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Saturday, October 22, 2011

"गुम हुई नदिया "{चोका}

*चोका जापानी काव्य शैली की लम्बी कविता है जिस में 5 +7 5 +7 +5  का क्रम होता है और अंत में ताँका [ 5 +7 +5 +7 +7 ] जोड़ दिया जाता है |
रेगिस्तान  में 
गुम हुई नदिया 
सूख जाती है 
चीखती- पुकारती 
चाहती मुक्ति 
 मंजिल न ठिकाना 
न कोई रास्ता 
 मिले नहीं सागर 
गुम जब हो 
सागर में नदिया 
मिटा अस्तित्व 
गुम होते किनारे 
मिटे नाम भी 
छोटी सी ये नदिया 
बड़ी हो जाए 
सीमित से अब ये 
हो सीमाहीन
ऐसे गुम हो जाना 

ब कुछ पाना है


हरदीप 



10 comments:

Amrita Tanmay said...

अति उत्तम..

Udan Tashtari said...

gahari baat!!

सहज साहित्य said...

नदी के सन्दर्भ में बहुत गहरी अनुभूति लिये है आपकी यह चोका कविता; एकदम नदी की तरह गहरी , तृप्ति प्रदान करने वाली । हर अशान्त मन को ,विकल तन को और पूरे जीवन को । बधाई हरदीप जी 1

Bhushan said...

रेगिस्तान में गुम नदी और सागर में मिली नदी का रूपक बढ़िया बन पड़ा है. सुंदर रचना.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सागर से मिल नदिया बड़ी हो जाना ... इस तरह अस्तित्व खत्म हो कर भी सब कुछ पा लिया जाता है ..सुन्दर भाव

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही खुबसूरत.....

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

आपकी यह सुन्दर प्रस्तुति कल सोमवार दिनांक 24-10-2011 को चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ की भी शोभा बनी है। सूचनार्थ

दिलबाग विर्क said...

छोटी सी ये नदिया
बड़ी हो जाए
सीमित से अब ये
हो सीमाहीन
ऐसे गुम हो जाना
सब कुछ पाना है
वास्तव में गुम हो कर ही पाना संभव है

चन्दन..... said...

वो नदिया हो रेगिस्तान में बहती है,
वो नदिया जो समुन्द्र में नही गिरती है,
वो ठीक उसी तरह है जैसे कोई अपने लक्ष्य को पाने में जीवन भर असफल रहता है|
सुन्दर रचना!
दिवाली कि हार्दिक शुभकामनाएं!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

सचमुच... गहरी बात....

आपको दीप पर्व की सपरिवार सादर शुभकामनाएं