताँका आर्जव , माधुर्य एवं लालित्य से भरपूर हैं।
           चोका कविताओं में तारत्म्य और नैरन्तर्य  बना रहता है;जो चोका का विशेष गुण है, साथ ही आन्तरिक लय भी है । ‘गुलमोहर’ , ‘वसन्त ॠतु’, ‘तेरी ख़्वाहिश’ ,’रब की चिता’, ‘अपना घर’ और  ‘रब जैसी माँ’ शीर्षक चोका  कविताएँ विशेष मोहक बन पड़ी हैं ।
 -डॉ0 सुधा गुप्ता
पवित्रा एकादशी 9 अगस्त ,2011

4 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत अच्छा लगा पढ़कर....हिमांशु जी अभी तो कनाडा में ही हमारे शहर में...जल्द मुलाकात होने को हो....

:)

रविकर said...

बेहतरीन ||

बहुत बहुत बधाई ||

dcgpthravikar.blogspot.com

वर्ज्य नारी स्वर said...

बहुत सुन्दर

मेरा साहित्य said...

bahut bahut badhai aapdono ko
aese hi unnati karte rahiye.
rachana