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Sunday, February 5, 2012

बीते वो पल-ताँका











1.
बीते वो पल
उड़ते छीटों-जैसे
भिगोते रहे
कभी ये तन्हा मन
कभी मेरा दामन
2.

नम थी आँखें
दर्द भीगता गया
आँसू में डूब 
नाजुक दिल टूटा 
बिन आहट किए 
डॉ. हरदीप संधु

10 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर!

sushma 'आहुति' said...

दिल को छू हर एक पंक्ति..

kshama said...

Bahut,bahut,bahut sundar! Aprateem!

udaya veer singh said...

खुबसूरत भावनाओं की गागर ,छलकती बूंदें ,कोई भी भींग जाये ......अति सुन्दर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

गहन अर्थ लिए हुए अच्छे तांका ..

Bharat Bhushan said...

बहुत सुंदर ताँका और क्षणिका.
नाजुक दिल टूटा
बिन आहट किए
ये पंक्तियाँ मन को भीतर तक टीस देती हैं.

सहज साहित्य said...

बीते वो पल
उड़ते छीटों-जैसे
भिगोते रहे
कभी ये तन्हा मन
कभी मेरा दामन
-बीते हुए पल कभी मुट्ठी मेंकैद नहीं हो सकते ; लेकिन एक काम वे ज़रूर करते हैं-दिल को आँसुओं के दरिया में दुबो देने का । हरदीप जी आपका यह ताँका लयपूर्ण तो है ही, साथ ही हाइकु के शास्त्रीय पक्ष पर भी खरा उतरता है।
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नम थी आँखें
दर्द भीगता गया
आँसू में डूब
नाजुक दिल टूटा
बिन आहट किए॥ नाज़ुक दिल के टूटने की आवाज़ तो नहीं हुई ; लेकिन फिर भी उस बेआवाज़ टूटन ने मन को बहुत भीतर तक तोड़ दिया , जैसे तूफ़ान बड़े-बड़े पेड़ों को तोड़-मरोड़ देता है। इस जापानी विधा को शुद्ध भारतीय रूप देने में आपका योगदान सदा रेखांकित किया जाएगा । हाइकु में आपके योगदान को डॉ कमल किशोर गोयनका ने'सदी के प्रथम दशक का हिन्दी काव्य'की अपनी भूमिका में तथा डॉ मिथिलेश दीक्षित ने अपने सम्पादकीय में स्वीकार किया है । इस गौरव को प्राप्त कर्ने के लिए मेरी बहुत बधाई ।

manukavya said...

बीते वो पल
उड़ते छीटों-जैसे
भिगोते रहे

बीते पल की यादे ऐसे ही भिगोती रहती हैं.... बहुत सुंदर रचना...
सादर
मंजु

Rakesh Kumar said...

नम थी आँखें
दर्द भीगता गया
आँसू में डूब
नाजुक दिल टूटा
बिन आहट किए


वाह!
सुन्दर शब्द,अनुपम भाव.
दिल को छूती आपकी भावपूर्ण
प्रस्तुति के लिए आभार.

मेरे ब्लॉग पर आईएगा,हरदीप जी.

Rachana said...

बीते वो पल
उड़ते छीटों-जैसे
भिगोते रहे
कभी ये तन्हा मन
कभी मेरा दामन
bahut sahi bitiyaden sada sath rahi hain aur man bhi bhigoti hai shabon ki sunder anubhuti
rachana