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Monday, November 28, 2011

भावों का मेला {महिया}

लोकगीत पंजाबी लोक संस्कृति का अटूट हिस्सा हैं | लोकगीत  कभी नहीं मरते | पंजाबी साहित्य में अगर किसी को आशीष देनी हो तो कहा जाता है , " जा तेरी उम्र लोकगीत जितनी हो" | लोगों के मन में हमेशा जिन्दा रहते हैं लोकगीत | 
पंजाबी लोकगीतों का दायरा बहुत बड़ा है जिसमें 'माहिया' गुलाब के फूल जैसे अपनी अलग- सी खुशबू  लिये हुए हैं | 

फूलों में फूल गुलाब 
लोकगीत महिया का 
है नहीं कोई जवाब 

डॉ. सोहिन्द्र सिंह बेदी के अनुसार माहिया शब्द माही से बना है जिसका अर्थ है ' भैसे चराने वाला चरवाहा"| वारिस शाह के जमाने में इसका यही अर्थ था | वारिस की हीर में 'माही' शब्द का प्रयोग इसी संदर्भ में किया गया है | यह कोई नहीं जानता कि कब और कैसे माही शब्द का अर्थ बदलकर प्रियतम हो गया | 
माहिया तीन पंक्तियों का एक छोटा सा छन्द है जिसकी पहली और तीसरी पंक्ति में 12-12 मात्राएँ तथा दूसरी में 10 मात्राएँ होती हैं |पहली और तीसरी पंक्तियाँ तुकान्त होती हैं| 
पंजाबी में जितने माहिए अब तक लिखे गए हैं उनमें पहली पंक्ति तुकान्त जोड़ने के लिए ही होती है | इसमें कोई चित्रण या दृश्य पैदा किया होता है, असली भाव दूसरी व तीसरी पंक्ति में ही होता है|माहिया का विषय प्यार -मोहबत ही है|

 मैं पहले पंजाबी के माहिया का उदाहरण देने जा रही हूँ .......

कोट किल्ली ते ना टंगिया करो
साडे नाल नहीं बोलणा
साडी गली वी ना लंघिया करो 


कोट किल्ली उते टंगणा ए
गली थोडे पियो दी तां नहीं 
असीं रोज इथों लंघणा ए 

सोने दी परांत होवे 
अज मेरे माहिए आवणा
वीह वरियां दी रात होवे 

केहा कढिया कसीदा खेस ते 
होवे जे तू मुल विकदी 
तैनू लै लवां जिन्द वेचके

बागे विच आया करो 
जदों असीं सौं जाइए 
तुसीं मख्खियाँ उड़ाया करो 

बागे विच आया करो 
मख्खियाँ तों डर लगदा 
गुड़ थोड़ा खाया करो 


दो माहिया अमिता कौंडल जी ने याद दिलाए ......


बाईसाइकल चलाई जांदे हो 
ओ थोडी की लगदी 
जिहनू मगर बिठाई जांदे हो 


बाईसाइकल चलाई जांदा हाँ 
ओ साडी ओहिओ लगदी 
जिहनू मगर बिठाई जांदा हाँ 


अब पेश हैं मेरे लिखे माहिया 
1.
भावों का मेला है 
इस जग- जंगल में 
मन रहे अकेला है 

2.
ख़त माँ का आया है 
मुझको पंख लगे
दिल भी हरषाया है
3.
यह खेल अनोखा है
जग में हम आए 
बस खाया धोखा हैं 

4.
ये गीत  पुराना है 
रूठ गया माही
 अब उसे मनाना है

5.
तू जब से  रूठ गया
मुस्काना भूली 
दिल मेरा टूट गया 

6
देख गुड़िया पटोले
छलकी ये आँखें 
मेरा बचपन बोले 
7 .
चलता कौन बहाना
 मौत चली आई
बस साथ तुम्हें जाना
8.
गाँव कहाँ वो मेरा
मुर्ग़ा जब बोले
होता जहाँ सवेरा


9
शब्दों से  गीत बना 
अँखिया राह तकें 
तू दिल का मीत बना 

10 
 अनजाने  भूल हुई
जो दी ठेस तुम्हें
मुझको वह शूल हुई

हरदीप 





29 comments:

Udan Tashtari said...

