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Sunday, February 26, 2012

"मोह की झफ्फी"

गर्मी के दिनों में 
टिमटिमाते तारों की 
टिम टिमाती लौ में  
सो रहे थे हम 
खाट बिछा आँगन में 
अधखिली रात में
जब चलती थी पुरवाई 
अचानक पड़ोस से 
वह दीवार फाँद आई 
हरी कचूर वह 
नाज़ुक मासूम - सी 
चुपचाप आकर
दीवार से वह लगी थी 
सुबह की लालिमा तक 
न जाने मैंने कितनी दफा
उसे बार-बार देखा था 
लगता वह बातें करती 
मन पगला -सा हो गया 
दो शब्दों की आज तलक 
साँझ न पड़ी जहाँ 
मिलें तो मेले '
वाली बात हुई थी
धीरे से सरकती 
झूमती -सी रात को 
बंदिशों को लाँघकर 
घर हमारे वह आई थी 
वह थी 
कद्दू की वेल
जिसने ...............
अनजाने एक घर की 
हमारे दिल आँगन से 
साँझ की झफ्फी डाली थी 
और अब 
आँगन के हर कोने से 
मीठे मोह की खुशबू
आँखों में तैर आई थी 

हरदीप 

Monday, February 13, 2012

बन्द किताब



1 .
बन्द किताब 
लगे जो बन्द पड़ी 
खोलता इसे 
बेचैन मन मेरा
रोज़ ख्यालों में पढ़ी 
2 .
बन्द किताब 
कोई राज़ छुपाए 
सारे जहां से 
राज़ में जो है छुपा
वह दिल में बसा 
3 .
बन्द किताब 
खोलने से डरता 
ये मन मेरा
अपने ही घर ने 
कैदी मुझे बनाया 
4 .
बन्द किताब 
बनी एक सवाल 
शिकायत भी 
कोई ढूंढ़ न पाया 
सही जवाब अभी 
5 .
बन्द किताब 
ज्यों ला -इलाज मर्ज़ 
जिन्दगी कर्ज़ 
यूँ ही बढ़ता गया 
ज्यों हमने की दवा !
- डॉ. हरदीप कौर सन्धु  

Wednesday, February 8, 2012

हम उम्र समय

                            अपने पास से निकले 
                अपने हम उम्र समय की 
                     मैंने की तलाश 
                    मगर क्या कहूँ ?
                    किस से कहूँ ?
                      कैसे कहूँ ?
                    हर बीता पल 
                     आज मुझे 
              एक सपना सा लगता है !
              डॉ. हरदीप कौर सन्धु ( 22 .12  91 )

Sunday, February 5, 2012

बीते वो पल-ताँका











1.
बीते वो पल
उड़ते छीटों-जैसे
भिगोते रहे
कभी ये तन्हा मन
कभी मेरा दामन
2.

नम थी आँखें
दर्द भीगता गया
आँसू में डूब 
नाजुक दिल टूटा 
बिन आहट किए 
डॉ. हरदीप संधु