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Saturday, November 24, 2012

चन्दा बीमार


Tuesday, October 30, 2012

जिन्दगी -चूल्हे*



जिन्दगी -चूल्हे
खाएँ ज्यों रोटी सेक 
भरता पेट 
इसी जिन्दगी चूल्हे 
पकते भाव 
रूह पाए -खुराक 
जिंदगी -चूल्हे 
दुःख -सुख सुलगें
उठता धुआँ 
मिले  जिन्दगी -चूल्हे 
साँझ का झोका 
मिले प्यार अनोखा 
जिन्दगी- चूल्हे 
हिम्मत का ईंधन
खिलते दिन 
हाय ! ज़िन्दगी -चूल्हे 
ज्यों  फूँककर 
धुआँ उड़ता देखूं 
कभी ज़िन्दगी सेकूँ ।
डॉ हरदीप कौर सन्धु 
*चोका जापानी काव्य शैली की लम्बी कविता है जिस में 5 +7 5 +7 +5  का क्रम होता है और अंत में ताँका [ 5 +7 +5 +7 +7 ] जोड़ दिया जाता है ।
नोट : यह पोस्ट अब तक 340 बार खोलकर पढ़ी गई है । 

Sunday, August 26, 2012

घर और कमरे

साहित्य -सृजन के लघुकथा विशेषांक में प्रकाशित लघुकथा :
डॉ . हरदीप कौर सन्धु

Sunday, July 1, 2012

गर्भनाल के जुलाई अंक में हरदीप सन्धु जी की समीक्षा 

Tuesday, June 26, 2012

'हाइकु लोक

         जापानी काव्य विधा हाइकु की पत्रिका 'हाइकु लोक 'में  मेरे हाइकु चर्चा में ।
          पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिएगा 
         यह भारतीय हाइकु -क्लब की मुखपत्रिका है ।
               सम्पादक : डॉ.मिथिलेश दीक्षित; 
                                                                
            तैरती रही 
      रेगिस्तान की प्यास 
          इन आँखों में 
--डॉ.हरदीप कौर सन्धु 

                                                            

Thursday, May 10, 2012

वायदे का हिंडोला


-डॉ हरदीप कौर सन्धु

दीये की बाती से युगों से जान पहचान थी ।  वह एक दूसरे के पूरक जो ठहरे ।  कुछ दिन पहले वे धीमी रौशनी के आँगन में बैठे बातों में उलझे हुए थे ।  बातों-ही बातों में बाती  ने नए दीये के लिए एक वायदे का हिंडोला  बनाया और उसे हिंडोले पर  चढ़कर रौशनी बिखेरने को कहा ।  बहुत तेज़ी से चलने वाले हिंडोले पर चढ़ने के लिए विशेष सावधानी और नियमों के प्रयोग के बारे में भी बाती  नेनए दीये को बताया ।  और फिर दोनों अपने -अपने घर लौट गए ।
                बाती की  मन -तरंगे कहती हैं कि दीये का पूरा मन है इस हिंडोले पर चढ़ने का और वह इसके पास ही खड़ा है ।  उसने कई मर्तबा इस पर चढ़ने की कोशिश भी कीमगर नियमों को भूल गया ।  बाती का मन बेचैन -सा हो उठा .........कहीं चोट ही न लग गई हो उसके प्यारे दीये को !                      
           मगर जिस दिन दीया इस हिंडोले पर चढ़ने में सफ़ल हो गया ,उसे ऐसा  आनन्द मिलेगा ,जिसकी कभी उसने कल्पना भी नहीं की है ।  बाती को उस दिन दुनिया की अनमोल खुशियों की दौलत मिल जाएगी ।  
      वैसे तो बाती ने अभी तलक दीये से कभी कुछ नहीं माँगा ; मगर आज वह अपने आने वाले जन्म दिन पर दीये से इसी दौलत की माँग कर रही है ।  आज बाती दीये को बस इतना ही कहना चाहती है कि अगर कोई अपने  मन से कुछ पाने की कोशिश करे तो पूरी कायनात अपनी भुजाएँ फैलाकर उसको सहारा देने लगती है । 