पंजाबी के माहिया के बारे में जानकारी एवं रचनायें पसंद आई.

Deepak Shukla said...

Namaskar ji...

Haiku jad padhde si..
Asi vi thode se
haiku se likhde si..

Hun mahiya aaya hai...
Sade naal ek rishta..
Nava banaya hai..

Hum bhi kahenge ab..
Mahiya ki shaili main..
Kavita likhenge ab..

Tum hi batlao ye..
Mahiya kya likh paye..
Humko samjhao ye..

Nit nayi vidhaon se parichit karana aapka sankalp raha hai..aur yah hum se anjaan pathkon ko labhanvit bhi kar raha hai... Ab humbhi yahi sochte hain ki kash sahitya pathykram main padha hota to shayad kavitaon ki matrain samajh main aatin...
Ho sake to agla lekh kavitaon, haiku, mahiye, gazlon aadi ki matraon ki ginti aadi par kendrit kkejiyega...

Shubhkamnaon sahit..

Deepak Shukla..

सहज साहित्य said...

जब लोक -संस्कृति की बात आती है तब आपकी लेकनी से नि:सृत रचना झरने -सी बह उठती है, कल-कल , छल-छल करती हुई ऽअपके सारे माहिया इसी तरह की कमनीयता और भाव-सत्ता से ओतप्रोत हैं । दिल के नज़दीक और दिमाग पर छा जाने वाले । किस-किसकी तारिफ़ करूँ हरदीप जी ! फिर भी इन माहिया का तो कोई जवाब नहीं है -
1
भावों का मेला है
इस जग- जंगल में
मन रहे अकेला है

2.
ख़त माँ का आया है
मुझको पंख लगे
दिल भी हरषाया है
3.
यह खेल अनोखा है
जग में हम आए
बस खाया धोखा हैं


5.
तू जब से रूठ गया
मुस्काना भूली
दिल मेरा टूट गया

10
अनजाने भूल हुई
जो दी ठेस तुम्हें
मुझको वह शूल हुई
-दुआ है कि आपकी लेखनी दोपहर बाद की बढ़ने वाली छाया की तरह हिन्दी काव्य -जगत में विस्तार पाती रहे !

Rakesh Kumar said...

आपका लेखन बहुत ही सुन्दर और सुखद होता है.
आपके शब्द दिल में उजाला कर देते हैं.माहिया
के बारे में आपसे अच्छी जानकारी मिली.
अनुपम प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभारजी.

पर एक शिकायत है आपसे.बहुत समय से आप मेरे ब्लॉग पर नही आ रहीं हैं. क्या मुझ से कोई भूल हुई है.आप जैसी महानुभाव से मै अपनी भूल के लिए क्षमा की आशा रखता हूँ.

दर्शन देकर अपने सुवचनों से कृतार्थ किजियेगा.

सदा said...

वाह ..बेहतरीन ।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

सुन्दर प्रस्तुति

सुभाष नीरव said...

हरदीप जी, आपके सभी माहियों ने दिल जीत लिया। बहुत अच्छे और मन को छूने वाले लगे। माहिया वही जो गाया भी जा सके, 12-10-12 की मात्राओं वाले ये माहिया हिन्दी में लिखे जा रहे हैं और इनमें गेयता भी होती है परन्तु पंजाबी मे जो माहिया प्रचलित है, वे बखूबी गाये जाते हैं, उनमे गेयता भी भरपूर होती है पर वे 12-10-12 मात्राओं का बंधन नहीं मानते हैं। आपने जो पंजाबी माहियों का उदाहरण दिया है, वे बहुत सुन्दर माहिया है पर 12-10-12 मात्राओं में नहीं हैं।

udaya veer singh said...

sone -mone hayiku mithhe lagade ne badhayiyan ji

दर्शन कौर said...

changi hea ji..tuvadi 'maahiya'

मेरा साहित्य said...

haiya ke bare me himanshu ji aur aapne jo jankari di hai bahut hi sunder hai aapne sach kaha hai ki lokgeet kabhi nahi marte .
aapne apne mahiya me to bhavon ka samander baha diya hai kamal
badhai
rachana

डॉ टी एस दराल said...

