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Wednesday, February 8, 2012

हम उम्र समय

                            अपने पास से निकले 
                अपने हम उम्र समय की 
                     मैंने की तलाश 
                    मगर क्या कहूँ ?
                    किस से कहूँ ?
                      कैसे कहूँ ?
                    हर बीता पल 
                     आज मुझे 
              एक सपना सा लगता है !
              डॉ. हरदीप कौर सन्धु ( 22 .12  91 )

14 comments:

सहज साहित्य said...

अपने पास से निकले
अपने हमउम्र समय की
मैंने तलाश की
समय को हम उम्र बताना नया प्रयोग तो है ही साथ ही उस हम उम्र की तलाश करने पर भी वह नहीं मिल पाता ।
हर बीता पल /आज मुझे / एक सपना सा लगता है !
इन पंक्तियों में सपना लगना उस तलाश को और तीव्र करता है । हरदीप जी यह तो गागर में सागर भर दिया आपने ।

kshama said...

Ye chhoti-si rachana bada gahan arth samete hue hai!

Udan Tashtari said...

कहना तो क्या है...अहसासना है.

बेहतरीन!!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 09/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

दिलबाग विर्क said...

आपकी पोस्ट चर्चा मंच 9/2/2012 पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
http://charchamanch.blogspot.com
चर्चा मंच-784:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर खुबसूरत रचना। धन्यवाद।

Madhuresh said...

बहुत प्यारी बात!

vidya said...

बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति...

सादर..

Reena Maurya said...

हा बिता हुआ पल सपना ही तो हो जाता है ...
बहुत सुन्दर ,,

Pallavi said...

सच्ची बात ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत गहन .. हमउम्र समय की तलाश ..बहुत सुन्दर

Kailash Sharma said...

हर बीता पल
आज मुझे
एक सपना सा लगता है !

....बहुत खूब! कुछ शब्दों में बहत कुछ कह दिया..

रचना दीक्षित said...

सच है बीते पल एक सपने के समान ही लगते हैं. सुंदर प्रस्तुति.

बधाई.

Amrita Tanmay said...

अत्यंत सुन्दर ..