Sunday, April 22, 2012

सिद्धू -सन्धु जुगलबन्दी

आज मैं प्रोफेसर दविंद्र कौर सिद्धू और अपने हाइकु को लेकर जुगलबंदी पेश कर रही हूँ । आशा करती हूँ ये प्रयास अच्छा लगेगा । 
खोज रे मन 
धरती से आकाश 
तेरा वजूद...............दविंद्र 
खोजा तो पाया
धरा खुला अम्बर 
है मेरी काया............हरदीप 



याद अतिथि 
दरारों से फिसले
साँसों में बसी..........दविंद्र 
सौभाग्य मेरा
आई अतिथि बन 
आज ये यादें..........हरदीप 


फूल बन तू
छोड़ बारूदी बातें
अमन चाह .............दविंद्र 
बातें बारूदी
कर देती तबाह 
अमन फूल.............हरदीप 


बारूद हाथ 
ये नारे अमन के 
छोड़ चालाकी ...........दविंद्र 
होगा  न कभी 
बारूद से अमन 
जान रे मन.............हरदीप 


आग का गोला 
मन में दहकता 
फूल क्या बनूँ ............दविंद्र 
सींचा  मन को 
ज्यों निर्मल ख्यालों से 
बना ये फूल ..............हरदीप 

Friday, April 20, 2012

यादों का आईना


जब कोई हमसे बहुत दूर चला जाता है तो उसकी याद हमारे जीने का सहारा बन जाती है | मेरे पूजनीय पिता जी को हमसे बिछुड़े लगभग २० वर्ष हो गए हैं | आज जब सुबह केलेंडर देखा  जो २० अप्रैल दिखा रहा था , उस पर नज़र जाते ही  यादों के आईने में किसी की तस्वीर दिखने लगी …..वो थे मेरे पिता जी …….जिनका आज जन्म दिन है | पूजनीय पिता जी की स्मृति में कुछ हाइकु………..

1.

कौन कहता 
साथ तुम नहीं हो                    
तुम यहीं हो

२.
तोतले दिन 
जिस संग बिताए
 यादों में आए 
३ 

यादों में आना 

पीठ थपथपाना 

लगे सुहाना 

४ 

चले गए यूँ 

कोसों दूर हमसे 

यादों में मिलें 

५ 

याद उनकी 

हर पल है आती 

बड़ा रुलाती 

 याद तुम्हारी 

थामती भंवर में

 नाव जो डोले 


--डॉ. हरदीप कौर सन्धु







Wednesday, April 4, 2012

परनानी के आँसू और अनुत्तरित प्रश्न"




आज भी  कदे ना कदे मेरे चेतिआं (यादों )'च वसदी मेरी पड़नानी (जिसे  मैं नानी  बुलाउंदी सी ) मेरे नाल गलां ( बातें)करन लगदी है । छोटे हुदिआं नू ओह सानू 'बार' दीआं गलां सुणाउंदी ते उथे इक वार जा के आपणा पुराणा पिंड (गाँव) वेखण दी इछा जाहर करदी ।इह “सांदल बार“ दा इलाका सी जो अजकल पाकिसतान दा मानचैसटर (City of Textile) अखवाउंदा है । मेरा नानका परिवार भारत -पाकि दी वंड (बटवारा ) तों पहिलां ओथे चक नम्बर  52, तहिसील समुंदरी , ज़िल्हा लाइलपुर विखे रहिदा सी ते मेरी पड़नानी दा  पिंड  सीतला सी।



साडे कोल़ मिलण आई पड़नानी कई-कई महीने ला जांदी। मेरे डैडी ने कहिणा, "जुआको... इह मेरी बेबे आ। इह थोडी मां दी मां दी मां है। बेबे तों कुझ सिखो... बेबे दीआं गलां(बातें ) धिआन नाल़ सुणिआ करो। बेबे दी सेवा करिआ करो।"