बहुत रोचक जानकारी ।
आपने तो खज़ाना पेश किया है ।

सहज साहित्य said...

हिन्दी में आए इस छन्द की पहली शर्त इसकी गेयता ही है । यदि वह गेय नहीं है तो कुछ भी हो माहिया नहीं है । वसे प्रवाह तो रचना की गुणवता है ही ,चाहे वह छन्दोबद्ध हो या मुक्त छन्द । भाई नीरव जी की माहिया विषयक एक अन्य टिप्पणी यहाँ भी देख सकते हैं-http://laxmishankarvajpayee.blogspot.com/2011/06/blog-post.html
सुभाष नीरव said...
इधर 'माहिये' भी हिंदी कविता का एक ज़रूरी हिस्सा बन गए हैं। 'माहिये' लिखने का प्रचलन तेज़ी से बढ़ा है। 12-10-12 मात्राओं में केवल तुकबन्दी के तौर पर कुछ भी लिख देना 'माहिया' नहीं है। उसके लिए कोई विचार, कोई अनौखा भाव, कोई अनौखी बात होनी ज़रूरी दीख पड़ती है, कविता के इस रूप के लिए। लक्ष्मीशंकर वाजपेयी के ये माहिये इसी तरफ़ इशारा कर रहे हैं। अब यह माहिया ही लें-

वो भी दु:ख ढोता है
बारिश के ज़रिये
ईश्वर भी रोता है

यह महज 12-10-12 मात्राओं में तुकबन्दी नहीं है, एक सधे हुए बेहतरीन माहिये की पहचान है। इसके पीछे कवि का चिंतन और उसकी गहरी सोच के दर्शन हमें होते हैं।

अन्त में 'बाबुषा' जी का प्रश्न जो उन्होंने वाजपेयी जी से किया है- बाबुषा जी माहिया और हाइकु पंक्तियों के हिसाब से भले ही एक समानता रखता प्रतीत होता हो, लेकिन है नहीं। 'हाइकु' में तीन पंक्तियां 5-7-5 वर्ण के अनुशासन में बंधी है जबकि 'माहिया' में यही तीन पंक्तियां 12-10-12 की मात्राओं में।

इतने सुन्दर माहियों के लिए भाई वाजपेयी जी को बधाई !
June 26, 2011 11:26 AM

Dr.Bhawna said...

भावों का मेला है
इस जग- जंगल में
मन रहे अकेला है...

Bahut khub ! sabhi mahiya bahut achhe hain bahut2 badhai..

चंदन कुमार मिश्र said...

माहिया के बारे में जानकारी नहीं थी। लेकिन हाइकु जैसा ही है…धन्यवाद।

Rama said...

भावों का मेला है

इस जग- जंगल में
मन रहे अकेला है

अनजाने भूल हुई
जो दी ठेस तुम्हें
मुझको वह शूल हुई
बहुत सुन्दर माहिया ...पंजाबी माहिया की जानकारी देने के लिए धन्यवाद ....

डा. रमा द्विवेदी

Ravi Ranjan said...

सभी माहिया बहुत अच्छे लगे|
एक माहिया मेरी ओर से-

जीवन में आना है
सबकुछ सहकर भी
जीकर ही जाना है|

सादर

सहज साहित्य said...

रविरंजन जी आपको भी बहुत बधाई! आपका माहिया छन्द का निर्वाह करते हुए भी तुक लय आदि का पूरी तरह निर्वाह कर रहा है; भरपूर गेयता तो इसमें है ही ।छन्द का मतलब यह नहीं है की रक्खी मक्खी और चक्खी जैसी तुकान्तता का आँखमूँदकर पालन किया जाए । काव्य -चाहे वह अतुकान्त ही क्यों न हो प्रवाहमय होना चाहिए । जो गेयता और छन्दानिशासन दोनों का निर्वाह करते हैं ,वे ही इस क्षेत्र में ज़्यादा सफल होते हैं। हिन्दी में माहिया भी दोनों तरह के लोग लिख रहे हैं-1-छन्द का पूरा निर्वाह न करने वाले और गेयता को ही साध्य मानने वाले , दूसरे वे हैं जो दोनों का सांमजस्य स्थापित कर ले रहे हैं। बाद वालों को ही अच्छा माहिया रचने वाला माना जाता है । इस क्षेत्र में भेड़चाल की नहीं गम्भीर साहित्यिक कार्य करने की अभी बहुत ज़रूरत है। शब्दों की गर्दन मरोड़कर दीर्घ मात्रा को लघु बनाना हिन्दी भषा की प्रकृति नहीं है , उर्दू की है ; अत: हिन्दी का अपना विधान है ।

