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Saturday, November 5, 2011

मधाणीआं - पंजाबी लोकगीत- (कल और आज )

पंजाबी लोक गीत …..मधाणीआं……बीते होए कल नूं याद करदिआं …….सुरेंदर  कौर दी आवाज़ ‘च



मधाणीआं ……
हाए ओ मेरिआ डाढिआ रबा, किन्ना  जमीआं किन्ना  ने लै जाणीआं होए
छोले…….
बाबुल तेरे महिलां ‘चों, सत रंगीआ  कबूतर बोले
छोई….
बाबुल तेरे महिलां विच्चों  तेरी लाडो परदेसण होई
फीता…..
इहनां सकीआं भाबीआं ने डोला तोर के कच्चा  दुध पीता
फीता……
मेरे आपणे वीरां ने , डोला तोर के अगांह नूं  कीता
कलीआं….
मावां -धीआं मिलण लगीआं, चारे कंधां ने चुबारे दीआं हलीआं

मधाणीआं…….अज दे कौड़े सच नूं  उजागर करदिआं…अमरिंदर  गिल्ल दी आवाज़



मधाणीआं…..
हाए ओ मेरे डाढिआ रबा,धीआं जमणे तों पहिलां मर जाणीआं,
हाए छल्लीआं…..
रबा कैसी जून चंद री,जग वेखणे तों पहिलां मुड़ चल्लीआं.
हाए लोई……
बापू तेरा धन जिगरा,असीं मरीआं ना अख तेरी रोई
हाए फीता …..
बाबला वे मुख मोड़िआ , तूँ वी अमीए तरस ना कीता.
हाए डेरा….
पुतां तेरा घर वण्डणा ,धीआं वण्डणा  बापू वे दुख तेरा, हाए.
हाए जोड़ी….
अमीए ना मार लाडली ,कौण गाऊगा  वीरे दी दस्स  घोड़ी……हाए ।                                                                                                                                                                                                                    


- हरदीप 

5 comments:

Udan Tashtari said...

ऑडियो लिंक दिखा ही नहीं...घर जाकर फिर से देखते हैं.

Rakesh Kumar said...

वाह! बहुत ही कर्णप्रिय मधुर गीत और संगीत.

आपकी सुन्दर अनुपम प्रस्तुति के लिए बहुत
बहुत आभार.

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा,हरदीप जी.
विशेष अनुरोध है आपसे.

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर वाह!

Bhushan said...

दिलकश गीत और सुरिंदर कौर की आवाज़. अच्छा लगा.

सहज साहित्य said...

दर्द को शब्दों का धड़कता रंग देते लोक गीत , जिनका मुकाबला आज की कविता नहीं कर सकती क्योंकि लोक का जो भावजगत निर्मित होता है , वह चिरस्थायी होता है । हरदीप जी हरबार किसी सामाजिक सत्य से जोड़ देती हैं । बहुत आभार