ओदों नानी दीआं सुणाईआं बातां तों बगैर चाहे बहुतीआं गलां दी सानू समझ वी ना आउंदी पर फेर वी असीं नानी दीआं गलां बड़े गहु(ध्यान ) नाल सुणदे... ते नानी फेर की होइआ... फेर की होइआ... कहि-कहि के ओस दीआं कदे ना मुकण वालीआं 'बार' दीआं गलां दी लड़ी नू होर लमेरा कर दिंदे  । गलां करदी नानी दीआं अखां 'चों आप मुहारे हंझू (आंसू ) वहि तुरदे । असीं निआणे आपणी समझ अनुसार नानी नू हौसला दिंदे  कहिंदे  "लै... नानी भला तू रोंदी किओं हैं... हो लैण दे सानू वडे... फेर असीं तैनू तेरे पिंड लै के चलांगे ।"




इक दिन जदों मैं आवदी सहेली नाल मूहरले बरांडे 'च बैठी आवदा सकूल दा कम कर रही सी तां कोल बैठी गलोटे अटेरदी नानी ने मेरे कोल खिलरे कागजां वल इशारा करदी ने पुछिआ, "कुड़े... आ भला भारत दा नशका आ ?"


मेरी सहेली ने हैरान हो के किहा , “बेबे भला तैनू किवें पता बई इह भारत दा नक्शा है ।"
“......लै पुत तां की होइआ, जे मैं थोडे आंगू (आपकी तरह ) पड़्ही वी नी... पर थोनू नित वेहदी (देखती)आं... पड़्हदीआं नू॰... गलां करदीआं नू जदों तुसीं 'जादी ( आज़ादी ) बारे पड़्हदीआं ओ ।”




नानी ने आवदी मलमल दी चुनी (चूनर) दा पल्ला  ठीक करदिआं फेर ओसे नकशे वल इशारा करदिआं कहिणा शुरू कीता, "पुत, 'जादी दी ओह पड़्हाई तां थोनू अज ताईं किसे ने पड़्हाई ई नी... जिहड़ी असीं आवदे पिंडे (तन ) 'ते हंडाई (झेली )आ । जै खाणिआं ने पकीआं लखीरां वातीआं एहनां कागतां 'ते... नाल़े साडीआं जमीनां 'ते... इको मुलख दे करते दो टोटे... बणा ता इक हिन्दोस्तान... ते दूजा पाकिसतान... भैण-भाईआं आंगू रहिदिआं नू अड(अलग )करता सानू ।"




नानी हमेशां वांग आपणे अतीत 'च गुआच गई । “...पुत सन संताली (1947 ) दे ओहनीं दिनीं रौला पै गिआ बई 'जादी ( आज़ादी) आ गी... 'जादी आ गी... हुण सानू मुलख(देश ) छडणा पैणा । असीं सारे इओं हरान... बई एह काहदी 'जादी आ... जिहड़ी सानू मुलख छड के मिलणी आ। 'जादी काहदी आई सी... पुत... निरी लुट सी लुट... सानू इओं तां पता नी सी बई जाणा किथे आ? ...घरों बेघर करता सी एस खसमां खाणी 'जादी ने । सानू तां एही संसा (चिंता ) वढ-वढ खाई जावे... बई हुण जुआन धीआं/नूहाँ (बेटी/बहु) ते निके-निआणिआं (छोटे बच्चे )नू किथे (कहाँ )लै के जावांगे? कदे लगे... बई ऐवें रौल़ा ई आ... ख़बरे कोई भूचाल़ आउण तों पहिलां कोई ठुमणा लग ई जावे।"




डांग जिडा हाउका (लम्बी साँस ) भर के नानी ने आवदी गल जारी रखदिआं किहा, "...नाल़े एह 'जादी की थोडे भा दी 'कली (अकेली ) ई आ गी सी... ना पुत... ना... इह कल़मूही तां आवदे नाल़ विछोड़े दा दुख ते ओह गहरे  फट(जख्म ) लिआई सी जिहड़े अज ताईं नी भरे। इहनां फटां 'ते मल्हम-पट्टी  तां किसे ने की धरनी सी... एह तां अज ताईं किसे ने देखे बी नी।"