amita kaundal said...

हरदीप जी बहुत सुंदर माहिया हैं हिंदी में माहिया के बारे में आपसे और रामेश्वर भाईसाहब से जो ज्ञान मिला बह अतुलनीय है. कुछ पंजाबी में भी माहिया लिखिए.
सादर,
अमिता कौंडल

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बड़ी प्यारी पोस्ट है।
माहिया के बारे में इतनी जानकारी न थी।
..शुक्रिया।

KAHI UNKAHI said...

माहिया के बारे में आदरणीय काम्बोज जी से तो पहले भी काफ़ी सार्थक जानकारी मिल ही चुकी है...सो उनको तो आभार है ही, साथ ही आपको भी जो इतने सुन्दर, अर्थपूर्ण माहिया हमारे सामने प्रस्तुत कर के न जाने कितने लोगों को इस विधा की ओर भी अग्रसर करेंगी...। वैसे तो सभी माहिए बहुत अच्छे लगे, पर खास तौर से इनके लिए बधाई...

भावों का मेला है
इस जग- जंगल में
मन रहे अकेला है

देख गुड़िया पटोले
छलकी ये आँखें
मेरा बचपन बोले


यह खेल अनोखा है
जग में हम आए
बस खाया धोखा हैं

चलता कौन बहाना
मौत चली आई
बस साथ तुम्हें जाना

ऐसे ही सुन्दर माहिया लिखते रहिए...।

Ravi Ranjan said...

आदरणीय काम्बोज जी,
आपलोगों से जो सीखता हूँ वो लिखने की कोशिश करता हूँ|यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मेरा लिखा माहिया आपको पसन्द आया|हार्दिक आभार|
सादर

MANI KA HASHIYA said...

माहिया के विषय में बहुत अच्छी जानकारी के साथ ही सुन्दर, भावपूर्ण माहिया प्रस्तुत करने के लिए बहुत बधाई...।
प्रेम गुप्ता ‘मानी’

Babli said...

माहिया के बारे में अच्छी जानकारी प्राप्त हुई! हाइकु से मिलता जुलता है! बढ़िया लगा!

सहज साहित्य said...

हाइकु में वर्ण गिने जाते हैं और माहिया में मात्राएँ । मात्राओं में हृस्व=1 मात्रा तथा दीर्घ=2 मात्राएँ , जबकि हाइकु में चाहे एक मात्रा वाला वर्ण हो चाहे दो मत्राओं वाला , वह एक ही गिना जाता है । जैसे
-भावों का मेला है-2+2+2+2+2+2=12 मात्राएँ है , लेकिन वर्ण =भा वों का मे ला है=6 हैं। वर्ण से तात्पर्य हाइकु में है स्वर या स्वर से युक्त व्यंजन्।

डॉ. जेन्नी शबनम said...

इस नयी विधा 'माहिया' को पढ़कर और इसके बारे में जानकार बहुत अच्छा लगा. आभार.

दीनदयाल शर्मा said...

इतने सुन्दर माहियों के लिए बधाई ...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 17/07/2012 को आपकी यह पोस्ट (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Bharat Bhushan said...

आपकी पोस्ट का यह अंदाज अच्छा लगा. 'माहिया-माहिया' हो गया. बहुत सुंदर.

सरिता भाटिया said...

लाजवाब माहिये बने हैं
आपने बचपन याद दिला दिया जब गीतों में यह माहिया गए जाते थे हमारी पंजाबी में इसे टप्पे कहते थे उस दिन कहीं पढ़ा मन प्रसन्न हो गया