हौल़ी-हौल़ी गलां करदी नानी दी बिरती अज फेर एथों मीलां दूर ओस दे पिंड सीतला ( हुण पाकिसतान 'च ) नाल़ जुड़ गई सी। "...लै है... भरिआ भकुनिआ घर सी साडा... जिहड़ा असीं पता नहीं किहड़े हालीं छड के तुरे सी। इह तां पुत ताईं पता लगू जे मेरे अरगे बुड़े-बुड़ीआं दा चित(मन ) फरोल़ के देखोंगीआं । ...बलां ई वडा घर... खुल्हा-डुला निमां-डेकां नाल़ भरिआ विआ विहड़ा... इक पासे वडी सबात... मूहरे रसोई ते बरांडा... दूजे पासे पक्की  बैठक... सबात 'च पुत मैं तां ओमे-जिमे पितल़ नाल़ मड़्हिआ सन्दूक छड आई... हथीं कते-बुणे दरीआं-खेसां नाल़ भरिआ विआ । रीझां ला के लिपिआ समिआरिआ चुल्हा-चौंका... ओटे ते पाईआं तोते -मोरनीआं मैनू अज बी ओमे-जिमे दीहदे (दिखाई )ने। ...मार घर भरिआ पिआ सी लवेरीआं नाल़... दो बलदां दी जोड़ीआं... बोता... कटरू-वछरूआं नाल़। पुत मैं की-की गणामां थोनू हुण ।"


ठंडा  साह भरदिआं नानी ने आवदी गल जारी रखी, "...जमां ई समझों बाहर दी शैअ सी एह खसमां खाणी 'जादी...।


पुत मैनू तां कई-कई बार हुण बी ओही 'वाजां कनी पैंदीआं ने... जदों गुआंढीआं दा मुंडा (लड़का ) बीरा घाबरिआ विआ बाहरों भजिआ आइआ ते आखे... ओए भज लो जे भज हुदा.(दौड़ लो अगर दौड़ा जाता है ).. आपणी पती (मोहल्ला ) नू॰ बी वढण आ गे ओह । ...ते ओधरों होर बी डराउणीआं 'वाजां औण... ओ जाण ना दिओ इन्हां नू॰ सुके एथों... कर दिओ डकरे (टुकड़े )ऐथे ई । भाई... जिनां कु समान घरों चकिआ गिआ... गडिआं 'ते लद लिआ... की-की धर लैंदे नाल़े असीं... मसां भज के जानां बचाईआं। ओदों तां लगे खबनी(शायद ) लोट(ठीक ) ई हो जू सारा कुछ... खबनी मुड़ ई पमांगे घरां नू॰... चन्दरा  रब बी पता नी किहड़े माड़े करमां दा बदला लै रिहा सी साथों। की पता सी ओन्हां घरां दा मुड़ मूह बी देखण नू नी मिलणा।"


नानी ने आवदी ऐनक दी डडी नू मरोड़ी दिंदे  आवदी गल चालू रखदिआं किहा, "....‘ते फेर लहू पीणीआं नगीआं तलवारां ते बरछे घरां 'च वढ-टॱक करन ॱगे। सानां आंगू भूतरे लोक इक दूजे दे दुशमण बणगे सी। भाई-भाई... सिखड़े ते मुसले बणगे सी। बाबे नानक ते पीर-पगबरां दी धरती रत(खून ) नाल़ लालो-लाल हो गी सी। पिडो-पिडी जिहड़ा घाण होइआ सी मनुखता दा... पुत देखिआ नी सी जांदा । हाहाकार मची वी सी चारे पासे... ओधर वसदे हिन्दू  ते सिख एधर नू भजे... ‘ते एधरों मुसलमान ओधर नू । ...ते फेर लोथां (लाशें ) नाल़ भरीआं गडीआं... ओधरों एधर... ते एधरों ओधर नू गईआं। लोथां दे ढेर लग गए सी । ओह इक खूनी हिजरत हो निबड़ी सी।




धीआं - भैणां दी इज़त सरेआम नीलाम होई सी। गडिआं 'ते तुरे जांदिआं नू बी इही संसा ... बई पता नी किधरों हमला होजूगा... धीआं भैणां नू खोह के लै जाणगे ओह । ...ते कईआं ने तां ढिडों जमीआं दी इज़त बचाउण लई... आवदीआं धीआं-भैणां नू आवदे हथीं आप किरपानां नाल़ वढता सी... कईआं ने आवदीआं जिओंदीआं कुड़ीआं नू नहिरां 'च रोड़ता सी। ओदों तां साडा रब बी नी सी बौहड़िआ... ओह बी पता नी डर के किहड़ी काल-कोठड़ी 'च लुक के जा बैठा सी।"


"...ते मगरों एधर आ के कई तां जमां ई चुप करगे... कईआं नू मैं कमल़े होए देखिआ... आवदे टबर(परिवार ) नू... आवदीआं धीआं-भैणां नू आवदे हथीं मार के कोई किमे जिओं लऊगा (कैसे कोई जिन्दा रहा सकता है )भला... मन 'ते पिआ बजन अगल़े नू कमल़ा नी करू तां होर की करू?' ...ते पुत आवदा मुलख छडणा की सौखाल़ा पिआ नाल़े...।" नानी दीआं अखां 'चों धरल़-धरल़ अथरू वहि रहे सी। ओसने आवदी चुनी दे पले नाल़ अखां पूझीआं ते नाल़े आवदी ऐनक नू......फेर ओह वडे दरवाज़े वल इओं देखण लगी जिवें पूझी (साफ)  होई ऐनक विचों दी उहनू दरवाजे दे परले पासे सीतला पिंड  नू जांदा खवनी कोई राह ही खौरे दिख जाए।




नानी दीआं गलां सुणदे... असीं ऐना डर गए सी कि हुन्गारा भरना वी भुल गए सी... निआणी मत (समझ) नू समझ वी नहीं सी आ रिहा नानी किनां नू वार-वार कहि रही सी... बई 'ओह' आ जाणगे... आखिर कौण सन ओह? ...जिना ने ऐनी दहिशत पाई सी लोकां 'च।




आवदा पिंड  फिर तों दुबारा वेखे बिनां ही नानी तां कुझ सालां बाद एस फानी दुनीआं नू अलविदा कहि गई... पर अज ओस दे हंझू  मेरीआं अखां राहीं वहि रहे ने ते मेरे कोल़ तां हुण नानी दी मलमल दी चुनी वी नहीं है जिस नाल़ मैं अखां पूंझ के आवदे नानकिआं दी 'सांदल बार' ते नानी दे सीतला पिंड  नू वेख सकां ।






हरदीप


*चित्र गूगल के आभार से 













Saturday, March 24, 2012

कुछ न माँगूँ (हाइकु)


1
 कुछ न माँगूँ        
बस पल दो पल
ख़ुशी के सिवा
2.
कभी ढूँढ़ती
यादों के आँगन में
ख़ुशी अपनी
3
बिन बुलाए,
ये गम पता नहीं
क्यों चले आए !
4 .
मैं हूँ पगली 
ढूंढने चली ख़ुशी 
यूँ गली-गली 
5 .
ख़ुशी तो बैठी 
कहीं दुबक कर 
मेरे दिल में 
6 .
ओ मेरी ख़ुशी 
तुझे काहे का डर
तू बाहर आ 
7 .
गमों की रात
जब करती कब्जा
वो पल रूठा 
8 .
गम के गीत 
एक अकेला मन
कैसे हो जीत
9 .
दिल ज्यों गाए
प्रीत-मधुर गीत 
तभी हो जीत 
10 .
गम का साया 
खुशियों की धूप में 
टिक न पाया 

--डॉ. हरदीप कौर सन्धु



Sunday, March 18, 2012

दीवार में कील ( प्रेरक कथा)


जब जागे तब सवेरा भाग -2 ( कहानीकार -डॉ. हरदीप कौर सन्धु)
                                    *****************
यह लघुकथा हिन्दी के कहानी संग्रह 'जब जागे तब सवेरा' में जल्दी ही आ रही है ।



                                                    दीवार में कील
गुरदेव सिंह जिसे सभी देबा फौजी कहकर बुलाते थे , अपनी फ़ौज की नौकरी पूरी होने के उपरान्त अब गाँव में ही रहने लगा था | गुसैला व् अड़ीअल सुभाव के कारण सभी देबे से दूर ही रहते | गुस्सा तो हरदम उसकी नाक पे बैठा रहता | बोलने लगा वो कोई बड़ा-छोटा न देखता , बस जो मुँह में आया बोल देता |परन्तु कोई भी उसके आगे न बोलता | देबे को लगता कि सभी उससे डरते हैं |
आज बातों-बातों में उसका २०-२२ वर्ष का लड़का सीरा न जाने किस बात पर अपने पिता से झगड़ पड़ा और पिता को ऊँचा - नीचा बोल गया |देबे का दिल छलनी-छलनी हो गया परन्तु वह गुस्सा अन्दर ही पी गया | अपनी गलती का अहिसास होने पर लड़के ने पिता से क्षमा भी माँगी मगर गुरदेव सिंह खामोश था |आज उसको पहली बार आपने उम्र भर बोले कड़वे शब्द तथा गुसैले सुभाव का अहिसास हुआ |
 " भापा अब तो मैंने माफ़ी भी मांग ली ....अभी भी नाराजगी है क्या .." सीरे ने पिता की ख़ामोशी को तोड़ना चाहा | " जो तुम चाहते हो बस वैसा ही होगा ...तेरी हर सज़ा मुझे मंजूर है .." सीरे ने फिर मिनत की | 
" पुत्र, सज़ा तो कैसी ? पर अगर तू मेरी माने तो ऐसा कर ...तू जा अपने बाहरवाले घर ....और पिछली दीवार पर कुछ कीलें ठोक कर आ ...बाकी का काम मैं तुझे फिर बताता हूँ |" अपनी दिमागी उलझन को खुद सुलझाते हुए देबे ने अपना फौजी फ़रमान सुना दिया |
सीरे ने साइकल उठाई और बाप का हुक्म की तामील करने चल पड़ा बाहरवाले घर को |दो घंटों के उपरान्त जब वह पसीने से तर-बतर लौटा तो पिता ने वही कील उखाड़ने के लिए उसे फिर से भेज दिया |सीरे को थोड़ी खीज आई मगर अपने हाव- भाव छुपता वह उसी समय बिना कुछ बोले चुप-चाप लौट गया , कीलें उखड़ने | इसी तरह ठोकने-निकालने में पूरा दिन निकल गया |
" भापा...एक बात पूछूँ" शाम को सीरे ने थोड़ा हिचकचाते अपने पिता से अपने दिल की शंका ज़ाहिर की, " आज तूने मुझे ये अच्छे काम लगाया ....कभी जी रे चिड़िया ...कभी मर चिड़िया ....कभी कीलें ठोक तो कभी उखाड़ "| गुरदेव सिंह कुछ न बोला और सीरे की पीठ थपथपाते उसको अपने साथ बाहरवाले घर चलने का इशारा किया |
उसी दीवार के पास पहुंचकर देबे ने कुछ गंभीर स्वर में बोलना शुरू किया , " आज मैं तुझे जिन्दगी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाने जा रहा हूँ | जिसका अहिसास मुझे बहुत देर पहले हो जाना चाहिए  था | परन्तु मैंने तो पूरी उम्र निकल दी बिन समझे | मैं नहीं चाहता कि मेरा पुत्तर भी वही गलती दोहराए| " भापा ये क्या बुझारतें सी डाली जा रहा है ....सीधे -सीधे बता ...कहना क्या चाहता है तू मुझे ?" सीरे ने थोड़ा उत्सुक्त होकर पूछा |
    देबे ने सीरे को गलबहियाँ लेते कहना शुरू किया , " पुत्तर ...आज तूने पहले कीलें दीवार में ठोकीं...यह तेरी की गलती है ...मुझे कड़वा बोलना | फिर तूने कीलें निकाली..यह तेरा क्षमा मांगना है | पर ज़रा ध्यान से तू दीवार को देख ..." देबे ने दीवार की तरफ संकेत करते हुए अपनी बात ज़ारी रखी , " चाहे तूने सभी कीलें निकाल दीं...मगर दीवार पर अभी भी उनके निशान बाकी हैं | तू चाहे किसी से कड़वा बोलकर क्षमा भी मांग ले मगर तेरे कड़वे शब्दों के धब्बे जो दूसरे के मन पर लग गए हों उनको कैसे मिटाएगा? मैं ये नहीं कहता कि तू गलती करके अब क्षमा मांगना भी छोड़ दे |छोटी - छोटी गलतियों कि क्षमा मिल सकती है परन्तु एक बार किसी को कड़वा बोलना सौ गलतियों समान है | कड़वे बोल वो अन्दर के जख्म देते हैं जो तमाम उम्र ठीक नहीं होते |बस आज से एक बात याद रखना कि किसी को कड़वा नहीं बोलना |
    पुत्तर को समझाकर देबे को जैसे मानसिक सकून मिला क्योंकि मन ही मन में उसने अपनी गलती सुधार ली थी | उस दिन के बाद लोगों ने देबे फौजी में एक बड़ा बदलाव देखा |अब वह मोम सा नर्म व् मिठास की मूर्त बन गया था और देबे फौजी से लोगों का चहेता फौजी गुरदेव सिंह |

  

Friday, March 9, 2012

मेरा वजूद (चोका)


    हूँ भला कौन 
   क्या वजूद है मेरा 
    यही सवाल 
   आ डाले मुझे घेरा 
   टूटे सपने 
   जब मुझे डराएँ
   मेरा वजूद 
   कहीं गुम हो जाए 
   दूर गगन 
   चमकी ज्यों किरण 
   अँधियारे में 
   सुबह का उजाला 
   घुलने लगा 
  जख्मी हुए  सपने 
 आ चुपके से 
 किए ज्यों आलिंगन 
 सुकून मिला 
 मेरा वजूद मिला 
 मैं तो चाँद हूँ 
गम के बादलों में 
 था गुम हुआ 
मिला सूर्य संदेश
मैं धन्य हुआ
करूँ तुमसे वादा
तुम जैसा ही 
एक काम करूँगा
तुम करते 
दिन में ही उजाला 
मैं उजियारी
हर  रात करूँगा 
हर बात करूँगा 
हरदीप 

Friday, March 2, 2012

जन्मदिन *


हमारे घर आई एक नन्हीं परी 

कितनी भोली और मासूम सी 

फूलों जैसे खिला है चेहरा

खिल-खिला वह हँसती है

कद से वह लम्बी दिखती 

अभी भोली बातें करती है 

भर ओक  बाँटे वह खुशियाँ 
दुःख कभी न आएँ अंगना
हर पल एक नई  सौगात बन जाए 
जिन्दगी सतरंगी कायनात बन जाए 

रहे भरता सदा रब 

उसकी तमन्नाओं की पिटारी को 

चल काला टीका लगा दूँ 

कहीं नजर न लग जाए 

मेरी परियों जैसी धी -रानी को 

-डॉ हरदीप कौर सन्धु   

* सुप्रीत( मेरी बिटिया ) का आज जन्मदिन है ।  वह आज 13  वर्ष की हुई है 

Thursday, March 1, 2012

अविराम के जनवरी 2012 अंक में मेरे हाइकु

                                                       अविराम वेब पत्रिका का लिंक 



त्रिंजण और अनुभूति


अनुभूति वेब पत्रिका पर 27  फरवरी 2012  को मेरे कुछ हाइकु जिनको  मैंने त्रिंजण  में बाँधा है , प्रकाशित हुए हैं । त्रिंजण शब्द पंजाब की लोक संस्कृति से जुड़ा शब्द है। 
 यह संसार भी एक त्रिंजण  है........
 हमारा मन भावों का त्रिंजण है.....
आज मैं इसी जग त्रिंजण तथा मन त्रिंजण की बात अपने हाइकुओं में कहने जा रही हूँ। आशा है आपको यह प्रयास अच्छा लगेगा।




मन त्रिंजण
जीवन भाव काते
बने हाइकु

मन त्रिंजण
सदियों से बंजारा
घूमे आवारा

मन त्रिंजण
खुदा करे निवास
काहे का डर

मन त्रिंजण
ज्यों प्रभु लौ जगाए
शांति हो जाए

मन त्रिंजण
निचोड़े जो चाँदनी
पी नयनों से

ये मुलाकातें
मन त्रिंजण मेले
संदली रातें

त्रिंजण मन
लगा भावों का मेला
नहीं अकेला

भाग्य से हम
देखने आए यहाँ
जग -त्रिंजण

कात रे मन
जगत त्रिंजण में
मोह का धागा
१०
यह जीवन
जगत त्रिंजण का
खेल तमाशा
११
बाँट रे ज्ञान
संसार त्रिंजण में
कर तू दान
१२
जग त्रिंजण
नहीं जागीर तेरी
घड़ी का डेरा
१३
जग त्रिंजण
ये बाग़ वो जिसका
रब है माली
१४
जग त्रिंजण
अनजान नगरी
कहाँ ठिकाना
१५.
जग त्रिंजण
गिनती के हैं साँस
बेगाना धन

अनुभूति लिंक (२७ फरवरी २०१२)

इसी लिंक पर आदरणीय हिमांशु जी की ये टिप्पणी जिसके लिए मैं उनका तहे दिल से शुक्रिया करती हूँ .........
Comments: 'त्रिंजण'के माध्यम से डॉ सन्धु जी ने हाइकु जैसे छन्द में यह अभिनव प्रयोग किया है । हम अपने जिन लौकिक शब्दों और उसमें गुम्फित अर्थ को भूलते जा रहे है, उसे बी याद दिलाया गया है । हिन्दी क्षेत्र ( पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में यह शब्द 'तीजन' के रूप में गाँवों में बोला जाता रहा है । चर्खे का चलन बन्द हो गया तो शब्द भी गायब होने लगा है । इस प्रस्तुति के लिए सन्धु जी बधाई की पात्र हैं । सम्पादक मण्डल तो बधाई के हक़दार हैं ही ....रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'


हरदीप







Sunday, February 26, 2012

"मोह की झफ्फी"

गर्मी के दिनों में 
टिमटिमाते तारों की 
टिम टिमाती लौ में  
सो रहे थे हम 
खाट बिछा आँगन में 
अधखिली रात में
जब चलती थी पुरवाई 
अचानक पड़ोस से 
वह दीवार फाँद आई 
हरी कचूर वह 
नाज़ुक मासूम - सी 
चुपचाप आकर
दीवार से वह लगी थी 
सुबह की लालिमा तक 
न जाने मैंने कितनी दफा
उसे बार-बार देखा था 
लगता वह बातें करती 
मन पगला -सा हो गया 
दो शब्दों की आज तलक 
साँझ न पड़ी जहाँ 
मिलें तो मेले '
वाली बात हुई थी
धीरे से सरकती 
झूमती -सी रात को 
बंदिशों को लाँघकर 
घर हमारे वह आई थी 
वह थी 
कद्दू की वेल
जिसने ...............
अनजाने एक घर की 
हमारे दिल आँगन से 
साँझ की झफ्फी डाली थी 
और अब 
आँगन के हर कोने से 
मीठे मोह की खुशबू
आँखों में तैर आई थी 

हरदीप